Chapter-1"The first night of war"
मीडिया के लिए शादी का फोटोशूट अभी-अभी खत्म हुआ था। मुस्कान, लाइटें, कैमरे की फ्लैश—बाहर से सब कुछ एकदम परफेक्ट लग रहा था।
लेकिन तारा के लिए नहीं।
विक्रम की ठंडी आवाज सन्नाटे को चीरती हुई आई।
"देखो तारा, तुममें तमीज नहीं है, पर मुझमें है। तो मुस्कुराओ। यह कॉन्ट्रैक्ट में लिखा है। हमें सबके सामने एक परफेक्ट कपल की तरह दिखना है।"
तारा की आँखों में आँसू भर आए, लेकिन उसने जबरदस्ती मुस्कान बिखेरी।
"अच्छी लड़की। हमेशा मेरी बात ऐसे ही माना करो।" विक्रम के शब्दों में ताना था।
ज्यादा दूर नहीं, तारा की छोटी बहन सुहानी ने अपनी माँ से फुसफुसाते हुए कहा, "मम्मी, दीदी खुश नहीं लग रही हैं, है ना?"
उसकी माँ ने आह भरी। "मुझे नहीं पता कि उसने अचानक तीन दिन के अंदर शादी करने का फैसला क्यों लिया।"
"और विक्रम सर दीदी से इतने बड़े हैं। मुझे समझ नहीं आ रहा कि दीदी ने हाँ क्यों कहा... खासकर तब जब पापा अभी भी अस्पताल में हैं।" सुहानी की आवाज घबराहट से कांप रही थी।
विक्रम के दादा-दादी उनके पास आए।
सुहानी, जो आने वाले तूफान से अनजान थी, उससे विक्रम के दादाजी ने पूछा, "क्या तुम अपनी दीदी की शादी से खुश हो?"
"जी दादाजी," सुहानी ने धीरे से जवाब दिया।
विक्रम की दादी मुस्कुराईं, "आखिरकार, तुम दोनों अब परिवार जैसे ही हो। तारा और सुहानी पिछले दो सालों से इस घर में आ-जा रही हैं। अब तारा हमेशा के लिए यहीं रहेगी। हम सब बहुत खुश हैं।"
तारा की माँ ने फीकी मुस्कान दी और सुहानी ने भी ऐसा ही किया।
जैसे ही मेहमान गए, हवेली में सन्नाटा छा गया।
तारा विक्रम के कमरे में आईने के सामने अकेली खड़ी थी और खुद को देख रही थी।
यह वो शादी नहीं है जिसका मैंने सपना देखा था... यह वो पहली रात नहीं है जिसकी मैंने कल्पना की थी... लेकिन पापा... मुझे करना पड़ा...
दरवाजा चरमराया। वह जल्दी से पलटी—विक्रम अंदर आया और चुपचाप बिस्तर पर बैठ गया।
तारा ने आखिर हिम्मत जुटाकर पूछा, "आपने मुझसे शादी क्यों की? आपने मुझे कभी नहीं बताया।"
विक्रम झल्लाया, "मैं तुम्हें क्यों बताऊँ? क्या मैं तुम्हें खरीद चुका हूँ? नहीं। तो चुप रहो।" उसकी तीखी आवाज कमरे में गूंज उठी।
तारा ने कांपती आवाज में, आँखों में आँसू लिए फुसफुसाया, "मैं बस सच जानना चाहती हूँ।"
विक्रम उसकी तरफ लपका और उसके गालों को जोर से भींच लिया। "क्या सोचती हो तुम? कि मैंने तुमसे इसलिए शादी की क्योंकि मैं तुमसे प्यार करता हूँ? कभी नहीं। मैं तुमसे नफरत करता हूँ।"
उसकी आँखों में कुछ चमक उठा, एक याद, एक गहरी नफरत।
"मैं तुम्हें इस कमरे में बर्दाश्त भी नहीं कर सकता। मैं तुम्हें सिर्फ दादाजी और दादीजी की वजह से यहाँ रख रहा हूँ।"
उसने उसकी कलाई पकड़ी और उसे बालकनी की तरफ खींच ले गया।
"यही तुम्हारी जगह है," उसने नफरत से कहा।
तारा, रोते हुए गिड़गिड़ाई, "अगर मैं तुम्हें इतनी बुरी लगती हूँ, तो आपने मुझसे शादी क्यों की?"
