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रक्त महल

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सारांश

प्रस्तावना साल 2004। उत्तर भारत के घने जंगलों में एक विशाल, 250 साल पुरानी हवेली खड़ी थी। स्थानीय लोग उसे "रक्त महल" कहते थे। दिन में भी वहाँ कोई जाने की हिम्मत नहीं करता था। गाँव वालों का कहना था कि हर पूर्णिमा की रात हवेली की टूटी खिड़कियों में लाल रोशनी दिखाई देती है, और जंगल में अजीब घंटियों की आवाज़ गूँजती है। पिछले 50 वर्षों में जो लोग वहाँ गए, उनमें से कई कभी वापस नहीं लौटे। कुछ लौटे भी, तो उनका मानसिक संतुलन बिगड़ चुका था। लोग कहते थे— "महल किसी को मारता नहीं... पहले उसका डर उसे तोड़ता है।"

स्थिति
२ महीने पहले
अध्याय
1
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n/a
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16+

एपिसोड 1: शापित हवेली

साल 2004।

उत्तर भारत के घने जंगलों में एक विशाल, 250 साल पुरानी हवेली खड़ी थी। स्थानीय लोग उसे "रक्त महल" कहते थे।

दिन में भी वहाँ कोई जाने की हिम्मत नहीं करता था।

गाँव वालों का कहना था कि हर पूर्णिमा की रात हवेली की टूटी खिड़कियों में लाल रोशनी दिखाई देती है, और जंगल में अजीब घंटियों की आवाज़ गूँजती है।

पिछले 50 वर्षों में जो लोग वहाँ गए, उनमें से कई कभी वापस नहीं लौटे। कुछ लौटे भी, तो उनका मानसिक संतुलन बिगड़ चुका था।

लोग कहते थे—

"महल किसी को मारता नहीं... पहले उसका डर उसे तोड़ता है।"

रात के 8 बजे।

पाँच दोस्त अपनी SUV से जंगल में प्रवेश करते हैं।

आरव – शांत और बहादुर।

कबीर – निडर, लेकिन घमंडी।

रिया – समझदार और सतर्क।

मीरा – इतिहास की छात्रा।

करण – कैमरा लेकर डॉक्यूमेंट्री बनाने वाला।

वे एक वीडियो चैनल के लिए "भारत की सबसे डरावनी हवेली" पर फिल्म बनाने आए थे।

अचानक...

इंजन बंद।

मोबाइल नेटवर्क गायब।

हवा बिल्कुल शांत।

तभी दूर कहीं से बच्चों के हँसने जैसी आवाज़ आती है।

लेकिन आसपास कोई नहीं था।

कुछ देर पैदल चलने के बाद वे हवेली तक पहुँचते हैं।

विशाल लोहे का दरवाज़ा जंग से भरा हुआ था।

जैसे ही आरव ने उसे छुआ...

क्रीईईईईक...

दरवाज़ा अपने आप खुल गया।

अंदर धूल, टूटे झूमर, पुरानी पेंटिंग और लंबी अँधेरी गलियाँ थीं।

दीवारों पर जगह-जगह पंजों के निशान थे।

मीरा को एक पत्थर की पट्टिका मिली।

उस पर लिखा था—

"जो यहाँ सत्य खोजने आएगा... उसे पहले अपने सबसे बड़े भय का सामना करना होगा।"

टीम अलग-अलग कमरों की रिकॉर्डिंग करने लगती है।

करण के कैमरे में कुछ सेकंड के लिए सफेद कपड़ों में खड़ी एक रहस्यमयी आकृति दिखाई देती है।

जब वह पीछे मुड़कर देखता है...

वहाँ कोई नहीं होता।

कैमरा फिर उसी दिशा में करता है—

आकृति फिर दिखाई देती है।

लेकिन इस बार वह पहले से ज़्यादा पास होती है।

हवेली के बीचों-बीच उन्हें एक गुप्त दरवाज़ा मिलता है।

नीचे उतरते ही हवा ठंडी हो जाती है।

दीवारों पर पुराने प्रतीक बने थे।

बीच में एक टूटा हुआ सिंहासन था।

उसके सामने एक पुरानी डायरी रखी थी।

पहले पन्ने पर लिखा था—

"अगर यह डायरी पढ़ रहे हो... तो शायद बहुत देर हो चुकी है।"

अचानक...

ऊपर से ज़ोरदार धमाका होता है।

पूरी हवेली काँपने लगती है।

सभी लोग बाहर निकलने के लिए दौड़ते हैं।

लेकिन जिस रास्ते से आए थे...

वहाँ अब दीवार थी।

हवेली का नक्शा बदल चुका था।

गलियारे पहले जैसे नहीं रहे।

रिया घबराकर कहती है—

"हम रास्ता भूल गए..."

तभी अँधेरे में भारी कदमों की आवाज़ सुनाई देती है।

ठक... ठक... ठक...

टॉर्च की रोशनी में एक लंबी काली आकृति दिखाई देती है।

उसका चेहरा छाया में छिपा है।

वह बिना कुछ बोले धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ती है।

सब भागने लगते हैं।

आरव पीछे मुड़कर देखता है—

लेकिन आकृति गायब हो चुकी होती है।

अंतिम दृश्य (क्लिफहैंगर)

सुबह होने वाली होती है।

दोस्त सोचते हैं कि वे बच गए।

तभी करण कैमरा चालू करता है।

कैमरे की स्क्रीन पर पाँच नहीं...

छह लोग दिखाई देते हैं।

छठा व्यक्ति उनके ठीक पीछे खड़ा है।

लेकिन जब वे पीछे मुड़ते हैं...

वहाँ कोई नहीं होता।

अचानक कैमरा अपने आप बंद हो जाता है।

और हवेली में फिर वही धीमी हँसी गूँजती है...

"अब खेल शुरू हुआ है..."


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