Introduction
~ : एस्थेटिक्स :~
♥︎ध्रुवय राठौर
♥︎रूपा वर्धन
उसे शांति का वादा दिया गया था..
उसने उसे युद्ध दिया.. सिंदूर और रेशम में लिपटा हुआ।
खामोशियों में रचा एक मजबूर रिश्ता।
आग में गढ़ा हुआ एक प्यार..🌙
~:डिस्क्लेमर और कॉपीराइट: ~
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द्वारा Desidreamer_KK, 2025
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इस कहानी में गंभीर विषय शामिल हैं
जिनमें अधिकारपूर्ण प्यार, भावनात्मक
तीव्रता और पारंपरिक शक्ति की गतिशीलता शामिल है।
विवेक के साथ पढ़ें।
~ :प्रस्तावना:~
उसकी उंगलियां उसके गालों पर धीरे-धीरे सरकीं। कोमल। अधिकारपूर्ण। खतरनाक।
“कह दो,” ध्रुवय ने धीरे से कहा, उसकी आवाज़ में तड़प थी। “कह दो कि तुम्हें मेरी याद आई, पत्नी।”
रूपा की नज़रें फिर से उसके पट्टी बंधे हाथ पर चली गईं। वह हाथ थोड़ा कांप रहा था। उसने उसे किसी ऐसी चीज़ से ढका था जो उसकी अपनी थी, बजाय इसके कि वह अपना सही इलाज करवाता।
उसका गला भर आया। “तुमने खून बहाया… लड़ाई की… खुद को घायल कर लिया,” उसने कांपती हुई आवाज़ में फुसफुसाया, और उसकी आँखों में एक अनकही भावना तैर गई।
“और इतना लंबा सफर तय किया… इस सबके लिए?”
उसके होंठ थोड़े मुड़े, जैसे उसे मज़ा आ रहा हो, लेकिन उसकी आँखों की चमक और गहरी हो गई। “छी। वो ज़ुबान… मुझे उसकी भी बहुत याद आई थी।”
उसने अपनी हथेली उसके सीने पर रखी, उसकी कांपती उंगलियां धड़कते हुए दिल को महसूस कर रही थीं। उसे दूर धकेलने के लिए नहीं। बल्कि उसे महसूस करने के लिए। खुद को संभालने के लिए। अपनी उस धड़कन को थामने के लिए जो बेकाबू हो रही थी।
“अगर मैं कहूँ कि मुझे तुम्हारी याद आई,” उसने फुसफुसाकर कहा, उसकी आवाज़ में डर और गुस्सा दोनों थे, “तो तुम क्या करोगे?”
“मैं तुम्हें दोबारा कभी कहीं जाने नहीं दूंगा,” उसने पलक झपकाए बिना कहा। “सांस लेने के लिए भी नहीं।”
उसकी आँखों में आंसू आ गए, लेकिन उसने उन्हें अंदर ही निगल लिया। “और अगर मैं न कहूँ तो?”
उसकी नज़रें गहरी हो गईं। उसकी मुस्कान हवा में धुएं की तरह गायब हो गई। “तो भी मैं तुम्हें अपने पास ही रखूँगा,” उसने ठंडे लहजे में कहा। “लेकिन तुम मेरे साथ खून बहाओगी, पत्नी… जब तक तुम यह समझ नहीं जाती कि तुम कभी कहीं भागने के लिए बनी ही नहीं थी।”
उसकी सांसें गले में ही अटक गईं। वह अपने हर शब्द पर अडिग था। उसके शरीर पर मौजूद हर निशान, मानो उसके लिए एक सज़ा थी। फिर भी, उसकी आवाज़ नहीं टूटी। बस उसका दिल टूट गया।
“तुम बहुत लापरवाह हो,” उसने फुसफुसाया, “तुम मुझे डराते हो…”
उसके चेहरे पर कुछ अजीब सा भाव आया, कुछ बहुत पुराना और अधिकारपूर्ण, और फिर वह दोबारा मुस्कुराया। एक शरारती, सुलगती हुई मुस्कान।
“अच्छा है। फिर शायद तुम भागना बंद कर दोगी।” उसका दूसरा हाथ उसके टॉप के नीचे गया और अधिकार जताते हुए उसकी कमर पर टिक गया।
और उस भारी सन्नाटे में, उसके होंठों पर एक क्रूर मुस्कान तैर गई। “अब एक अच्छी लड़की की तरह, रूपा,” उसने फुसफुसाया, “और कह दो कि तुम्हें मेरी याद आई।”
~: लेखक की टिप्पणी:~
"DhRupa" में आपका स्वागत है, एक ऐसी डार्क रोमांस कहानी जो परंपरा, जुनून और अनकही कसमों पर टिकी है।
अगर आपको अधिकारपूर्ण और वफादार पुरुष पसंद हैं जो पहले प्यार में गिरते हैं (और कभी साथ नहीं छोड़ते), तो मेरे साथ बने रहें।🌿
हर शुक्रवार, रविवार और मंगलवार को नए अध्याय। अगर यह दुनिया आपको अपनी ओर खींच रही है, तो कमेंट करें।
लेखिका,
Desidreamer_KK
🌙🥀✨
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