Chapter 1 → पहला Ticket 🎟️
सुबह के लगभग 10 बजकर 10 मिनट हुए थे।
मैं Bus Stand पर खड़ी 727 का Wait कर रही थी।
मेरी Job का समय सुबह 11 बजे का था और यह मेरी First Job थी। पहली बार किसी जगह काम करने जा रही थी, इसलिए मन में एक अजीब-सी घबराहट थी। मुझे काम की ज़्यादा Knowledge नहीं थी और न ही यह पता था कि वहाँ जाकर मुझे क्या-क्या Manage करना होगा।
बार-बार मन में यही सवाल आ रहे थे—
क्या मैं काम ठीक से कर पाऊँगी?
क्या मुझे सब कुछ जल्दी समझ आएगा?
अगर मुझसे कोई गलती हो गई तो?
शायद पहली Job पर जाने से पहले ऐसे सवाल आना स्वाभाविक था।
उस दिन मैंने Purple Cord Set पहन रखा था। ऊपर से चादर ओढ़ी हुई थी और चेहरे पर Black Mask लगा रखा था।
मैं बस का इंतज़ार कर रही थी और साथ-साथ समय भी देख रही थी।
फिर लगभग 10 बजकर 20 मिनट या उसके कुछ मिनट बाद मेरी बस आ गई।
727।
बस को देखते ही मन में थोड़ी राहत हुई।
कम-से-कम मैं Time पर पहुँचने वाली थी।
मैं बस में चढ़ी और मेरी नज़र हमेशा की तरह Window Seat पर चली गई।
उस दिन मुझे Window Seat मिल गई।
मैं बैठी और सबसे पहले अपना Phone Check किया।
मैं यह देखना चाहती थी कि उस एक शख्स का कोई Message आया है या नहीं।
शायद मैं उसी के साथ Chatting करते हुए जा रही थी।
मेरी घबराहट में उस सुबह सिर्फ़ मेरी Job ही शामिल नहीं थी। शायद मेरा मन कहीं और भी लगा हुआ था।
बस आगे बढ़ती रही।
मैं Window से बाहर देख रही थी।
लेकिन आज इतने समय बाद मुझे ठीक-ठीक याद नहीं कि उस दिन मैंने बाहर क्या देखा था।
शायद सड़क।
शायद लोग।
शायद दुकानें।
या शायद मैं कुछ भी ठीक से नहीं देख रही थी।
क्योंकि कभी-कभी हमारी आँखें बाहर देख रही होती हैं, लेकिन हमारा मन कहीं और होता है।
उस दिन शायद मेरे साथ भी ऐसा ही था।
मैं कभी अपनी Job के बारे में सोच रही थी, कभी इस बात के बारे में कि वहाँ जाकर क्या करना होगा और शायद कभी उसी शख्स के बारे में भी।
मैं थोड़ी Nervous थी।
लेकिन मेरे अंदर एक छोटी-सी खुशी भी थी।
क्योंकि मुझे Books पढ़ना सच में अच्छा लगता था।
और मेरी Job एक Bookstore में थी।
किताबों के बीच काम करना सुनने में जितना अच्छा लगता था, वहाँ जाकर वास्तव में काम करना मेरे लिए उतना ही नया था।
Books पढ़ना और Books के बीच काम करना—दो अलग बातें थीं।
यह बात शायद मुझे उसी दिन समझ आने वाली थी।
कुछ देर बाद मैं South Ex के Bus Stand पर उतर गई।
वहाँ से मुझे Subway के रास्ते जाना था। ज़्यादा दूर नहीं था, इसलिए मैं पैदल ही Bookstore की ओर चल पड़ी।
और फिर मैं वहाँ पहुँच गई।
मेरी First Job।
मेरी पहली Bookstore।
लेकिन सच कहूँ तो मुझे Bookstore को बाहर से देखकर उतनी खुशी नहीं हुई, जितनी अंदर रखी हुई अलग-अलग तरह की Books को देखकर हुई।
इतनी सारी किताबें।
अलग-अलग विषयों की।
अलग-अलग रंगों की।
अलग-अलग आकारों की।
चारों तरफ़ किताबें ही किताबें थीं।
और किताबों की खुशबू भी मेरे संग थी।
उन्हें देखकर मेरी घबराहट के बीच कहीं एक छोटी-सी खुशी जागी।
