Prologue
जून 1999
जून की एक गुनगुनी रात है, आधी रात का समय बीत चुका है। लड़की टैक्सी से उतरती है और धीरे-धीरे अपने घर के रास्ते पर चलने लगती है। टैक्सी के जाते ही वहां सन्नाटा पसर जाता है। हर चीज़ शांत है, लेकिन हवा में एक भारीपन सा है। कुछ देर पहले, यही हवा उम्मीदों से भरी हुई थी।
अब नहीं।
वह लड़की अपने घर की देहलीज़ पर बैठ जाती है, अभी अंदर जाने का उसका मन नहीं है। वह उस ड्रेस को देखती है जिसे उसने आज रात के लिए बहुत सावधानी और उत्साह से चुना था। छह घंटे पहले जब उसने इसे पहना था, तो उसे लगा था कि वह अपनी पूरी ज़िंदगी में आज सबसे ज़्यादा खूबसूरत दिख रही है।
अब यह ड्रेस सिर्फ इस बात की याद दिला रही है कि कैसे एक पल में उसकी पूरी शाम बकवास हो गई।
वह एक आंसू गिरने देती है। उसने सोचा था कि बस एक ही गिरेगा, लेकिन आज रात उसका खुद पर काबू कमज़ोर पड़ गया है। आंसू की बूंदें ड्रेस के साटन कपड़े पर गिरती हैं और जहाँ-जहाँ गिरती हैं, वहाँ का बैंगनी रंग गहरा हो जाता है।
"बस, जो भी दिल में है उसे बाहर निकाल दो," वह खुद से कहती है। "जो दुख है उसे बह जाने दो, फिर एक योजना बनाओ।" जैसे ही आखिरी आंसू गिरता है, उसके दिमाग में योजना बनने लगती है। उसे पता है कि अब उसे क्या करना है।
दस मिनट बाद जब दूसरी टैक्सी आती है, तब तक वह खुद को संभाल चुकी होती है। वह अपना मेकअप ठीक कर लेती है ताकि उसके माता-पिता अगर जाग रहे हों तो उन्हें पता न चले कि वह रोई है। उसे यह दिखाना है कि उसने आज की रात का खूब मज़ा लिया है। उन्हें यह शक होने की कोई वजह नहीं मिलनी चाहिए कि उसका दिल टूट चुका है।
वह उस लड़के को दूसरी टैक्सी से उतरते हुए देखती है और खुद को छिपने से रोक लेती है। वह अपना सिर झुकाए अपने घर की ओर चलने लगता है, लेकिन तभी अचानक पीछे मुड़कर उसे देख लेता है। थोड़ी हिचकिचाहट के बाद, वह सड़क पार करके उसकी तरफ आता है। उसके दिल में एक टीस सी उठती है। उसकी आँखों में फिर से आंसू आने को बेताब हैं। नहीं, वह खुद से कहती है। मुझे इस तरह धोखा मत दो।
वह उसके पास बैठ जाता है। थोड़ी देर की खामोशी के बाद वह पूछता है, "क्या हुआ आज रात?" उसकी आवाज़ भारी थी। "मुझे लगा था कि हम साथ में लौटेंगे।"
मुझे भी यही लगा था, वह मन ही मन सोचती है। मैंने आज की रात के बारे में न जाने क्या-क्या सोचा था जो कभी हुआ ही नहीं। वह कड़वी हंसी को गले में ही दबा लेती है। उसका दम घुटने लगता है।
"मैं - मैं ठीक महसूस नहीं कर रही थी, सोचा घर वापस चले जाना ही बेहतर होगा," वह झूठ बोलती है। खैर, यह आधा झूठ है; जो उसने देखा उसके बाद वाकई उसे घिन आ रही थी। "और तुम... काफी व्यस्त लग रहे थे, इसलिए मैंने तुम्हें परेशान नहीं किया।"
वह उसे एक तिरछी नज़र से देखती है। उसका खूबसूरत चेहरा डर से सिकुड़ जाता है। "ओह। हाँ। वो।" वह अपनी ठोड़ी सहलाता है। जब भी वह असहज महसूस करता है, तो वह ऐसा ही करता है। उसे ऐसा ही महसूस होना चाहिए।
वह कंधे उचकाती है और उसकी चमकदार नीली आँखों में देखती है। वह अपने चेहरे को भावहीन रखने की कोशिश करती है। "कोई बड़ी बात नहीं है।" एक और झूठ। लेकिन अब वह उसे सच तो बताने से रही। वह अब उसकी ईमानदारी के लायक नहीं बचा।
"क्या अब तुम बेहतर महसूस कर रही हो?" वह पूछता है। उसकी नज़रों में चिंता है। परवाह है। कम से कम, ऐसा दिख रहा है।
"हूँ।" वह सिर हिलाती है। "मुझे लगता है जो भी था, अब निकल गया है।" उसकी इस बात का दोहरा मतलब है, ज़ाहिर है।
यह बस एक छोटी सी पसंद थी, वह सोचती है। मैं इससे उबर जाऊंगी।
उसे उबरना ही होगा।
काश उसने कभी ये विश्वास ही न किया होता कि यह प्यार आपसी है। कितनी मूर्ख थी वो।
वह खड़ी हो जाती है। "मुझे अंदर जाना चाहिए।"
जब वह अपने बैग से चाबी निकालती है, तो वह भी खड़ा हो जाता है। वह उसका हाथ छूने के लिए आगे बढ़ता है, और वह इस स्पर्श से अपनी रोंगटे खड़े होने की भावना को नज़रअंदाज़ करने की कोशिश करती है। उसका शरीर अभी भी उसके दिमाग के साथ तालमेल नहीं बिठा पाया है।
"क्या हम ठीक हैं?" वह धीरे से पूछता है। "अभी भी दोस्त हैं?"
"बिल्कुल।" वह दरवाज़ा खोलती है और एक बनावटी मुस्कान चेहरे पर लाती है। "हमेशा के लिए दोस्त।"
उसे यकीन नहीं होता, लेकिन वह फिर भी थोड़ा हिचकिचाते हुए मुस्कुरा देता है। "कल सुबह तुम अपनी दादी के यहाँ जा रही हो, ना?" वह सिर हिलाती है। "मज़े करना, ठीक है?"
"करूंगी। शुक्रिया।" वह आखिरी बार उसे देखती है, और उसके चेहरे को अपनी यादों में हमेशा के लिए कैद कर लेती है।
"जल्द मिलेंगे," वह धीरे से कहता है और वह दरवाज़ा बंद कर देती है।
वह दरवाज़े के सहारे टिक जाती है, उसके कदमों की आहट दूर होते हुए सुनती है। उसकी मुस्कान में अब थोड़ी नफरत की झलक है।
उसे क्या पता कि अगर उसने जो सोचा है वो हो गया, तो वह उसे लंबे समय तक नहीं देख पाएगा।