First Encounter
"ओम्मा... सुबह-सुबह फालतू की बातें मत शुरू करो," हे-इन ने किम्बाप रोल का एक जल्दी से निवाला लेते हुए कहा। उसकी एक नज़र घड़ी पर थी और उसके हाथ अपने आप काम कर रहे थे।
रसोई से उसकी माँ ने बिना ऊपर देखे जवाब दिया, "कैसी फालतू बात? मैं शादी की बात कर रही हूँ। तुम अब छब्बीस साल की हो गई हो। तुम्हारी क्लास की सभी लड़कियाँ शादीशुदा हैं। कुछ के तो बच्चे भी हैं।"
"तो क्या हुआ?" हे-इन ने अपना लंच बैग बंद करते हुए कहा। "इसका मतलब यह तो नहीं कि मुझे भी शादी कर लेनी चाहिए। मेरी ज़िम्मेदारियाँ हैं। मेरे कुछ सपने हैं जिन्हें मुझे पूरा करना है। मेरी ज़िंदगी उनकी तरह नहीं है।"
उसकी माँ पास आईं और पानी की बोतल उसके बैग में रख दी। "हर किसी को एक दिन शादी करनी पड़ती है। खासकर लड़कियों को। हमें तो तुम्हारी शादी पच्चीस साल की उम्र तक कर देनी चाहिए थी। हमने तुम्हें अब तक आज़ादी दी। अपनी ज़िंदगी जी ली, बहुत हुआ। अब बसने का समय है।"
हे-इन ने निवाला खाते-खाते बीच में ही रुककर अपनी माँ की ओर देखा, उसके मन में एक कड़वा विचार उठा। अपनी ज़िंदगी जी रही हूँ? क्या तुम्हें लगता है कि यह वही है?
"और अब जब तुम्हारा स्टूडेंट लोन भर गया है," उसकी माँ ने अपनी आवाज़ में दृढ़ता लाते हुए कहा, "तो हम तुम्हें थोड़ा और समय दे रहे हैं। उसके बाद, तुम्हें शादी करनी ही होगी।"
हे-इन की उंगलियाँ उसके बैग की पट्टी पर कस गईं। "आप हमेशा ऐसे क्यों बात करती हैं जैसे शादी कोई सज़ा हो जो आप मुझे दे रही हैं?" उसने अपनी आवाज़ को स्थिर रखते हुए कहा, हालाँकि उसमें तनाव साफ़ था। "यह मेरी ज़िंदगी है, ओम्मा। मुझे उसे अपनी पसंद से जीने दें।"
उसकी माँ ने उसे एक सख्त, अटल नज़रों से देखा। हे-इन ने भी उनकी आँखों में देखा, न तो वह पीछे हटी और न ही उसने बहस की।
"तुम आजकल बहुत ज़्यादा ज़ुबान लड़ाने लगी हो, हे-इन," उसकी माँ ने कहा। "और जब भी मैं शादी की बात करती हूँ तो तुम्हें इतनी चिढ़ क्यों होती है? समाज ऐसे ही चलता है। तुम इसके खिलाफ नहीं जा सकती।"
हे-इन ने एक धीमी साँस ली। बहुत सारे शब्द उसके सीने में दबे थे, जो बाहर आने को बेताब थे। लेकिन उसने उन्हें अंदर ही निगल लिया। अभी लड़ने से सुबह खराब हो जाती, और उसमें फिर से बहस करने की हिम्मत नहीं थी।
