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सूखी स्याही

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Summary

एक छोटी सी रोमांचक कहानी

Genre
Mystery
Author
Adddyyy
Status
Complete
Chapters
1
Rating
n/a
Age Rating
13+

सूखी स्याही

एक शाम मै अपनी खिड़की के पास बैठी अपनी अगली कहानी सोच रही थी।सब कुछ बहुत शांत था।पर आज की शांति कुछ चुभ सी रही थी।ना हवा से पत्तो के हिलने की आवाज़, ना चिड़िया की चहक,ना गली में खेलते बच्चो की खिलखिलाहट।ये खामोशी अब सन्नाटा प्रतीत हो रही थी।मेरा मन भी उदास था।शायद इस सन्नाटे की वजह से ही।बाहर से गीली मिट्टी की खुशबू आ रही थी जो मुझे अपने बचपन के दिनों की याद दिलाने लगी।दिल में थोड़ा बोझ और होंठो पर हल्की सी मुस्कान लिए मैंने उन दिनो का स्मरण किया जब मै बचपन में मिट्टी के बर्तन बना कर खेला करती थी। मेरी मां मेरे बनाए बर्तनों में मुझे चिड़िया के चुग्गे जितना खाना डाल कर देती और मै बड़े शौक से खाती। मां मेरे बर्तनों को सोने के बर्तन बुलाती और मै उनमें राजकुमरी की तरह खाना खाती। हाय! काश वो दिन वापस आ पाते।

इन ख़यालो के चलते मै अपनी कहानी नहीं सोच पा रही थी।इसलिए मैंने बाहर जाकर कुछ लिखने का निर्णय किया। मै अपनी किताब और कलम लेकर अपने मकान के पास वाले पार्क में चली गई। वहां बैठकर कुछ देर इधर उधर देखा तो मेरी नज़र सामने स्थित बैंक पर पड़ी और मुझे मेरी अगली कहानी का विषय मिल गया।

मेरी कहानी का सार था कि एक बैंक में चोरी हो जाती है और वहां पर मौजूद एक लड़की कैसे अपनी जान गंवा कर वहां के लोगो की मदद करती है और बैंक को चोरी से बचाती है। पर उस लडकी की जान चली गई , इस अंत से मै संतुष्ट नहीं थी इसलिए मैंने उसको बदलने का फैसला किया। मैंने तय किया कि उस लडकी की बचने की उम्मीद कम होगी, एक पल को तो वो अपनी सांसे गवा भी चुकी होगी पर अंत में वो बच जाएगी।

मैंने अपनी कहानी लिखनी शुरू की। सबकुछ अच्छा चल रहा था। मेरी कहानी बस पूरी ही होने वाली थी कि अचानक मैंने अपने आस पास हड़बड़ाहट महसूस की। जब ध्यान से सुना तो पता चला सामने वाले बैंक मै चोर घुस आए हैं। मेरे पसीने छूट गए। क्या सच में? मै अभी तो ये कहानी लिख रही थी। क्या ऐसा सच में हो रहा है? जल्दी से मैंने अपनी लिखी आखरी लाइनों को देखा जिसमें लिखा था -

" उस लडकी के बचने की कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही थी। शायद हम उस हिम्मती लड़की को खो चुके थे।"

