जंगल की पुकार
उपन्यास शीर्षक:
"हवेली: जंगल की पुकार"
लेखक: हृदयांश "ह्रदय"
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अध्याय 1: जंगल की कोख में छुपी हवेली
घना जंगल। ऊपर तक फैले विशालकाय वृक्ष, जिनकी शाखाएँ दिन को भी रात बना देती थीं। इसी जंगल की गहराइयों में एक हवेली खड़ी थी — एक रहस्यमयी, प्राचीन और भव्य हवेली। कहते हैं कि वहाँ एक आदमी अपनी दो पत्नियों के साथ रहता था, और हवेली में अनगिनत कीमती चीज़ें थीं। लेकिन असली खज़ाना वह नहीं था जो आंखों से दिखे — बल्कि वो रहस्य था जो उसकी दीवारों में दफ्न था।
हवेली बाहर से सुंदर थी, पर भीतर एक सन्नाटा हमेशा सांस लेता रहता था।
पति – रघुवीर सिंह – अक्सर व्यापार के बहाने जंगल पार कर शहर चला जाता था। उसकी पहली पत्नी रमा सुंदर, शांत और धार्मिक स्वभाव की थी। दूसरी पत्नी – संजना – युवावस्था की आग में जलती, विद्रोही और तेज थी।
एक दिन रघुवीर ने रमा से कहा, “तुम कुछ दिनों के लिए हवेली में अकेली रहो। मुझे जाना होगा।”
रमा ने सहमति में सिर हिलाया, पर उसकी आँखों में अनजानी बेचैनी थी। रातें अब लंबी लगने लगी थीं। हवेली की हर दीवार जैसे कुछ कहने को बेताब थी।
एक रात जब वह पूजा कर रही थी, उसे महसूस हुआ कि कोई उसे देख रहा है। वह मुड़ी, पर कोई नहीं था। अगले दिन नौकरानी अम्बा ने बताया कि हवेली के पिछले हिस्से में किसी के पैरों के निशान मिले हैं — वो भी उल्टे।
रमा डर गई। उस रात कुछ चुर्र्र की आवाज आई, जैसे कोई पुराना खिलौना चल रहा हो। वह दबे पाँव आवाज की दिशा में गई — और देखा कि हवेली की एक पुरानी दीवार अपने आप खुल रही थी।
दीवार के पीछे था एक तहखाना — अंधकार से भरा, खून की हल्की गंध लिए।
नीचे उतरते ही उसे एक पुरानी पेंटिंग दिखी – जिसमें तीन लोग थे – एक आदमी और दो औरतें – लेकिन उनका चेहरा बुरी तरह से खरोंचा हुआ था। तभी अचानक किसी ने उसकी पीठ पर हाथ रखा।
वह घबरा कर पलटी – वहाँ अम्बा थी, मगर उसकी आँखों से खून बह रहा था और चेहरा स्याह था।
“भागो!” अम्बा चिल्लाई, “ये हवेली अब जाग गई है।”
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अध्याय 2: रक्त की दीवारें
रमा के दिल में डर की एक ठंडी परत जम गई थी। अम्बा की खून से डूबी आँखें उसकी यादों में अटक गई थीं। वो अब हर आहट पर चौंक जाती। हवेली के कोने-कोने से जैसे कोई उसे देख रहा हो।
उस रात वो अकेली थी। हवेली के पुराने हिस्से से लगातार खरोंचने की आवाज़ें आ रही थीं — जैसे कोई नाखूनों से दीवार कुरेद रहा हो।
रमा एक दिए की हल्की लौ लेकर तहखाने की ओर बढ़ी। जैसे ही वह नीचे पहुँची, दीवार पर कुछ ताज़ा लिखा हुआ था — "रमा, तुम अगली हो।"
उसकी साँसें तेज़ हो गईं। लिपि लाल रंग की थी — और जब उसने उंगली से छूकर देखा, तो यह खून था। ताज़ा और गरम।
अचानक पीछे से भारी पदचाप की गूँज आई। वह पलटी — और एक साया उसके सामने खड़ा था। वह कोई इंसान नहीं था — उसका चेहरा बिना आँखों के था, बस दो काले गड्ढे। और उसके हाथों में एक लोहे की जंजीर, जिसके सिरे पर इंसानी खोपड़ी लटकी थी।
रमा ने चीखना चाहा, पर उसकी आवाज़ जैसे उसके गले में ही फंस गई। साया धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ा। तभी एक औरत की चीख गूंजी — अम्बा की। “भागो!”