बिना एक शब्द कहे, उसने अपने खाने का एक और निवाला लिया, अपना बैग उठाया और घर से बाहर निकल गई।
उसकी माँ उसे जाते हुए देखती रहीं, फिर अपना सिर हिलाया, उनकी आँखों में चिड़चिड़ाहट साफ़ थी। "भगवान ही जाने कि उसके इस रवैये को कौन झेलेगा," उन्होंने बड़बड़ाते हुए रसोई की तरफ मुड़ते हुए कहा।
ऑफिस में,
मीटिंग रूम में आधी नींद में डूबे लोगों की सुगबुगाहट और कॉफी के कप टकराने की आवाज़ें आ रही थीं।
"हे-इन, आज तीन नए लोग ज्वाइन कर रहे हैं," उसके मैनेजर ने घोषणा की। "मैं चाहता हूँ कि तुम रोज़ उनके प्रशिक्षण के लिए कुछ घंटे निकालो। वे तुम्हारे अंडर काम करेंगे।"
हे-इन ने ऊपर देखा, उसके चेहरे पर हैरानी थी। "लेकिन, सर," उसने सावधानी से कहा, "मैं पहले ही दो बड़े प्रोजेक्ट्स संभाल रही हूँ। मुझे तो वैसे ही समय नहीं मिलता। तीन लोगों को ट्रेन करना मुश्किल होगा। मैं उन पर पूरा ध्यान नहीं दे पाऊँगी।"
"हम समझते हैं, हे-इन," उन्होंने एक बार सिर हिलाते हुए जवाब दिया। "लेकिन यह ज़रूरी है। एक बार वे ट्रेन हो गए, तो वे तुम्हारी मदद करेंगे और तुम्हारा काम का बोझ कम हो जाएगा। यह तुम्हारी सुविधा के लिए ही है। बस अपने दिन को थोड़ा और लंबा कर लो। सुबह उन्हें ट्रेन करो, और बाकी दिन अपने काम पर ध्यान दो। यह सिर्फ एक महीने की बात है। उसके बाद, वे आधिकारिक तौर पर तुम्हारी टीम का हिस्सा बन जाएंगे।"
"लेकिन सर—"
"बस उनका ख्याल रखो, हे-इन," उन्होंने बात काटते हुए कहा और एजेंडे के अगले बिंदु पर चले गए।
उसने एक दबी हुई आह भरी, उंगलियों को कुछ पल के लिए अपने बालों में फेरा। एक और ज़िम्मेदारी। एक और समझौता। मन में भारीपन के साथ उसने हार स्वीकार कर ली, जो अब उसे आदत सी हो गई थी।
मीटिंग खत्म हुई, कुर्सियाँ पीछे हटीं, और हर कोई अपनी डेस्क की तरफ चल दिया। हे-इन अपनी जगह लौटी, अपना सिस्टम ऑन किया, और खुद को एक और लंबे दिन के लिए तैयार करने लगी।
"गुड मॉर्निंग, मैम," एक छोटी सी आवाज़ आई।
हे-इन ने अपनी स्क्रीन से नज़र हटाई और पीछे मुड़ी। "नए ज्वाइन करने वाले?"
"जी हाँ, मैम," उन्होंने एक साथ जवाब दिया।
उसने धीरे से सांस छोड़ी। बेशक। "ठीक है। बैठो," उसने अपनी कुर्सी को करीब खींचते हुए कहा। "मुझे अपने काम के अनुभव के बारे में बताओ। सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट की कोई पूर्व जानकारी? इंटर्नशिप? कुछ भी प्रासंगिक हो?"