ये क्या? मैंने अपनी कहानी यहां तक ही लिखी थी। कहीं सच में ऐसा ना हो जाए। मैंने सोचा अगर सच में मेरी कहानी ही आज सच हो रही है तो मै जल्दी से इसका अंत लिख देती हूं। और सब ठीक कर देती हूं। मैंने हड़बड़ाहट में अपनी कलम जल्दी से कागज पर चलाई और ये क्या? मेरी कलम नहीं चल रही थी। आश्चर्य की बात है, अभी तो मै इस कलम से लिख रही थी। फिर अचानक कैसे!! मै बहुत घबरा गई और जल्दी से अपने घर की ओर कलम लेने मुड़ी ही थी कि अचानक एक गोली चलने की आवाज आई। वो आवाज बहुत तेज़ थी। एक पल को मानो सब रुक गया था।वो आवाज पूरे शहर में गूंज गई। पूरी भीड़ शांत हो गई। पुलिस भी आ चुकी थी पर बैंक डकैती मै गोली चल जाएगी, शायद ये अंदाजा किसी ने नहीं लगाया था। पूरा माहौल खौफनाक था। मेरे पैरो के नीचे से मानो ज़मीन ही खिसक गई। मै सुन्न एक तरफ खड़ी सब देख रही थी।कहीं किसी लड़की को तो गोली नहीं लग गई? नहीं नहीं! ऐसा कैसे हो सकता है! अंदर ही अंदर मै अपनेआप से कहने लगी - काश मैंने ये कहानी लिखी ही ना होती या फिर काश वो कलम चल गई होती। काश!!

मेरी आंखो में पानी था। अब और सहन नहीं हो रहा था मुझसे। मै आंखो में आंसू लिए घर की तरफ दौडी।मेरी वजह से किसी की जान जाए मै ऐसा हरगिज़ नहीं होने दूंगी। घर पहुंचते ही मैंने गुस्से में कलम उठा कर लिख दिया -"कुछ नहीं हुआ उस लडकी को। वो ज़िंदा है और हमेशा ज़िंदा रहेगी।" ये कैसे संभव है कि कोई हमेशा ज़िंदा रहे? पर उस समय मै बहुत भावुक थी और उत्तेजित होकर ऐसा लिख दिया।

  कुछ और ना लिखा गया मुझसे।टीवी ऑन किया तो देखा सच में एक लड़की को गोली लगने की खबर आई है। अब मै अपना आपा खो चुकी थी और मै ज़ोर ज़ोर से रोने लगी। काश ये कहानी मैंने कभी लिखी ही ना होती। इस सबका दोषी मै अपने आप को मान रही थी। मुझे लग रहा था मानो मैंने ही उस लडकी की जान खतरे में डाली हो। पर अब तो मैंने उसका अंत ठीक कर दिया था। हो सकता है अब सब ठीक हो जाए। कुछ देर बाद जाकर न्यूज चैनल लगाया तो देखा कि एक लड़की ने चोरों से लडने की कोशिश की। वो एक बच्ची कि जान बचाते वक्त अपनी जान खो बैठी।

पुलिस ने चोरों को पकड़ लिया, पर उस लडकी की जान ना बच पाई।

अब ये क्या है? जब सब कुछ मेरे लिखे अनुसार ही था तो ये क्यों नहीं? क्यों उस लडकी की जान नहीं बच पाई? क्यों?

मैं अपने आप को बुरी तरह कोसने लगी। क्या सच में मेरे लिखने से ये सब हुआ या ये सिर्फ एक संयोग था? मै बार बार अपने आप से ये सवाल पूछ रही थी। पर इसका जवाब शायद किसी के पास ना था। खुद से ही उलझते अलझते पूरी रात निकल गई। उस पूरी रात मुझे नींद नहीं आई। सुबह ५ बजे मेरी आंख लगी। फिर जब मै उठी तो घड़ी में ८ बज रहे थे। मैंने खुद को समझाते हुए बोला-" मेरी वजह से नहीं हुआ ये सब।  सब एक संजोग था और कुछ नहीं।" ये कहकर मैंने गहरी सांस ली ,बिस्तर से उतरी और अखबार में कल हुई घटना की खबर पढ़ने लगी। उसमे लिखा था-"कल की दुर्घटना में एक बहादुर लड़की ने अपनी जान की बाज़ी लगा कर एक बच्ची की जान बचाई। उसका नाम एडी उम्र 2 साल थी। मां ने अपनी बेटी के साहस की सराहना करते हुए भारी दिल से कहा मेरी बेटी को कुछ नहीं हुआ। वो ज़िंदा है और हमेशा जिंदा रहेगी।"




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