रमा ने दौड़ लगाई, पर हवेली के दरवाज़े अपने आप बंद हो चुके थे।
फिर उसने देखा — दीवार से खून टपक रहा है। दीवार के भीतर से कोई बार-बार सिर पटक रहा है, और दीवार पर उस औरत के चेहरे की झलक दिख रही थी — खून से लथपथ, नाखून उखड़े हुए, आँखें बाहर निकली हुईं।
रमा कांपती हुई पीछे हटने लगी। तभी अचानक उसके पैर किसी ठंडी चीज़ से टकराए — वह एक कटी हुई उंगली थी। और फिर पूरी ज़मीन पर खून का तालाब बन चुका था।
दूर कोने से एक ज़ोर की हँसी आई — एक मर्द की। आवाज़ रघुवीर जैसी थी, पर उसमें इंसानियत नहीं, सिर्फ पागलपन था।
“तुम भी मेरी रानी बनोगी, रमा — पर सजीव नहीं, मरे हुओं में।”
अध्याय 3: दूसरी पत्नी – संजना
तीन दिन हो चुके थे रघुवीर को हवेली से गए हुए। हवेली अब मानो एक साँस लेता हुआ जीव बन गई थी — जो हर कोने में कोई न कोई आवाज़ बुदबुदाता रहता।
उसी सुबह संजना अचानक हवेली लौट आई — बग़ैर किसी सूचना, बग़ैर किसी आवाज़ के। वह घोड़े पर नहीं थी, पैदल चली आ रही थी, उसकी चाल धीमी, आँखें गहरी और होंठों पर एक रहस्यमयी मुस्कान।
रमा उसे देखकर चौंकी। “तुम यहाँ? रघुवीर तो…”
“मुझे रघुवीर ने नहीं बुलाया,” संजना ने बीच में ही कहा। “हवेली ने मुझे बुलाया है।”
रमा की रूह सिहर गई।
रात होते ही हवेली में खामोशी फैल गई। लेकिन उस खामोशी के बीच एक आवाज़ थी — जैसे कोई ज़मीन पर कुछ घसीट रहा हो, या नाखूनों से पत्थर खुरच रहा हो।
संजना के कमरे में एक बड़ी सी पुरानी शीशे वाली अलमारी थी। रात के तीसरे पहर संजना उठकर उसके सामने खड़ी हुई — और अचानक अपने ही चेहरे पर खरोंच मारने लगी। उसके नाखून चमकने लगे — जैसे लोहे के हों।
उसके चेहरे पर एक-एक चीरा गहराता गया, और खून टपकने लगा। लेकिन वह हँस रही थी। वह उस आईने में किसी और को देख रही थी — किसी आत्मा को।
अगले दिन रमा ने देखा कि संजना की पीठ पर 16 गहरे कट के निशान थे — जैसे किसी ने ब्लेड से उकेरे हों। लेकिन सबसे डरावनी बात ये थी कि ये निशान अक्षरों में थे।
"हम सब यहीं हैं। तुझे भी यहीं रहना होगा।"
रमा उसे उठाकर भागने लगी, पर संजना बेहोशी में बड़बड़ाने लगी — “नीचे तहखाने में दरवाज़ा खुला पड़ा है… वो मुझे खींच रहा है… मेरे अंदर घुस रहा है...”
