Chp 1
अज्ञात POV
दस साल का एक लड़का सड़क के बीचों-बीच भाग रहा था। वह गाड़ियों की हेडलाइट्स से बचते हुए हर बाइक और कार के सामने से निकल रहा था। तेज़ बारिश हो रही थी, जिसकी वजह से रात में उसे कुछ भी साफ़ दिखाई नहीं दे रहा था।
उसकी छोटी-सी मुट्ठी में ब्रेड का एक पैकेट कसकर दबा हुआ था। उसकी धंसी हुई आँखों से आँसू बहकर बारिश के पानी के साथ मिल रहे थे। वह नंगे पैर अपनी जान बचाने के लिए तेज़ी से भागा जा रहा था। तभी पीछे से कुछ लोग "चोर! चोर!" चिल्लाते हुए उसका पीछा कर रहे थे।
उसने अचानक एक तीखा मोड़ लिया और छोटे से जंगल की ओर दौड़ पड़ा। कुछ मिनट बाद, जब वह उनसे पीछा छुड़ाने में कामयाब हो गया, तो उसके घुटनों ने जवाब दे दिया। वह एक बड़े पेड़ के पास गिर पड़ा, जो उसे मूसलाधार बारिश से थोड़ा बचा रहा था।
वह हाँफ रहा था और ज़ोर-ज़ोर से सांसें ले रहा था, तभी वह खिसककर पेड़ के खुरदरे तने के सहारे बैठ गया। उसके हाथ और पैर गंदगी से सने थे। जो कपड़े उसे कभी बहुत पसंद थे, वे अब बस चिथड़ों में बदल चुके थे, जो उसके दुबले-पतले शरीर पर किसी तरह लटके हुए थे। कांपती उंगलियों से उसने जल्दी-जल्दी ब्रेड का पैकेट खोला।
उसने ब्रेड के दो बासी टुकड़े निकाले और भूखों की तरह उन्हें खाने लगा। उसने अपने आँसू पोंछे और नज़रें नीचे ही रखीं, इस डर से कि कोई उससे उसका यह मामूली सा इनाम छीन न ले। वह कितने दिनों से भूखा था? उसे याद नहीं था। आज भूख बर्दाश्त से बाहर हो गई थी, इसलिए उसने एक खुली दुकान से चोरी कर ली थी। उसने दुकानदार से मदद माँगने की कोशिश की थी, लेकिन उन्होंने उसे धक्का देकर भगा दिया था।
खाली पैकेट को मरोड़कर अपनी छोटी-सी जेब में डालते हुए, उसके पेट में भूख की मरोड़ अभी भी बाकी थी। तभी उसके छोटे से होंठों से एक सिसकी निकल पड़ी। उसके माता-पिता को मरे एक महीना हो चुका था। वह असल में "मरने" का मतलब नहीं समझता था। जब उसने अपने चाचा से पूछा था, तो उस आदमी ने निर्दयता से जवाब दिया था कि वे उसे हमेशा के लिए छोड़ गए हैं और कभी वापस नहीं आएंगे।
उसके चाचा ने उसे सड़कों पर लावारिस छोड़ दिया था। उसे याद था कि कैसे सुबह उसकी आँख कूड़ेदान के पास खुली थी। वह घंटों तक बुरी तरह डरकर रोया था, अपने घर से इतनी दूर किसी अनजान जगह पर खो गया था। यहाँ की जगह कितनी डरावनी थी, कोई भी उसके प्रति दयालु नहीं था।
उसे अपने माता-पिता की बहुत याद आ रही थी।
उनकी गर्माहट भरी गोद और अपने घर का सुकून। सुबकते और हिचकियां लेते हुए, उसे अपने पिता याद आए जो माँ के डांटने पर उसे बचा लिया करते थे। उसे वो पल भी याद आए जब वे दोनों छुपकर टॉफियां खाते थे और हर बार पकड़े जाते थे।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे, वापस जाने का रास्ता कैसे ढूंढे, या मदद के लिए किससे पूछे। वह तब से सड़कों पर भटक रहा था, अपने अतीत की यादों के साथ रो रहा था। आखिरकार, थकान के मारे वह गीली मिट्टी में ही सो गया, और अपने छोटे से शरीर को सिकोड़कर गेंद जैसा बना लिया। बारिश लगातार हो रही थी और ठंडी हवाएं चल रही थीं, सूखी और गीली पत्तियां उसके ऊपर गिर रही थीं, जैसे उसके कांपते हुए छोटे शरीर के लिए कंबल का काम कर रही हों।
अगली सुबह जब सूरज की किरणें आसमान में चमकने लगीं, तो वह जंगल से निकलकर वापस सड़क पर आ गया। उसके कपड़े अब सूख चुके थे, लेकिन उन पर मोटी सूखी हुई कीचड़ चिपकी थी। उसने अपनी फटी हुई टी-शर्ट से खुद को साफ करने की कोशिश की, पर कोई फायदा नहीं हुआ। उसकी छोटी, भूरी आँखें घबराहट में इधर-उधर घूम रही थीं। उसे अभी भी डर था कि कहीं दुकानदार उसे पकड़ न ले और मार न डाले। उसने लोगों को चोरी के इल्जाम में बेरहमी से पिटते देखा था, जिन्हें टूटे हुए शरीर के साथ सड़क पर मरने के लिए छोड़ दिया जाता था।
डर के मारे, उसने लंबा रास्ता चुना और अपने छालों भरे नंगे पैरों से चलने लगा, उसे ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि उसकी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदलने वाली है।
उसी वक़्त, एक काली मर्सिडीज उसके पास से गुज़री। अंदर, एक छोटी लड़की अपनी गुड़िया के साथ खेल रही थी और अपने परिवार के साथ खिलखिला रही थी, वह उस काले तूफ़ान से अनजान थी जो उसके ठीक पीछे था।
और फिर, नियति और कर्म का खेल शुरू हुआ।