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आरव और सात दरवाजे

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Summary

आरव और सातवाँ दरवाज़ा" एक रोमांचक और रहस्यमयी उपन्यास है, जिसमें एक साधारण लड़का, आरव, अचानक एक प्राचीन जादुई किताब के ज़रिए सात अद्भुत दुनियाओं की यात्रा पर निकल पड़ता है। हर दरवाज़ा उसे एक नई दुनिया में ले जाता है—जहाँ हैरान कर देने वाले दृश्य, अद्वितीय प्राणी, और जीवन बदल देने वाले सबक उसका इंतज़ार करते हैं। ज्ञानद्रुम की बुद्धि, जादूगर के रहस्य, और परछाईं की चेतावनियों के बीच, आरव को न सिर्फ बाहरी चुनौतियों से जूझना पड़ता है, बल्कि अपने भीतर के डर और इच्छाओं का भी सामना करना पड़ता है। सातवाँ दरवाज़ा उसे अंतिम चुनाव के सामने खड़ा कर देता है—जहाँ उसका फैसला उसके जीवन की दिशा हमेशा के लिए तय कर देगा।

Status
Ongoing
Chapters
1
Rating
n/a
Age Rating
13+

Chapter 1


अध्याय 1 – रहस्यमयी पुस्तकालय


बरसात की एक भीगी दोपहर थी। आसमान में बादल ऐसे उमड़े थे मानो किसी ने गहरे नीले रंग की स्याही उंडेल दी हो। खिड़कियों पर बारिश की बूँदें टप-टप गिरते हुए छोटी-छोटी लकीरें बना रही थीं।

आरव, अपने नाना-नानी के पुराने गाँव नवलपुर में, खिड़की के पास बैठा खिड़की के बाहर देखते हुए सोच रहा था—"यह गाँव कितना अलग है… न कोई मोबाइल की तेज़ घंटियाँ, न गाड़ियों का शोर, बस बारिश और मिट्टी की खुशबू।"


वह 14 साल का था, लेकिन उसके अंदर जिज्ञासा मानो किसी छोटे बच्चे जैसी थी। नाना जी अक्सर कहते थे कि यह गाँव रहस्यों से भरा है—पुराने मंदिर, वीरान हवेलियाँ, और एक पुरानी हवेली में बना पुस्तकालय।


आज, बारिश के बीच नाना जी ने अचानक कहा—

"आरव, तू बोर हो रहा है ना? चल, तुझे एक जगह दिखाता हूँ… लेकिन एक बात याद रखना—वहाँ जो भी देखेगा, बिना मुझसे पूछे छूना मत।"


आरव ने आँखें चमकाते हुए पूछा, "वहाँ क्या है नाना?"

नाना जी मुस्कुराए—"किताबें… लेकिन सिर्फ़ किताबें नहीं।"


पुराना पुस्तकालय


गाँव के बीच से गुजरते हुए, वे कच्ची गलियों, तालाब और खेतों के बीच बने एक पुराने रास्ते पर पहुँचे। रास्ते के किनारे एक विशाल बरगद का पेड़ था, जिसकी जड़ें ज़मीन से लटकती हुई किसी मकड़ी के जाल जैसी लग रही थीं। उसके पीछे, काई और बेलों से ढकी एक हवेली खड़ी थी। हवेली की टूटी खिड़कियों से हल्की सी ठंडी हवा और पुरानी लकड़ी की महक आ रही थी।


नाना जी ने भारी लकड़ी का दरवाज़ा खोला। चर्र-ररर की आवाज़ के साथ दरवाज़ा खुला, और सामने अँधेरे में डूबा एक विशाल हॉल था।

दीवारों पर कतार से लगी अलमारियों में मोटी-मोटी किताबें रखी थीं। कुछ किताबें चमड़े के कवर में, कुछ सुनहरे अक्षरों वाली, और कुछ इतनी पुरानी कि उनके पन्ने पीले होकर लगभग टूटने लगे थे।


आरव ने महसूस किया कि हवा में हल्की-सी चंदन और पुरानी काग़ज़ की मिली-जुली खुशबू थी।

"वाह… यह जगह तो जैसे किसी फ़िल्म में हो," उसने धीरे से कहा।

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नज़रें खींचती किताब


जब नाना जी किसी पुरानी रजिस्टर में नाम लिख रहे थे, आरव की नज़र सबसे ऊपरी शेल्फ पर रखी एक अजीब किताब पर पड़ी।

किताब काले रंग की थी, लेकिन उस पर उभरे हुए सुनहरे चिह्न थे—जो धीरे-धीरे हल्के से चमक रहे थे, जैसे सांस ले रहे हों।

उसके कवर पर कोई नाम नहीं था… बस एक गोल चिह्न और उसके चारों ओर सात छोटे-छोटे दरवाज़ों जैसी आकृतियाँ बनी थीं।


आरव के मन में जैसे कोई खिंचाव हुआ। वह पास गया और उँगलियों से हल्का-सा धूल साफ की। अचानक, उसके छूते ही किताब ने एक हल्की गरमाहट छोड़ी।


"इसको मत छू—" नाना जी की आवाज़ गूँजी, लेकिन तब तक किताब हल्के से हिलने लगी थी।

पलक झपकते ही, किताब के पन्ने खुद-ब-खुद खुलने लगे, और उनमें से एक नीली रोशनी की लहर बाहर फैल गई।

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अनजानी फुसफुसाहट


उस नीली रोशनी के बीच आरव ने एक धीमी-सी फुसफुसाहट सुनी—

"पहला दरवाज़ा… समय तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है…"


उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। नाना जी ने जल्दी से किताब बंद कर दी और उसे ऊपरी शेल्फ पर रख दिया।

"आरव, मैंने कहा था ना… यह किताब साधारण नहीं है।"


आरव ने गहरी साँस लेते हुए पूछा—"नाना… इसमें क्या है?"

नाना जी ने सीधी नज़रें मिलाकर कहा—"कहानियाँ… और रास्ते। लेकिन हर रास्ता, एक दरवाज़ा है—जहाँ जाना हर किसी के बस की बात नहीं।"


आरव के मन में सवालों का सैलाब था—लेकिन वह समझ गया कि यह तो बस शुरुआत है…

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