रमा ने अपनी आँखों से देखा — संजना की आँखों की पुतलियाँ सफ़ेद हो गई थीं, और उसकी जीभ दो हिस्सों में बँट चुकी थी — जैसे किसी साँप की।
अचानक कमरे की बत्ती गुल हो गई।
चारों तरफ अँधेरा।
एक खौफनाक, गलती हुई बच्चों जैसी आवाज़ गूंजी — “मम्मी... अब हमारी बारी है...”
अध्याय 4: बंद दरवाज़े और उल्टे पाँव
रात के एक बजे थे। हवेली में घना अंधेरा था, और हवा में सीलन और सड़ते मांस की गंध घुल गई थी। रमा सोने की कोशिश कर रही थी, पर अचानक उसे एक धीमी-सी सरसराहट सुनाई दी।
वो आवाज़… जैसे कोई बिना चप्पल के फर्श पर सरक रहा हो।
उसने चुपचाप दरवाज़ा खोला और बाहर झांका। हवेली की लंबी-लंबी गलियाँ — जहां हर दीपक बुझ चुका था। तभी उसकी नज़र फर्श पर गई। वहाँ पाँवों के निशान थे — पर उल्टे। एड़ियाँ आगे और उंगलियाँ पीछे।
रमा के रोंगटे खड़े हो गए।
वह पीछे हटने ही वाली थी कि उसे एक धीमी फुसफुसाहट सुनाई दी — “हम सब नीचे हैं... आओ...”
वह हड़बड़ा कर सीढ़ियाँ उतरने लगी। तभी सामने की दीवार पर खुद-ब-खुद एक दरवाज़ा उभरा — एक ऐसा दरवाज़ा जो पहले कभी नहीं था।
दरवाज़े पर हाथ से लिखा था — "इस पार मृत्यु नहीं, उसकी भूख है।"
रमा ने काँपते हाथों से दरवाज़ा खोला।
अंदर अंधकार था। पर उस अंधेरे में कुछ हलचल थी — जैसे दर्जनों लोग ज़मीन पर रेंग रहे हों। और फिर — एक चीख।
संजना की।
वह चीखती हुई तहखाने के दूसरे कोने से भाग रही थी — और उसके पीछे पीछे तीन बच्चे — जिनके सिर नहीं थे।
उनके हाथों में खून से सने खिलौने थे — और वे गूंगे थे, पर उनकी साँसे इतनी तेज़ थीं कि दीवारें काँपने लगीं। रमा ने संजना को खींच कर बाहर निकाला, लेकिन दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया — और उस पर फिर खून से लिखा गया:
"एक आ गया, अब दो और चाहिए..."
रमा और संजना दोनों अब पूरी तरह डरी हुई थीं। पर तभी हवेली की छत से किसी भारी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई। वे ऊपर की ओर भागीं — और देखा कि रघुवीर का कमरा खुला था।
लेकिन वहाँ जो था... वो इंसान नहीं था।
एक पुतला — बिना आँखों वाला — और उसकी छाती चीर कर किसी ने दिल निकाल लिया था। खून से दीवारों पर बना था एक चक्र — और उसके बीचोंबीच लिखा था:
“हवेली के लिए बलिदान ज़रूरी है।”
अध्याय 5: खोपड़ियों का तहखाना
सवेरा नहीं हुआ उस रात के बाद। मानो सूरज खुद हवेली से डर गया हो। हवेली की दीवारों पर अब एक नई परछाईं रेंग रही थी — रमा और संजना को निगलने को तैयार।
रघुवीर का कमरा अब मुर्दाघर जैसा हो चुका था। फर्श पर खून की लकीर धीरे-धीरे सरकती हुई उस बंद दरवाज़े तक पहुँची, जिसे हवेली के पुराने नौकर दुलारे ने कभी खोलने की जुर्रत नहीं की थी।
“उस दरवाज़े के पीछे,” उसने एक बार कहा था, “जहाँ हवेली का दिल धड़कता है… वहीं उसका पेट भी है — तहखाना।”