एक-एक करके, उन्होंने बोलना शुरू किया।
दो लोगों ने आत्मविश्वास के साथ जवाब दिया, अपनी इंटर्नशिप और काम की बुनियादी समझ के बारे में बताया। उन्होंने ध्यान से सुना, बार-बार सिर हिलाया, और समझदारी भरे सवाल पूछे।
तीसरे ने... ऐसा नहीं किया।
उसके जवाब अस्पष्ट थे, अनिश्चित थे, और उस भूमिका से पूरी तरह अलग थे जिसके लिए उसे रखा गया था। न कोई स्पष्टता थी, न कोई आधार। बस घबराहट भरी मुस्कान और आधे-अधूरे वाक्य।
हे-इन ने अपने होंठ भींच लिए, उसे महसूस हो रहा था कि आने वाला महीना उसके कंधों पर कितना भारी पड़ने वाला है।
और बस ऐसे ही, उसका दिन पूरी तरह पटरी से उतर गया, जो स्पष्टीकरण, दोहराव और धैर्य की लंबी प्रक्रिया में बदल गया। एक और लंबा दिन। हमेशा की तरह।
रात के 8:30 बज चुके थे।
ऑफिस खाली हो रहा था, लाइटें एक-एक करके बंद की जा रही थीं, बस कुछ ही लोग अपनी स्क्रीन के सामने झुके हुए थे। हे-इन अपनी कुर्सी पर स्ट्रेच हुई, उसके अंग अकड़ गए थे, सिर में हल्का दर्द हो रहा था। भूख उसके पेट में मरोड़ पैदा कर रही थी।
उसका फोन बजा।
"अभी ऑफिस में ही हूँ, ओम्मा... मुझे देर हो जाएगी," उसने थकान भरी आवाज़ में कहा।
"ठीक है। घर सुरक्षित आना," उसकी माँ ने जवाब दिया।
"हम्म," हे-इन ने कॉल काटने से पहले बड़बड़ाया।
उसने खुद को पंद्रह मिनट और काम करने के लिए मजबूर किया, लेकिन उसका ध्यान भटक रहा था। आखिरकार, उसने अपना लैपटॉप बंद किया, लॉग आउट किया और ऑफिस से निकल गई।
बाहर, रात की हवा सामान्य से भारी लग रही थी। उसे बहुत ज़ोर की भूख लगी थी। उसकी चाल धीमी हो गई, सिर में दर्द था, और चेहरा पीला पड़ गया था। सड़क के बीच में, वह रुक गई, थोड़ा झुककर अपनी सांस लेने लगी।
"मैं नहीं कर सकती..." वह बड़बड़ाई। "मुझे खाने की ज़रूरत है। तुम्हें ठीक से खाना खाना चाहिए था, हे-इना," उसने खुद को ही डांटा।
अपना सिर उठाते हुए, उसने चारों ओर देखा। सड़क के उस पार, एक रेस्टोरेंट जगमगा रहा था, उसकी रोशनी अंधेरे को चीरते हुए एक शांत निमंत्रण की तरह लग रही थी।
उसने आह भरी, सड़क पार की और उसके सामने खड़ी हो गई।
OPEN, साइन बोर्ड पर लिखा था।
दरवाज़ा धकेला और वह अंदर चली गई। जगह खाली थी।
"जेओगियो... क्या कोई यहाँ है?" उसने धीरे से पुकारा।
"जी—माफ़ करना, मैम। हम बंद करने ही वाले हैं," रसोई से एक पुरुष की आवाज़ आई।
"मुझे बहुत भूख लगी है," उसने धीरे से कहा। "बस... जो कुछ भी है, वही परोस दीजिए।"
एक पल के लिए, कोई जवाब नहीं आया।
फिर वह रसोई से बाहर आया। एक युवा, हैंडसम लड़का। एक ऐसी शांत सी मुस्कान जो बिना किसी कोशिश के थी।
हे-इन ने उसे देखा।
उसकी आँखें हे-इन के चेहरे पर टिक गईं, और उसने उस पर छाई थकान को पढ़ लिया। पीला चेहरा। थकी हुई। बस किसी तरह खुद को संभाले हुए।
वह उसे मना नहीं कर सका।
"ठीक है। बैठिए," उसने धीरे से कहा। "चूंकि आप बहुत भूखी लग रही हैं, मैं आपके लिए झटपट नूडल्स बना देता हूँ।"
उसके चेहरे पर राहत छा गई, एक कोमल और बेपरवाह मुस्कान के साथ। इससे पहले कि वह रोक पाती, एक छोटी सी मुस्कान उसके चेहरे पर आ गई।
वह एक पल के लिए जम सा गया। उसके सीने में कुछ धड़कन बढ़ी। धत तेरी... क्या मुस्कान है।
वह एक पल ज़्यादा देर वहीं खड़ा उसे देखता रहा, इससे पहले कि वह पास की कुर्सी की तरफ बढ़ी और बैठ गई।
उसने फिर उसकी ओर देखा। "कृपया... जल्दी बनाना," उसने धीरे से कहा।
"हाँ," उसने खुद को संभालते हुए मुस्कुराकर जवाब दिया। "दस मिनट।"
और फिर वह मुड़ा और जल्दी से वापस रसोई में चला गया, उसका दिल अभी भी शांत नहीं हो पा रहा था।










