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bada achha lagta h: night stay or saheli ka baap

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सारांश

Kahani Sanaya ki hai jo apni saheli Suhana ke ghar night stay ke liye jaati hai aur raat ko jab uski neend khulti hai toh hota hai kuch aisa ki ban jaati hai aapki woh sabse pasandida bedtime story. Miss mat kijiye, realism mein lekhan ke taur par aisa ek detailed kaamuk upanyas ki video bhi sharma jaaye, kaise kholta hai ek adhed ek kacchi jaagi deh ko. Kaise yeh ek raat ka swarg banta hai inke jeevan ka sabse bada nark, yeh jaanne ke liye zaroor padhein.

शैली
Young Adult
लेखक
Mysterious
स्थिति
५ महीने पहले
अध्याय
10
रेटिंग
n/a
आयु रेटिंग
18+

Chapter 1: mujhe neend naa aye

रात के डेढ़ बज रहे थे।

मुंबई के उस फ़्लैट में एक गहरी, लगभग अप्राकृतिक खामोशी छाई हुई थी। बाहर शहर की कभी न सोने वाली सड़कों का शोर था, लेकिन पंद्रहवीं मंज़िल पर, इस एयर-कंडीशंड कमरे में, बाहर की दुनिया का कोई वजूद नहीं था।

बिस्तर पर दो जवान जिस्म एक-दूसरे से लिपटे हुए सो रहे थे। एक थी सुहाना, जिसकी यह अपनी दुनिया थी, अपना कमरा, अपना बिस्तर। और दूसरी थी उसकी सबसे अच्छी दोस्त, अभी अभी अठारह की हुई सनाया, जो आज रात यहीं रुकने आई थी। दोनों ने एक ही पतली चादर ओढ़ रखी थी, जो उनके जवान जिस्मों के उभारों और मोड़ों पर किसी नदी की तरह फैली हुई थी। सुहाना गहरी नींद में थी, उसका चेहरा मासूमियत से भरा था, और साँसें एक लय में चल रही थीं।

लेकिन सनाया की नींद कच्ची थी। नए बिस्तर और बदले हुए माहौल ने उसके जिस्म को बेचैन कर रखा था। अचानक, नींद की गहराइयों में, उसे अपने पेट के निचले हिस्से में एक बढ़ता हुआ दबाव महसूस हुआ। पेशाब का दबाव।

उसने करवट बदलने की कोशिश की, सोचा कि शायद इससे राहत मिले, लेकिन दबाव और बढ़ गया। अब उठने के सिवा कोई चारा नहीं था। उसने बहुत धीरे से, बिना आवाज़ किए, खुद को सुहाना की बाहों से आज़ाद किया और चादर हटाकर बिस्तर से नीचे पैर रखे। कमरे में घोर अँधेरा था, बस एसी की छोटी सी हरी बत्ती एक जुगनू की तरह चमक रही थी।

सनाया अँधेरे में दीवारों को टटोलती हुई, किसी बिल्ली की तरह दबे पाँव कमरे के दरवाज़े तक पहुँची। उसने दरवाज़ा खोला, जो एक हल्की सी 'चर्र' की आवाज़ के साथ खुला। वह एक पल के लिए रुकी, यह देखने के लिए कि कहीं सुहाना की नींद खराब तो नहीं हो गई, लेकिन कोई हलचल नहीं हुई।

हॉल में अँधेरा और भी गहरा था। बस किचन में फ्रिज के ऊपर लगी एक छोटी सी नीली लाइट मद्धिम रोशनी फैला रही थी। उस अलौकिक नीली रोशनी में, सनाया हॉल पार करके बाथरूम तक पहुँची। उसने अंदर जाकर दरवाज़ा बंद किया और लॉक किया।

बाथरूम में घुसते ही एक अजीब सी शांति और अकेलेपन का एहसास हुआ। उसने लाइट जलाई। सफेद टाइलों और पीले बल्ब की रोशनी ने एक पल के लिए उसकी आँखों को चौंधिया दिया। उसने अपनी आँखों को सिकोड़ा और फिर टॉयलेट सीट की तरफ बढ़ी।

उसने अपनी नीले रंग की छोटी स्कर्ट को ऊपर उठाया और फिर अपनी गुलाबी रंग की चड्डी को घुटनों तक नीचे सरका दिया। वह टॉयलेट पर बैठ गई, लेकिन पेशाब करने की पारंपरिक मुद्रा में नहीं। वह थोड़ा आगे की ओर झुकी और अपनी जांघों को जितना हो सका, उतना फैला दिया, ठीक किसी देहाती औरत की तरह जो खेतों में बैठती है।

उसने अपनी उंगलियों का इस्तेमाल किया। अपनी दाईं हाथ की दो उंगलियों से, उसने अपनी चूत के बाहरी, मांसल होंठों को पकड़कर अगल-बगल खींच लिया।

पीले बल्ब की सीधी रोशनी में, उसकी अठारह साल की, अनछुई, अव्यवस्थित चूत का पूरा नज़ारा उजागर हो गया। यह किसी पोर्न फिल्मों में दिखने वाली साफ़-सुथरी, सजी-संवरी चूत नहीं थी। यह असली थी, यह कच्ची थी। हल्के साँवले रंग की त्वचा पर, बीच का हिस्सा गहरा भूरा, लगभग बैंगनी रंग का था। ऊपर घने, उलझे हुए, अनकटे बालों का एक छोटा सा जंगल था, जो नीचे की ओर आते-आते विरल हो गया था। जब उसने होंठों को खींचा, तो अंदर की गुलाबी, गीली त्वचा दिखाई दी। बीच में एक छोटी सी, मटर के दाने जैसी घुंडी थी—उसका क्लिटोरिस—जो इस अचानक हुए अनावरण से शर्मिंदा होकर अपने हुड में छिपी हुई थी। और उसके ठीक नीचे, एक छोटा सा, कसकर बंद छेद था—पेशाब का रास्ता।

सनाया ने दबाव डाला।

स्सsssss...