रमा और संजना ने तय किया कि अब सच को सामने लाना ही होगा। वे दोपहर होते-होते तहखाने की ओर बढ़ीं।
तहखाना
जब दरवाज़ा खोला गया, एक भयानक बदबू का गुबार बाहर फूटा — जैसे सैकड़ों शवों को एक साथ सड़ा दिया गया हो। नीचे जाने वाली सीढ़ियाँ खून से सनी थीं, और दीवारों पर नाखूनों से खरोंचे गए निशान — मानो किसी ने मरने से पहले पूरी ताकत से दीवार को पकड़ने की कोशिश की हो।
तहखाने के बीचोंबीच एक आकारिकी बनी थी — खोपड़ियों से। सैकड़ों मानव खोपड़ियाँ — कुछ ताज़ा, कुछ सूखी। आकारिकी के चारों ओर एक रक्तमय चक्र खींचा गया था, जिसमें संस्कृत और अवध जैसी पुरानी भाषाओं में लिखा था:
"शवों से शक्ति, रक्त से जीवन। हवेली जिएगी जब तक मृत्यु दी जाएगी।"
रमा की नज़र एक खोपड़ी पर अटक गई — वो अम्बा की थी। उसकी जटाएँ अब भी खोपड़ी से चिपकी हुई थीं।
संजना काँप रही थी, उसकी साँस तेज़ थी। तभी उसकी आँखें पलटीं और उसके शरीर पर नए कट बनने लगे — इस बार अपने आप। वह चीखने लगी:
“वो मेरे अंदर घुस गया है... वो मुझे देख रहा है... मेरी खाल से तुम्हारी बलि देगा रमा!!”
रमा पीछे हटने लगी, पर संजना अब वेदी के पास खड़ी थी — उसकी आँखें सफ़ेद और शरीर अकड़ा हुआ। वेदी के ऊपर हवा में कुछ उभर रहा था — एक विकृत चेहरा, अधजला और विकराल, जिसकी आँखों से आग टपक रही थी।
“मैं रघुवीर नहीं... मैं था ही कभी इंसान नहीं। मैं वो हूँ जिसे हवेली ने जन्म दिया।”
वो आत्मा रघुवीर की नहीं, बल्कि हवेली के पहले शापित पुजारी की थी — जिसने 1612 में अपनी ही पत्नी और बच्चों की बलि देकर इस हवेली को जीवित किया था।
संजना अब पूरी तरह उसकी कठपुतली बन चुकी थी।
उसने रमा की ओर देखा और कहा, “अब तुम्हारी खाल से बनेगा अगला परदा।”
अध्याय 6: जीवित लाशें और शैतान की किताब
रमा किसी तरह संजना के चंगुल से बचकर तहखाने से बाहर निकली थी, लेकिन हवेली अब वैसी नहीं रही थी। जैसे-जैसे रात गहराती गई, हर कोना, हर दरवाज़ा, हर दीवार जीवित हो उठी — और रमा को निगलने के लिए मुँह बाएँ खड़ी हो गई।
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पुराना मंदिर और सुरंग
रमा के ससुर ने एक बार रमा को एक आखिरी बात बताई थी:
“बिटिया, हवेली के नीचे एक सुरंग है जो पुराने शिवमंदिर से जुड़ी है। वहाँ छुपी है वो किताब जिसने इस शैतान को जन्म दिया।”
रमा अकेले उस सुरंग में घुसी। रास्ता संकरा, नम और साँपों से भरा हुआ था। दीवारों पर चित्र बने थे — इंसानों की बलि देते पुजारी, काले धुएँ में डूबे शव, और एक किताब जिसके पन्ने खून में सने थे।
मंदिर के तहखाने में एक चौकोर हवनकुंड था, और उसके बीचोंबीच रखी थी वो किताब —
"मृतसंहिता" — तंत्र की सबसे शापित और निषिद्ध पुस्तक।
