इराया: उसकी नियति की दुल्हन

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सारांश

विधार्थ सिंह राणावत 33 | जयपुर | शांत तूफ़ान विरासत का एक ऐसा धनी, जिसे संगमरमर और अनुशासन से तराशा गया है। वह कम बोलता है, पर देखता बहुत कुछ है। उसकी खामोशी खालीपन नहीं—उसका अधिकार है। उसकी रगों में शाही खून दौड़ता है, लेकिन उसकी पहचान उसकी वंशावली से नहीं, उसकी वफादारी से होती है। सधे हुए सूट और खानदानी गर्व के नीचे एक ऐसा दिल है, जिसने एक लड़की की एक झलक के लिए वक्त की सुइयां थाम ली थीं, जिसे वह कभी भुला नहीं पाया। उसने इंतज़ार किया—कमजोरी के कारण नहीं, बल्कि अपनी ताकत के कारण। क्योंकि जब विधार्थ प्यार करता है, तो वह हमेशा के लिए करता है। इराया शर्मा 28 | देहरादून | धीमी लौ वह इस दुनिया में बहुत कोमलता से चलती है, जैसे किसी साफ़ स्याही से लिखी हुई कविता। करुणा में रची-बसी, उद्देश्य से प्रेरित— उसकी रूह को हर उस हाथ में अर्थ मिलता है जिसे वह थामती है, हर उस दिल में जिसे वह सुकून देती है। वह महफिल में सबसे मुखर नहीं है, लेकिन जब वह बोलती है, तो दुनिया सुनती है—क्योंकि सच्चाई हमेशा गूँजती है। वह अराजकता से ऊपर दया में, और आराम से ऊपर साहस में विश्वास रखती है। और हालांकि उसने कभी भव्यता की तलाश नहीं की, किस्मत ने उसे एक ऐसे प्यार के लिए चुना, जो उसके अस्तित्व से कहीं पहले ही लिखा जा चुका था।

शैली
Romance
लेखक
reveriee_writes
स्थिति
पूरी
अध्याय
57
रेटिंग
5.0 2 समीक्षाएँ
आयु रेटिंग
18+

Prologue

"उसे दोबारा छुआ," उसने गुर्राते हुए कहा, उसकी आवाज़ इतनी भारी थी कि वह इंसानी लग ही नहीं रही थी,

"और मैं तुम्हें अपने नंगे हाथों से चीर कर रख दूँगा।"

Eraya ने उसे पहले कभी ऐसा नहीं देखा था। यह वह शालीन राजकुमार नहीं था। वह इंसान के रूप में एक तूफ़ान था—पूरी तरह से जुनून में डूबा हुआ।

Armaan लड़खड़ा गया, उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था, उसके जबड़े सूज चुके थे।

"म-मैं तो बस-"

धप।

एक और घूँसा—इस बार उसकी पसलियों पर।

धप।

उसके चेहरे पर।

Armaan दर्द से दोहरा हो गया और हाँफने लगा।

Vidhart ने उसका कॉलर पकड़ा और उसे एक गुड़िया की तरह खींचकर खड़ा कर दिया। उसकी उंगलियों के पोर छिल गए थे और उनसे खून बह रहा था—पर वह रुका नहीं।

"VIDHART!" Eraya चिल्लाई और उसकी ओर दौड़ी।

"प्लीज़—उसे खून निकल रहा है—रुक जाओ!"

लेकिन Vidhart की दुनिया सिमट गई थी। उसकी नज़रों में बस लाल रंग, आग और उसे छुए जाने का मंज़र था।

इस बात का गुस्सा कि किसी ने उसे छूने की हिम्मत कैसे की जो सिर्फ उसका था।

"मैंने एक बार कहा था," उसने घूँसों के बीच दहाड़ते हुए कहा,

"तुम दोबारा उसके करीब आए... तो तुम्हारी एक भी हड्डी साबुत नहीं बचेगी।"

उसने Armaan को दीवार पर दे मारा। फिर से। और फिर से। यहाँ तक कि वह कमीना अर्ध-चेतन अवस्था में दीवार से लुढ़क गया और दर्द से कराहने लगा।

________

भीड़ में दहशत की एक लहर दौड़ गई।

औरतों ने अपने मुँह पर हाथ रख लिए और उनके सिल्क के गाउन सरसराने लगे।

मर्द जड़वत खड़े रह गए, यह समझ नहीं पा रहे थे कि बीच-बचाव करें या छिप जाएँ।

लेकिन कोई नहीं हिला।

क्योंकि Vidhart सिर्फ गुस्से में नहीं था।

वह साक्षात प्रतिशोध था।

उसकी उंगलियों से खून टपक रहा था।

उसका जबड़ा खिंचा हुआ था।

उसकी आँखें—भगवान बचाए जो भी उन आँखों से टकराए—उसमें सदियों पुराना और शाही क्रोध धधक रहा था।

"वह मेरी पत्नी है!" उसने गरजते हुए कहा, उसकी आवाज़ में ऐसा डर था जिसने सन्नाटे को चाकू की तरह चीर दिया।

"अगर कोई भी मर्द—कोई भी इंसान—उसे गंदी नज़रों से देखने की हिम्मत भी करेगा, अगर किसी ने दोबारा उसे छूने का सपना भी देखा, तो मुझे दुनिया के हर भगवान की कसम—मैं उसे अपने नंगे हाथों से ज़िंदा दफ़ना दूँगा।"

चीखें और तेज़ हो गईं। कोने में एक औरत बेहोश हो गई।

लेकिन Vidhart को परवाह नहीं थी।

उसकी नज़रें—उसका पागलपन—सामने पड़े उस आदमी पर टिकी थीं।

उसने Armaan को खून से सने कॉलर से खींचकर उठाया, उनके चेहरे बस कुछ इंच की दूरी पर थे।

"वह सिर्फ Mrs. Ranawat नहीं है," उसने गुर्राते हुए कहा, हर लफ्ज़ नर्क की आग में डूबा हुआ एक खंजर था।

"वह मेरी है—नाम से, रूह से, और अपनी हर सांस से।"

उसने उसे और करीब खींचा। "और तुमने—तुमने उसे छुआ।"

अध्याय
1. Prologue
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अच्छा लेखन

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रोचक कथानक

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शानदार चरित्र

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सशक्त संवाद

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