अध्याय 1: रात के 2 बजे
रात के ठीक 2 बजे थे। पूरा शहर गहरी नींद में डूबा हुआ था। केवल एक कमरे में हल्की-सी रोशनी जल रही थी।
निकेत अपने लैपटॉप पर काम कर रहा था। उसकी आँखें स्क्रीन पर टिकी थीं और उंगलियाँ लगातार कीबोर्ड पर चल रही थीं। मन थका हुआ था, लेकिन वह रुकने को तैयार नहीं था।
तभी उसके फोन पर एक नोटिफिकेशन आया।
“Unknown Number: सो जा… अभी 2 बजे हैं।”
निकेत ने सोचा, शायद किसी मित्र का मज़ाक होगा। उसने संदेश को अनदेखा कर दिया।
कुछ मिनट बाद फिर एक संदेश आया—
“मैंने कहा ना… सो जा।”
अब उसे थोड़ा अजीब लगा। क्योंकि उसने किसी को नहीं बताया था कि वह इस समय जाग रहा है।
उसने जवाब दिया— “कौन है?”
कुछ क्षणों की खामोशी के बाद उत्तर आया—
“जो तुम्हें देख रहा है…”
निकेत का दिल तेज़ी से धड़कने लगा। उसने तुरंत कमरे के चारों ओर नज़र दौड़ाई, लेकिन सब कुछ सामान्य था।
कुछ देर बाद फिर संदेश आया—
“पीछे मत देखना…”
निकेत ठिठक गया। फिर भी उसने धीरे-धीरे अपनी कुर्सी घुमाई और पीछे देखा।
कुछ नहीं था।
वह हल्का-सा मुस्कुराया और खुद को समझाने लगा कि वह बेवजह डर रहा है।
तभी एक और संदेश आया—
“मैंने मना किया था… अब मैं तुम्हारे पीछे नहीं…”
कुछ क्षण का विराम…
“…तुम्हारे सामने हूँ।”
निकेत की नज़र धीरे-धीरे अपने लैपटॉप की स्क्रीन पर गई।
स्क्रीन अचानक काली हो गई थी, और उसमें उसका प्रतिबिंब दिख रहा था।
उस प्रतिबिंब में—
उसके पीछे एक आदमी खड़ा था।