जैसे ही रमा ने किताब को छुआ, उसकी उँगलियाँ जलने लगीं, और उसी पल हवेली के तहखाने में खलबली मच गई।
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उठती हुई लाशें
खोपड़ियों की आकारिकी अब धधकने लगी थी। संजना, जो अब पूर्णतः उस आत्मा के नियंत्रण में थी, किताब के खुलने से बेकाबू हो गई।
उसने तंत्रमंत्र पढ़ना शुरू किया, और तभी तहखाने की मिट्टी फटने लगी।
एक-एक कर शव उठने लगे।
उनके चेहरे गल चुके थे, आँखें गायब थीं, पर उनकी चीखें पूरी हवेली को कंपा रही थीं। ये वही लोग थे जो पीढ़ियों से हवेली में बलि चढ़ते आए थे।
और उनमें सबसे आगे था — रघुवीर।
उसका शरीर अब भस्म की तरह काला था, पर आँखें चमक रही थीं — जैसे दो अंगारे।
“रमा... अब तू ही है मेरी अंतिम रानी… मेरी शाश्वत माँ काली... मृत्यु की देवी।”
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रमा ने मृतसंहिता का एक मंत्र पढ़ा — जिस पर लिखा था:
"जैसे मृत्यु बलि से जन्मी, वैसी ही मृत्यु से उसका अंत होगा।"
उसने एक त्रिशूल उठाया, मंदिर से सिन्दूर लेकर खुद को देवी के रूप में रंगा — और वापस तहखाने की ओर बढ़ी।
जैसे ही वह आकारिकी पर पहुँची, सभी लाशें एक झटके में उसकी ओर झुकीं — उनमें पहली बार भय था।
रमा ने आकारिकी पर खड़े होकर मंत्र पढ़ा, और संजना की ओर त्रिशूल फेंका — पर त्रिशूल रुक गया।
संजना हँसी — एक ऐसी हँसी जिसमें सैकड़ों आत्माओं की आवाज़ें घुली थीं।
“देवी नहीं हो तुम, रमा… तुम तो हमारी अगली पुस्तक बनोगी।”
अध्याय 7: रघुवीर का असली चेहरा
तीन सौ साल पुराना अधूरा यज्ञ
जब रमा ने मृतसंहिता के अंतिम पृष्ठ पर हाथ रखा, वहाँ खून से लिखा एक गूढ़ वाक्य उभरा:
“जिसे तुम रघुवीर समझती रही, वह एक नाम नहीं — एक शरीर है, जिसमें हर सौ साल में एक आत्मा जन्म लेती है।”
रमा की साँसें रुक गईं।
पुराने दस्तावेज़ों और मृतसंहिता के पन्नों ने जो उजागर किया, वह हवेली की आत्मा को झकझोर देने वाला था।
रघुवीर असल में वह नहीं था जो दिखता था। वह कालभैरव तंत्र से जन्मा एक अमानवीय प्राणी था — जिसकी उत्पत्ति 1720 में हुई थी, जब गाँव के एक साधक ने हवेली की ज़मीन पर मृत्यु-अवहेलन यज्ञ किया था।
उस यज्ञ में बलि चढ़ाई गई थी — अपनी ही पत्नी और दो जुड़वाँ बच्चों की।
लेकिन यज्ञ अधूरा रह गया। आत्माएँ बंध गईं… हवेली से।
और उस दिन से, हर सौ साल में कोई एक पुरुष "रघुवीर" बनता — वही चेहरा, वही शक्ति, वही शाप। उसकी पत्नी को शुद्ध रक्त की देवी मानकर बलि देने का क्रम चलता रहा।
हवेली की आत्मा जागी
अब हवेली सिर्फ एक इमारत नहीं थी — वह एक जीवित प्राणी थी। उसके हर पत्थर में आत्माएँ थीं — चीखती, घुटती, और रमा को पुकारती।
जैसे ही रमा मृतसंहिता के अंतिम मंत्र की ओर बढ़ी, हवेली के चारों ओर आँधी उठी। दीवारों से खून बहने लगा, छतों से लटके शव हिलने लगे, और ज़मीन फटने लगी।