एक तेज़, पीली धार उस छोटे से छेद से निकली और सीधा नीचे टॉयलेट के पानी से टकराई, जिससे छपाक-छपाक की तेज़ आवाज़ पैदा हुई। धार इतनी तेज़ थी कि पानी के छींटे उछलकर उसकी जांघों तक आ गए। कुछ सेकंड तक वह उसी तरह बैठी रही, अपनी चूत को फैलाए हुए, जब तक कि उसके मूत्राशय का आखिरी कतरा भी बाहर नहीं निकल गया। धार धीरे-धीरे कमज़ोर होकर बूंदों में बदल गई और फिर बंद हो गई। उसने अपनी उंगलियाँ हटाईं। उसकी चूत के होंठ वापस अपनी जगह पर आकर बंद हो गए, जैसे कोई राज़ छुपा रहे हों। उसने खड़े होकर फ्लश चलाया। पानी की गड़गड़ाहट ने बाथरूम की खामोशी को तोड़ दिया। उसने अपनी चूत पर नज़र डाली। पेशाब की आखिरी कुछ बूंदें उसके घने बालों में उलझकर मोतियों की तरह चमक रही थीं। उसने उन्हें पोंछने की ज़हमत नहीं उठाई। शायद अनुभवहीनता के कारण, या शायद आधी नींद में होने की वजह से। उसने बस अपनी चड्डी को ऊपर खींचा और फिर अपनी स्कर्ट को नीचे कर लिया।

उसने लाइट बंद की और दरवाज़ा खोलकर बाहर आ गई। अँधेरे में उसकी आँखों को अभ्यस्त होने में कुछ पल लगे। उसका इरादा सीधे सुहाना के कमरे में वापस जाने का था, लेकिन तभी उसे एक आवाज़ सुनाई दी। यह एक बहुत ही दबी हुई, अजीब सी आवाज़ थी। पहले उसे लगा कि शायद एसी से आ रही है, लेकिन यह आवाज़ वैसी नहीं थी। यह आवाज़... यह इंसानी थी।

आहह... ओहह... यस...

किसी औरत की दबी-दबी सिसकियाँ, जो अंग्रेज़ी में थीं। और उन सिसकियों के साथ एक और आवाज़ थी... एक लयबद्ध, गीली आवाज़... फच... फच... फच... जैसे कोई गीले मांस के टुकड़े को दूसरे टुकड़े पर मार रहा हो।

सनाया जहाँ थी, वहीं जम गई। उसके दिल की धड़कन तेज़ हो गई। यह कैसी आवाज़ें हैं? घर में तो बस वो, सुहाना और सूरज अंकल ही थे।

फास्टर... ओह गॉड... हार्डर...

अब आवाज़ और साफ़ हो गई थी। सिसकियाँ अब कराह में बदल रही थीं। डर के मारे सनाया के रोंगटे खड़े हो गए। क्या घर में कोई चोर घुस आया है?

लेकिन डर के ऊपर उसकी जिज्ञासा हावी हो गई। वह किसी जासूस की तरह, दीवारों के सहारे, बिना कोई आवाज़ किए, उस आवाज़ की दिशा में बढ़ने लगी। आवाज़ सूरज अंकल के कमरे से आ रही थी। उसका दिल अब उसके सीने में किसी ढोल की तरह बज रहा था। उसने खुद को लगभग डाँटा। हो सकता है अंकल टीवी देख रहे हों। शायद कोई फिल्म चल रही हो।

लेकिन यह किसी फिल्म जैसा नहीं लग रहा था। यह बहुत... असली लग रहा था।

वह अंकल के कमरे के दरवाज़े तक पहुँच गई। दरवाज़ा पूरी तरह से बंद नहीं था, उसमें एक पतली सी दरार थी। उन्हीं आवाज़ों के साथ अब एक मर्द के हाँफने की आवाज़ भी आ रही थी। अंघ... हूँह...

सनाया ने गहरी साँस ली और अपनी एक आँख उस दरार पर टिका दी।

और जो उसने अंदर देखा, उससे उसकी साँसें उसी पल रुक गईं।

कमरे में अँधेरा था, लेकिन एक नीली रोशनी थी जो बिस्तर पर लेटे सूरज अंकल के चेहरे पर पड़ रही थी। यह रोशनी उनके हाथ में पकड़े मोबाइल फ़ोन से आ रही थी। फ़ोन की स्क्रीन पर दो नंगे जिस्म एक-दूसरे से लिपटे हुए थे, एक औरत और एक मर्द, जो जानवरों की तरह चुदाई कर रहे थे।

लेकिन सनाया की नज़र फ़ोन पर नहीं थी।

उसकी नज़र सूरज अंकल पर थी। वह बिस्तर पर नंगे लेटे हुए थे, उनकी पीठ तकिये से टिकी हुई थी। एक हाथ में मोबाइल था, और उनका दूसरा हाथ... उनका दूसरा हाथ उनके पैरों के बीच में था, जहाँ से उनका मोटा, सख्त, नसदार लंड किसी हथियार की तरह सीधा खड़ा था। उनकी मुट्ठी उस लंड पर कसकर जमी हुई थी और वह उसे मोबाइल की स्क्रीन पर चल रहे दृश्य की लय के साथ, तेज़ी से आगे-पीछे हिला रहे थे।

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