Prologue
प्रस्तावना
Dora – Dreaming
मैं जंगल में चल रही हूँ। हवा शांत है, फूल खिले हैं, और धीमी हवा के झोंकों में धीरे-धीरे हिल रहे हैं। मन में एक सुकून सा छा गया है, बिल्कुल कोमल और गहरा।
फिर अचानक आसमान बहुत ज्यादा चमकने लगता है।
ऊपर सितारे तेज़ी से घूमने लगते हैं, इतनी तेज़ी से कि वे आपस में मिलकर चांदी जैसी रोशनी की एक धुंधली परत बन जाते हैं।
मैं बहुत छोटी हूँ—इतनी छोटी कि मेरे पैर लड़खड़ा रहे हैं। मैं गीली ज़मीन पर मुश्किल से चल पा रही हूँ। ऊँचे-ऊँचे पेड़ डरावने लग रहे हैं, उनकी शाखाएं जैसे चाँद को नोचने की कोशिश कर रही हों। ठंडी कीचड़ मेरे नंगे पैरों से चिपक रही है।
दूर कहीं चिल्लाने की आवाज़ आती है। मेरे पीछे आग की रोशनी चमकती है।
“Dora!”
यह नाम रात के सन्नाटे को चीर देता है। कुछ तो गलत है। जैसे यह नाम बहुत पुराना और जाना-पहचाना हो।
मैं फिर लड़खड़ाती हूँ।
“भागो, छोटी। भागो।”
यह आवाज़ धीमी है। एक फुसफुसाहट। किसी ने मेरा हाथ पकड़ लिया है।
एक लड़की मेरे साथ भाग रही है—बिल्कुल मेरी कद-काठी की, मेरे जैसे बाल, मेरा चेहरा। लेकिन जब मैं उसे देखने के लिए मुड़ती हूँ, तो उसका चेहरा धुंध की तरह धुंधला हो जाता है। मेरा सीना भारी हो जाता है, क्योंकि मुझे पता है कि वह कौन है।
वह मेरा हाथ दबाती है। और फिर वह गायब हो जाती है।
मैं चिल्ला पड़ती हूँ।
जंगल मेरे नीचे से गायब हो जाता है और मैं गिरने लगती हूँ, बिना किसी भार के, धीरे-धीरे, जैसे गहरे पानी में गिरता हुआ कोई पत्ता।
तभी किसी के हाथ मुझे थाम लेते हैं।
एक औरत। उसके बाल तारों की तरह सफेद हैं और आँखें बादलों के बीच चांदी की तरह चमक रही हैं। उसके शरीर से लैवेंडर और राख की खुशबू आ रही है।
“तुम्हें भूलना नहीं चाहिए,” वह फुसफुसाती है। उसकी आवाज़ में गर्मी है, पर उसके शब्द बर्फ से भी ज्यादा ठंडे हैं।
“क्या तुम जानती हो कि तुम कौन हो?”
मैं जवाब देने की कोशिश करती हूँ, लेकिन मेरा गला रुंध जाता है। मेरा सीना जलने लगता है।
“तुम कभी अकेली नहीं थी।” उसकी उंगलियां मेरे माथे को छूती हैं।
दुनिया चांदी जैसी चमकती है—और फिर अंधेरा छा जाता है।
मैं झटके से जाग गई, मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। डर की वजह से मेरी नसों में सिहरन दौड़ रही थी और मेरा शरीर पसीने से तर-बतर था।
चारों तरफ घना अंधेरा था। न वो जंगल का सुकून था, न आग की गर्माहट, और न ही वो लड़की जिसे मैं अपने ख्यालों में देख रही थी। उस गहरे सन्नाटे में, सिर्फ मेरी तेज़ सांसों की आवाज़ गूँज रही थी।
“मैं अकेली नहीं थी,” मैंने बुदबुदाया। मेरे शब्द उस भारी सन्नाटे में गूँज कर रह गए।
लेकिन मुझे नहीं पता था कि मैंने ऐसा क्यों कहा। या मेरा मतलब किससे था।
मैं लड़खड़ाते हाथों के सहारे उठी और खिड़की के बाहर सितारों को देखने लगी। आम सितारे। न कोई हलचल, न कोई चांदी जैसी रोशनी। बस आकाश में चमकते ठंडे बिंदु।
मैंने खुद को गहरी सांस लेने के लिए मजबूर किया। अंदर। बाहर। शांत रहो।
शायद ये उन फिल्मों का असर था जो Olivia ने कल रात मुझे जबरदस्ती दिखाई थीं। हॉरर फिल्में अक्सर डरावने सपने लाती हैं।
है ना?
लेकिन दिल के किसी कोने में, मैं जानती थी कि यह सच नहीं है।
मैंने आँखें बंद कर लीं, अपनी चादरों के बीच सुकून ढूंढने की कोशिश करते हुए। कल का दिन बहुत बड़ा था। मुझे आराम की ज़रूरत थी।
भले ही मुझे नहीं लग रहा था कि मुझे नींद आएगी।









