Hridyansh Maharishi द्वारा विवेक - Inkitt पर
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विवेक

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सारांश

📘 उपन्यास सारांश: "विवेक" लेखक: हृदयांश महर्षि विधा: मनोवैज्ञानिक थ्रिलर | रहस्य | भय | अस्तित्व --- 🌌 सारांश: "विवेक" एक युवा मन और उसकी बिखरी हुई चेतना की गहराइयों में उतरने वाली एक मनोवैज्ञानिक यात्रा है — जहाँ भय केवल बाहरी नहीं बल्कि भीतरी भी है। --- 👤 मुख्य पात्र – विवेक: विवेक, एक शांत और संवेदनशील युवक, अपने बचपन के स्कूल लौटता है जब वहां रहस्यमय घटनाओं की खबरें फैलने लगती हैं। यह स्कूल अब बंद है, पर इसकी दीवारें ज़िंदा हैं — और हर कोना अतीत की चीख़ें दोहरा रहा है। --- 🏫 स्कूल – एक किरदार की तरह: यह स्कूल कोई साधारण इमारत नहीं है। ये स्मृतियों का संग्रहालय है, अधूरे डर और दबी हुई असलियतों का तहखाना। हर कमरा, हर दीवार — विवेक के अतीत के गहरे घाव खोलती है। कभी एक लड़की "अन्वी" की परछाईं उसे खींचती है, कभी एक नकली डॉक्टर उसके होश पर हावी होता है, तो कभी एक दरवाज़ा — जो सपनों और चेतना के बीच है — खुलने को मजबूर करता है। --- 🧠 मन और भय का विलयन: विवेक धीरे-धीरे समझता है कि उसका सबसे बड़ा शत्रु बाहर नहीं, उसके भीतर ही है — एक भय जो उसने कभी स्वीकार नहीं किया, एक स्मृति जो कभी पूरी नहीं हुई, और एक आवाज़ जो लगातार पूछती है: > "क्या तुम स्वयं को देख सकते हो, बिना भागे?" --- 🌌 अंतिम मोड़: जब विवेक आखिरी बार उस स्कूल की तीसरी मंज़िल पर जाता है, वो शून्यता के द्वार से गुजरता है — जहाँ न समय है, न शरीर, बस चेतना है। और वहीं, वो खुद को एक माध्यम बना देता है। अब वो ‘विवेक’ नहीं रहा — वो डर और ज्ञान का संतुलन बन गया।

शैली
Thriller
लेखक
Hridyansh Maharishi
स्थिति
पूरी
अध्याय
9
रेटिंग
n/a
आयु रेटिंग
13+

अध्याय 1: "सीढ़ियों का अंत नहीं होता"

उपन्यास शीर्षक: "विवेक"

लेखक: हृदयांश महर्षि

*अध्याय 1: "सीढ़ियों का अंत नहीं होता"


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> "डर वो नहीं होता जो सामने दिखे,

डर वो होता है जो भीतर उतर जाए —

चुपचाप, बिना आहट के।"




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🌒 अध्याय 1: सीढ़ियों का अंत नहीं होता

साल 2022 की सर्दियों में, जब उत्तराखंड के पहाड़ी गाँवों में कुहासे ने सूरज को निगल लिया था, वहाँ एक पहाड़ी के किनारे बसे वीरान से गाँव में एक परछाईं दाख़िल हुई — डॉ. विवेक अवस्थी।

विवेक, उम्र करीब 38, दिल्ली यूनिवर्सिटी में क्लिनिकल साइकोलॉजी के प्रोफेसर। शांत, पर सोच में डूबा हुआ व्यक्ति — जैसे उसकी आँखों में हर समय कोई अधूरा सवाल घूमता हो।

लेकिन इस बार वो रिसर्च के लिए नहीं आया था।

वो आया था खुद को ढूंढ़ने।


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गाँव के लोगों से बात करते हुए उसे जो बातें पता चलीं, उन्होंने उसकी नींदें छीन लीं।

"स्कूल? साहब, वो तो कब का बंद हो गया। वहां से तो बच्चे... फिर कभी लौटे ही नहीं..."

— गाँव की बूढ़ी महिला, जिनकी आँखों में ऐसा डर था, जिसे शब्द नहीं छू सकते।

वो स्कूल —प्राथमिक विद्यालय — अब एक खंडहर था।

तीन मंज़िला ईमारत, जिसकी खिड़कियाँ अब साँसें लेती थीं और दीवारें जैसे किसी अनदेखी आत्मा की त्वचा बन चुकी थीं।

गाँव के लोग उस स्कूल के आसपास भी नहीं फटकते।

"रात को वहाँ से बच्चों की हँसी आती है,"

"कभी-कभी कोई किताब खुलती है अपने आप,"

"दीवारों पर हर रात कुछ नया लिखा मिलता है।"


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🕯️ पहली रात

विवेक अपने कैमरे और नोटबुक के साथ स्कूल की पहली मंज़िल पर पहुँचा। अंदर घुसते ही बदबूदार सीलन ने उसकी साँसें कस दीं, लेकिन उसका मन कुछ और महसूस कर रहा था —

जैसे वो इस जगह को पहले से जानता है।

क्लासरूम की टूटी खिड़की से चाँदनी अंदर झांक रही थी। सब कुछ शांत था…

...फिर अचानक — टिक... टिक... टिक...

घड़ी?

नहीं, वहाँ कोई घड़ी नहीं थी।

दीवार पर लिखा मिला — "जो ऊपर चढ़ता है, वो लौटकर नहीं आता।"

और ठीक उसी के नीचे —

"Welcome Back, Vivek."

उसका शरीर सिहर उठा।

किसने लिखा ये? और... उसे पता कैसे कि वो आ रहा है?


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🧠 मन की हलचल

विवेक ने अपने कमरे में वापस आकर पुराने रिकॉर्ड्स खंगाले।

18 साल पहले — इसी स्कूल से 9 बच्चे गायब हुए थे।

कोई चिल्लाहट, कोई खून, कुछ नहीं — बस "गायब"।

सरकार ने केस दबा दिया। माता-पिता पागल हो गए।

और स्कूल को बंद कर दिया गया।

लेकिन एक रिपोर्ट में एक नाम था — “V.A.”

"V.A.?"

विवेक का मन काँप गया।

"V.A." — विवेक अवस्थी?

क्या वो कभी इस स्कूल में था?


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📓 अगली सुबह

वो सुबह 4 बजे नींद से चौंक कर उठा।

सपने में उसने खुद को तीसरी मंज़िल की सीढ़ियाँ चढ़ते देखा।

हर सीढ़ी पर एक बच्चा बैठा था — चुपचाप, आँखें खोले हुए।

और आखिरी सीढ़ी पर एक दरवाज़ा था...

जिस पर लिखा था: “याद रखना, तुम पहले भी आए थे।”

उसने उठकर देखा —

बिस्तर के पास एक पुराना, फटा हुआ नोटबुक रखा था। उसी पर लिखा था उसका सपना।

शब्द दर शब्द।

पर उसने वो लिखा नहीं था।


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📎 अध्याय का अंतिम वाक्य:

> और उस क्षण, विवेक को एहसास हुआ —

डर बाहर नहीं, भीतर शुरू हो चुका है।




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