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कामुक अंगूर

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Summary

देव और सुखजोत के बीच एक अजीब सी तनावपूर्ण माहौल बन जाता है जब सुखजोत देव के घर आती है। देव की पत्नी घर पर नहीं है, और सुखजोत देव के लैपटॉप का उपयोग करने के लिए आती है। देव सुखजोत की मौजूदगी से उत्तेजित महसूस करता है, लेकिन वह अपने आप को रोकने की कोशिश करता है। सुखजोत देव से एक अजीब सवाल करती है, जिससे…

Genre
Erotica/Other
Author
You
Status
Ongoing
Chapters
1
Rating
5.0 1 review
Age Rating
18+

Chapter 1

देव ने दरवाज़ा बंद करते हुए सुखजोत की ओर देखा, उसकी नज़रें उसके चेहरे पर टिकी थीं। “दीदी कहाँ हैं?” सुखजोत ने अपनी नज़रें चुराते हुए पूछा, उसकी आवाज़ में एक हल्की सी घबराहट थी। “वो तो घर पर नहीं है, इतना काम क्यों था?” देव ने कहा, उसकी आवाज़ में एक हल्की सी हँसी थी। सुखजोत ने अपने कंधे उचकाए, “बस वैसे ही, चलो फिर मैं चलती हूँ।”

देव ने उसकी बात काटी, “क्या नहीं तो क्यों हुआ, मैं तो हूँ। आओ, चलो थोड़ी देर ही बैठ जाओ।” उसने लिविंग रूम में बैठने का इशारा किया और खुद भी उसके सामने बैठ गया। कमरे का माहौल एकदम शांत था, सिर्फ दीवार घड़ी की टिक-टिक की आवाज़ सुनाई दे रही थी। सुखजोत ने अपने बालों को पीछे किया, उसकी उंगलियाँ धीरे-धीरे अपने कान के पीछे से होते हुए गले तक गईं, “ऐसे कैसे हो भाभी?”

“मैं ठीक हूँ,” सुखजोत ने कहा, उसकी आवाज़ में एक हल्की सी शरारत थी। “बस, थोड़ा बोर हो रही थी, सोचा दीदी से मिल लूँ।” देव ने उसकी ओर देखा, उसकी नज़रें सुखजोत के चेहरे पर टिकी थीं, जैसे वह उसकी आत्मा को पढ़ने की कोशिश कर रहा हो। “चलो इसी बहाने आप आई तो सही,” देव ने कहा, उसकी आवाज़ में एक हल्की सी मुस्कान थी।

सुखजोत की नज़र देव के लैपटॉप पर पड़ी, जो अभी भी खुला हुआ था। “क्या आप काम कर रहे हो? क्या मैं आपका लैपटॉप इस्तेमाल कर सकती हूँ? मुझे कुछ चेक करना है।” देव ने एक पल के लिए झिझक महसूस की, क्योंकि उसे याद आया कि उसके भाई की हिस्टरी में मीना पोर्न के कुछ वीडियो खुले हुए थे। लेकिन उसने तुरंत अपनी झिझक को दूर किया और कहा, “हाँ, बिल्कुल। यहाँ लो,” उसने लैपटॉप सुखजोत की ओर बढ़ाया।

सुखजोत ने लैपटॉप लिया और उसे अपने सामने रख लिया। उसने ब्राउज़र खोला और गूगल पर कुछ सर्च करना शुरू किया। देव ने अपनी सांस रोक ली, क्योंकि उसे डर था कि सुखजोत उसकी ब्राउज़िंग हिस्टरी देख लेगी। लेकिन सुखजोत ने कुछ भी नोटिस नहीं किया, वह अपने काम में व्यस्त थी। उसकी उंगलियाँ कीबोर्ड पर धीरे-धीरे चलती थीं, जैसे वह किसी रहस्य को खोज रही हो।

कुछ पलों के बाद, सुखजोत ने अचानक लैपटॉप को एक तरफ रख दिया। “मैंने पूछा था आप पीना लोगी?” देव ने पूछा, उसकी आवाज़ में एक हल्की सी चिंता थी। सुखजोत ने मुस्कुराते हुए कहा, “अरे, बस पानी पिलोगे आप, मैं तो चाय पीना आई थी।”