शायद मैंने मन ही मन सोचा होगा—
"हाँ, शायद मैं यहाँ काम कर सकती हूँ।"
पहला दिन था।
बहुत कुछ नया था।
काम की पूरी जानकारी नहीं थी।
फिर भी मैं धीरे-धीरे सब समझने की कोशिश कर रही थी।
उसी दिन वहाँ काम करने वाले एक लड़के ने मुझे चाय दी।
मैंने मना भी किया।
"मैं चाय नहीं पीती।"
लेकिन उसने फिर भी कहा—
"पी लो।"
और आज तक मुझे ठीक से याद नहीं कि मैंने वह चाय पी थी या नहीं।
शायद कुछ चीज़ें उस समय इतनी छोटी लगती हैं कि हम उन्हें याद रखने की कोशिश ही नहीं करते।
लेकिन बाद में वही छोटी-छोटी बातें अचानक यादों का हिस्सा बन जाती हैं।
उस दिन की चाय भी शायद ऐसी ही एक छोटी-सी याद थी।
और फिर था—
मेरा पहला Bus Ticket।
मैंने अपना पहला Ticket फेंका नहीं था।
उसे अपने पास रख लिया था।
उस समय मुझे खुद नहीं पता था कि मैंने वह Ticket क्यों रखा।
वह सिर्फ़ एक छोटा-सा कागज़ था।
एक ऐसी चीज़, जिसका काम बस इतना था कि वह मेरे सफ़र का Proof बने और फिर किसी कूड़ेदान में चली जाए।
लेकिन मैंने उसे नहीं फेंका।
मैंने उसे संभालकर रख लिया।
शायद इसलिए क्योंकि वह मेरी First Job के पहले दिन का हिस्सा था।
शायद इसलिए क्योंकि वह उस सफ़र के साथ आया था।
या शायद बिना किसी वजह के।
कभी-कभी हम किसी चीज़ को संभालकर रखने का कारण उसी समय नहीं समझ पाते।
उसका कारण बहुत बाद में समझ आता है।
शाम को जब मैं वापस घर के लिए निकली, तो इस बार मेरे भीतर सुबह जितनी Nervousness नहीं थी।
दिन बीत चुका था।
मैं अपनी पहली Job पर जा चुकी थी।
काम कर चुकी थी।
और अब मैं फिर उसी Bus के सफ़र पर थी।
मेरे पास मेरा Lunch Box था।
और उस Lunch Box के साथ जुड़ी हुई उस दिन की एक और छोटी-सी याद थी।
और मेरे पास एक छोटा-सा Ticket भी था।
मेरी First Job का पहला Ticket।
तब मुझे नहीं पता था कि यह सिर्फ़ पहला Ticket है।
मुझे नहीं पता था कि इसके बाद ऐसे कितने Tickets मेरे पास जमा होने वाले हैं।
मुझे नहीं पता था कि कभी मेरे पास इन छोटे-छोटे कागज़ों का इतना बड़ा ढेर होगा कि उनमें मुझे अपनी ज़िंदगी के कई दिन दिखाई देने लगेंगे।
कुछ Window Seat के होंगे।
कुछ भीड़ में खड़े होकर किए गए सफ़र के।
कुछ खुशी के दिनों के।
कुछ थकान के।
कुछ ऐसे दिनों के जिन्हें मैं याद रखना चाहूँगी।
और शायद कुछ ऐसे भी, जिन्हें भूल जाना चाहूँगी।
लेकिन हर Ticket के साथ एक सफ़र था।
एक दिन था।
एक याद थी।
और धीरे-धीरे...
एक कहानी भी।
उस दिन मैं बस से घर लौट रही थी।
मेरे हाथ में कुछ नहीं बदला था।
मेरी ज़िंदगी भी शायद वैसी ही थी।
लेकिन मेरे पास एक छोटा-सा Ticket था, जिसे मैंने जाने-अनजाने अपने पास रख लिया था।
मुझे तब नहीं पता था कि मैंने सिर्फ़ एक Ticket नहीं संभाला था।
मैंने अपनी कहानी का पहला पन्ना संभाल लिया था।
लेकिन मुझे कहाँ पता था...
कि यह सिर्फ़ पहला Ticket था।
आने वाले दिनों में मेरी इस छोटी-सी आदत के साथ मेरी ज़िंदगी की कितनी कहानियाँ जुड़ने वाली थीं।
और अगला Ticket... शायद सिर्फ़ एक सफ़र का नहीं था।