प्रस्तावना
“जो!” बाहर से किसी ने चिल्लाकर पुकारा।
“लानत है,” वह बुदबुदाई। उसने फुर्ती से अपने पन्ने को मोड़ा और किताब को तकिए के नीचे सरका दिया, तभी दरवाज़ा ज़ोर से खुला।
“हमारे अल्फा बहुत जल्द महत्वपूर्ण मेहमानों की उम्मीद कर रहे हैं,” पॉली ने उत्साह से उछलते हुए कहा। “हमें तैयारियाँ शुरू करनी होंगी!”
पॉली, जिसके काले बाल हिल रहे थे, बच्चों की तरह तालियाँ बजा रही थी। वह जोलीन की रूममेट थी और हमेशा ही बहुत जोश में रहती थी।
“ओह! और योद्धा भी आज वापस आ रहे हैं!” उसने खुशी के मारे जोलीन का हाथ हिलाते हुए कहा।
जोलीन ने उसे एक समझदारी भरी नज़र से देखा। “जेक, है ना?” उसने रूखेपन से कहा।
पॉली का चेहरा शर्म से लाल हो गया पर उसने मना नहीं किया। जेक एक युवा योद्धा था जो हमेशा काम के सिलसिले में बाहर रहता था, और यह बात पॉली के लिए हमेशा दुख का कारण होती थी।
“मैंने पहले ही जीना की अलमारी व्यवस्थित करने में मदद कर दी है। उसने कहा कि मेरा आज का काम हो गया है,” जोलीन ने उम्मीद भरी नज़रों से कहा।
“अल्फा ने कहा है कि सभी ओमेगा की ज़रूरत है, चाहे किचन में या हवेली में। तुम्हारी मर्ज़ी।” पॉली ने मुस्कुराते हुए कहा।
“ठीक है,” जोलीन ने आह भरी। “किचन ही सही।”
वह अभी अपना एप्रन ठीक से बाँध भी नहीं पाई थी कि हंगामा शुरू हो गया।
थप्पड़। थप्पड़।
“तुझे क्या लगा तू क्या है, कमीनी!” जीना की आवाज़ गलियारे में गूँजी।
जोलीन किचन से बाहर निकली और उसने देखा कि जीना एक छोटी लड़की के बाल खींच रही थी।
लूसी।
आठ साल की बच्ची, जिस पर अपनी ही माँ की हत्या का आरोप था। तब किसी ने उसकी बेगुनाही की पुकार पर विश्वास नहीं किया था। सब कहते थे कि खंजर पर उसी के उंगलियों के निशान थे। लेकिन जोलीन को हमेशा शक था कि उसे फँसाया गया है। सबूत बड़ी आसानी से मिल गए थे।
“तुझे लगता है तू मुझसे बेहतर है, है ना? वेश्या!” जीना की लात लूसी की पसलियों में लगी।
लूसी ने कोई मुकाबला नहीं किया। वह कभी नहीं करती थी।
“मिस!” जोलीन ने साफ़ और तेज़ आवाज़ में पुकारा।
जीना ने बीच में ही रुककर कहा, “क्या बात है, जो?”
“अल्फा… वह आपको बुला रहे हैं। अभी इसी वक्त,” जोलीन ने चेहरा गंभीर रखते हुए झूठ बोला।
जीना ने पलकें झपकाईं, अपने बाल ठीक किए और जल्दी से वहाँ से चली गई, लूसी को पूरी तरह भूलकर।
जोलीन ने चैन की सांस ली और कांपती हुई बच्ची के पास बैठी। “चलो,” उसने प्यार से कहा। “तुम्हें यहाँ से बाहर ले चलती हूँ।”
“मैं ठीक हूँ,” लूसी ने फुसफुसाते हुए कहा और उठने की कोशिश की, लेकिन उसके घुटने लड़खड़ा गए।
“ज्यादा कोशिश मत करो।” जोलीन ने उसे सहारा दिया और गलियारे से ले गई, जहाँ किसी की नज़र न पड़े।
वह लूसी के कमरे के दरवाज़े पर झिझकी, जो एक गंदा सा तहखाना था जहाँ कीड़े-मकोड़े भरे थे और हवा भी बासी थी। वह उसे उस जगह बिल्कुल नहीं छोड़ सकती थी, आज की रात तो बिलकुल नहीं।
इसके बजाय, वह लूसी को अपने कमरे में ले गई।
“बस यहाँ चुपचाप रहो,” जोलीन ने उसे बिस्तर पर लिटाते हुए कहा। “जीना का गुस्सा धीरे-धीरे शांत हो जाएगा।”
लूसी ने चारों ओर देखा, वह हैरान थी। “इससे पहले कभी किसी ने मेरी मदद नहीं की,” उसने धीरे से कहा।
जोलीन ने हल्की सी मुस्कान दी। “खैर, अब किसी ने की है।”
उसने अपनी दराज़ों को खंगाला और लूसी को एक साफ शर्ट और जॉगर्स दिए। “इन्हें पहन लो। आराम करो। मैं किचन में तुम्हारी जगह काम कर दूँगी।”
जब तक जोलीन ने आखिरी डिश तैयार की (क्रीम रिसोट्टो के साथ सियर्ड स्टेक, ब्रियोश बन, ताज़ा जूस), तब तक पूरी हवेली में बेचैनी थी। मेहमान किसी भी पल आने वाले थे।
वह ट्रॉली पर गिलास लगा रही थी तभी हवा में एक गुस्से भरी दहाड़ सुनाई दी।
उसका दिल जैसे जम गया। अल्फा जेडेन।
जैसे ही वह किचन से बाहर निकली, लोग प्रवेश द्वार के पास जमा हो रहे थे। उत्सुक फुसफुसाहटें और हैरान कर देने वाली आवाज़ें आ रही थीं।
और सबके बीच में थी: लूसी।
वह वहाँ खड़ी थी, डरी हुई, अल्फा जेडेन के गुस्से का सामना कर रही थी।
“तुम मेरी मेट नहीं हो सकती!” वह दहाड़ा, उसकी आँखें गुस्से से जल रही थीं।
पूरे कमरे में सन्नाटा पसर गया।
लूसी जड़वत खड़ी रही, उसके होंठ खुले थे, आँखें डर और अविश्वास से भरी थीं।
भीड़ में हलचल मच गई।
जीना का चेहरा गुस्से से विकृत हो गया। ऐसा लग रहा था कि वह उसे मार ही डालेगी।
और जोलीन?
जोलीन भीड़ के किनारे खड़ी सब देख रही थी, उसका दिल डूबा जा रहा था।
क्योंकि लूसी अल्फा की असली मेट नहीं थी।
वह खुद थी।
लेकिन यह कोई नहीं जानता था।
खुद अल्फा जेडेन भी नहीं।