देव ने उठकर किचन की ओर रुख किया, उसके कदम धीमे और सोचे-समझे थे। वह जानता था कि सुखजोत का आना सिर्फ चाय पीने के लिए नहीं था। उसकी मौजूदगी ने कमरे के माहौल को बदल दिया था, जैसे हवा में एक अजीब सी बिजली गुज़र रही हो। किचन में जाते हुए, देव ने अपने आप को याद दिलाया कि वह सुखजोत का भाई-इन-लॉ है, और उसे अपनी सीमाएँ याद रखनी चाहिए। लेकिन सुखजोत की मौजूदगी ने उसके अंदर एक अजीब सी उत्तेजना पैदा कर दी थी, जिसे वह नकार नहीं सकता था।

चाय बनाते हुए, देव ने सुखजोत की ओर देखा, जो अब लैपटॉप को एक तरफ रखकर सोफे पर आराम से बैठी थी। उसकी नज़रें सुखजोत के वक्षस्थल पर टिक गईं, जो उसके कसे हुए कुर्ते के नीचे स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा था। सुखजोत की मौजूदगी ने देव के अंदर एक अजीब सी इच्छा जगा दी थी, जिसे वह समझ नहीं पा रहा था। वह जानता था कि यह गलत था, लेकिन फिर भी उसका मन उसे सुखजोत की ओर खींच रहा था।

चाय की चुस्कियाँ कमरे में गूँज रही थीं, लेकिन देव और सुखजोत के बीच का माहौल अभी भी तनावपूर्ण था। सुखजोत ने चाय का कप उठाया और एक घूँट लिया, उसकी नज़रें देव के चेहरे पर टिकी थीं। “यह चाय बहुत अच्छी है,” सुखजोत ने कहा, उसकी आवाज़ में एक हल्की सी मिठास थी। देव ने मुस्कुराते हुए कहा, “शुक्रिया, मैंने खुद बनाई है।”

कमरे में फिर से शांति छा गई, सिर्फ चाय के कप की चुस्कियाँ सुनाई दे रही थीं। सुखजोत ने अपना कप रख दिया और देव की ओर देखा, उसकी नज़रें अब और गहरी हो गई थीं। “देव, क्या मैं आपसे कुछ पूछ सकती हूँ?” सुखजोत ने पूछा, उसकी आवाज़ में एक हल्की सी हिचकिचाहट थी। देव ने उसकी ओर देखा, उसके दिल की धड़कनें तेज़ हो गईं। “हाँ, बिल्कुल,” देव ने कहा, उसकी आवाज़ में एक हल्की सी घबराहट थी।

सुखजोत ने एक पल के लिए चुप्पी साध ली, जैसे वह अपने शब्दों को सही तरीके से चुनने की कोशिश कर रही हो। फिर उसने कहा, “क्या आप मुझे कभी... आकर्षक लगती हैं?” देव के दिल की धड़कनें और तेज़ हो गईं, उसके मुँह से कोई शब्द नहीं निकला। वह जानता था कि यह सवाल उसके लिए एक परीक्षा थी, लेकिन वह इसका जवाब नहीं दे पा रहा था।

सुखजोत ने मुस्कुराते हुए कहा, “मुझे पता है कि यह एक अजीब सवाल है, लेकिन मैं सच में जानना चाहती हूँ।” देव ने अपनी नज़रें नीचे कर लीं, वह जानता था कि उसका जवाब सुखजोत के लिए बहुत मायने रखता था। लेकिन वह अपने आप को नहीं रोक पा रहा था, उसका मन उसे सुखजोत की ओर खींच रहा था।

कमरे में एक अजीब सी चुप्पी छा गई, जैसे समय थम गया हो। देव और सुखजोत के बीच की दूरी अब और कम हो गई थी, जैसे वह किसी अदृश्य धागे से जुड़े हुए थे। सुखजोत की नज़रें देव के चेहरे पर टिकी थीं, जैसे वह उसके जवाब का इंतज़ार कर रही हो। लेकिन देव के मुँह से कोई शब्द नहीं निकला, वह सिर्फ सुखजोत की ओर देखता रहा, जैसे वह उसकी आत्मा को पढ़ने की कोशिश कर रहा हो।

इस क्षण का अंत कैसे होगा, यह किसी को नहीं पता था। देव और सुखजोत के बीच की दूरी अब सिर्फ शारीरिक नहीं रह गई थी, बल्कि वह एक भावनात्मक सेतु बन गई थी, जो उन्हें एक-दूसरे से जोड़ रही थी। लेकिन यह सेतु कितना मजबूत था, और यह कहाँ तक ले जाएगा, यह किसी को नहीं पता था।

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