"तुम्हें तड़पते हुए देखने के लिए। तुम्हें दर्द देने के लिए।"
तारा ने अपने आँसू पोंछे और कहा, "संभल जाइए, मिस्टर सूर्यवंशी... अगर आप मुझे दर्द देंगे, तो हैरान मत होइएगा अगर वो दर्द वापस आप तक पहुँच जाए।"
विक्रम ने बालकनी का दरवाजा जोर से बंद कर दिया।
उसने सोने की कोशिश की पर उसे आराम नहीं मिला। करवटें बदलने के बाद, वह उठा, एक कंबल उठाया और बालकनी के खुले दरवाजे से तारा के चेहरे पर फेंक दिया।
बिना एक पल गंवाए, तारा ने कंबल पकड़ा और वापस उस पर फेंक दिया।
"तुम मुझे दर्द में देखना चाहते थे? देखो मुझे। देखो मुझे इस दिसंबर की ठंड में जमते हुए। शायद इससे तुम्हें खुशी मिले!"
विक्रम ने गुस्से में दरवाजा फिर बंद किया पर जल्द ही उसे खोल दिया।
तारा अब बुरी तरह कांप रही थी।
बिना कुछ कहे, विक्रम उसके पास गया और उसे अपनी बाहों में उठा लिया।
तारा ने संघर्ष किया। "मुझे छोड़ो! तुम मेरे साथ ऐसा नहीं कर सकते!"
उसने उसे जोर से सोफे पर पटक दिया।
"मैं जो चाहूँ कर सकता हूँ। और यह मत सोचना कि मुझे तुम्हारे लिए कोई दया है।" उसने उस पर कंबल फेंका और लाइटें बंद कर दीं।
तारा रोते-रोते सो गई।
—
अगली सुबह
नींद में तारा मुस्कुराई। यह बस एक बुरा सपना था। मेरी शादी असल में नहीं हुई। मैं अभी भी अपने उस के-ड्रामा सीईओ का इंतज़ार कर रही हूँ जो मुझसे सच में प्यार करेगा।
अचानक, उसके चेहरे पर ठंडा पानी पड़ा।
तारा हड़बड़ा कर उठी। "किसने किया ये?!"
उसने आँखें खोलीं और विक्रम को वहाँ खड़ा देखा।
ओह नहीं... यह सपना नहीं है। वो सपना था। यह... यह मेरा बुरा सपना है।
"ऐसी शक्ल क्यों बना रही हो, तारा?" विक्रम ने मज़ाक उड़ाया।
तारा खड़ी हुई और उसने उसे दोनों हाथों से जोर से धक्का दिया। "मैं तुम्हें क्यों बताऊँ? तुमने तो कभी नहीं बताया कि मुझसे शादी क्यों की!"
विक्रम की आँखें तमतमा उठीं। "अपनी हद में रहो, लड़की। वरना—" वह एक-एक कदम आगे बढ़ा, "—वरना मैं तुम्हें हद का मतलब समझा दूँगा।"
तारा जल्दी से बाथरूम की ओर भागी और दरवाजा जोर से बंद कर लिया।
"तारा! मेरी बात अभी खत्म नहीं हुई है!"
तारा ने उसकी आवाज़ दबाने के लिए सारे नल खोल दिए।
कुछ देर बाद, उसने सावधानी से दरवाजा खोला और बाहर झांका। विक्रम कमरे में नहीं था।
"भगवान का शुक्र है! वो राक्षस चला गया। मैं आखिर इस भारी bridal lehenga से छुटकारा पा सकती हूँ।"
जैसे ही उसने कपड़े बदले, दरवाजे पर दस्तक हुई।
"मैम, दादाजी और दादीजी नाश्ते पर आपका इंतज़ार कर रहे हैं।"
"ठीक है, मैं आती हूँ," तारा ने जवाब दिया।
जैसे ही वह सीढ़ियों से नीचे उतरी, विक्रम की नज़रें चुपचाप उसका पीछा कर रही थीं।
उसकी दादी मुस्कुराईं। "तारा गुलाबी रंग में कितनी सुंदर लग रही है, है ना विक्रम?"
विक्रम, हड़बड़ाते हुए बोला, "उह... आपने क्या कहा, दादी?"
"वह सुंदर लग रही है, ना?"
"मैं ऑफिस जा रहा हूँ," विक्रम ने जल्दी से कहा और तारा की तरफ एक तीखी नज़र डाली, जिसने बदले में उसी गुस्से से उसे देखा।
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लेखक की टिप्पणी....
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