संजना अब पूरी तरह काली रूह बन चुकी थी। उसके बाल साँपों में बदल गए थे, और उसकी हँसी से दीवारें झनझना रही थीं।
अंतिम रक्तपथ
रमा ने हवेली के मुख्य मंडप में मृतसंहिता को खड़ा किया, चारों तरफ हवनकुंड बनाए और रक्त से चक्र खींचा। “अगर हवेली को मृत्यु चाहिए,” उसने कहा, “तो मैं उसे दूँगी — पर उसके असली पिता की।”
और तभी… रघुवीर प्रकट हुआ।
उसका शरीर अब अस्थियाँ बन चुका था, आँखें अंगारे, और पीछे छाया रूप में कई जन्मों के रघुवीर खड़े थे।
उसने कहा — “मैं ही काल हूँ, और तू मेरी अग्नि। अब तू मेरी रानी नहीं, मेरी राख बनेगी।”
रमा ने आखिरी मंत्र पढ़ा —
जैसे ही मंत्र पूरा हुआ, हवेली की ज़मीन फटी — और रघुवीर की आत्मा चीखते हुए खिंच गई नीचे — आग के कुएँ में। संजना ने भी चिल्लाते हुए कहा, “मैं मुक्त हूँ... या शायद... मैं अब हवेली हूँ।”
और हवेली… एक क्षण को काँपी, फिर शांत हो गई।
अध्याय 8: आख़िरी दरवाज़ा
तीन दिन बाद
गाँव वाले कहते हैं कि हवेली अब शांत है। कोई चीख़ नहीं आती, कोई परछाईं नहीं दिखती। पर तीन दिन से रमा नहीं लौटी।
गाँव के एक नवयुवक, शिव, जो उसे खोजने गया — बस इतना ही कह सका: “हवेली अब साँस लेती है…”
हवेली के भीतर
रमा बेहोश थी। मृतसंहिता अब उसकी छाती पर जल रही थी। खून से लथपथ परिधान, मस्तक पर सिंदूर की तरह जमी राख, और आँखें— अब वैसी नहीं रहीं।
तहखाने की वह आकारिकी टूटी नहीं थी, उसने नया रूप ले लिया था।
अब वहाँ सिर्फ खोपड़ियाँ नहीं थीं — वहाँ सांसें थीं।
हर खोपड़ी में एक अधूरी आत्मा बंद थी, और वे रमा से जुड़ गई थीं।
जब रमा उठी, उसके हाथों की नसें काली थीं, और हर बार जब वो साँस लेती, वेदी के पास पड़ा एक शव काँप उठता।
वो अब देवी नहीं रही थी। वो अब... हवेली बन चुकी थी।
आख़िरी रक्त
हवेली के दरवाज़े पर फिर दस्तक हुई।
गाँव के पुजारी और कुछ नौजवान अंदर गए, सोचते हुए कि अब सब खत्म हो चुका है। पर जैसे ही उन्होंने मंडप पार किया, फर्श पर खून से लिखा था:
“मुक्ति नहीं हुई… केवल भूमिका बदली है।”
सामने खड़ी थी रमा — एक हाथ में मृतसंहिता, और दूसरे में एक कटी हुई जीभ।
"तुमने रघुवीर को शाप कहा," उसने धीमे स्वर में कहा, "पर असली श्राप मैं थी… जिसे हवेली ने जन्म दिया।"
उसने पुजारी को उठाया, और आकारिकी पर पटक दिया। खून के फव्वारे दीवारों तक पहुँचे। बाक़ी नौजवान भागने लगे, पर हवेली के दरवाज़े अब बंद हो चुके थे — अंदर से।
हर चीख़, हर कटती हड्डी की आवाज़, हवेली को और ज़्यादा जीवित कर रही थी।
आख़िरी दृश्य
कुछ घंटे बाद सब शांत हो गया।
सिर्फ एक दीवार पर नया शिलालेख लिखा था:
"यह हवेली नहीं… यह प्यास है। जब भी कोई खोजने आएगा सत्य… उसे मिलेगा सिर्फ रक्त।"
और दरवाज़ा फिर खुला… किसी नए आगंतुक के स्वागत में.....क्योंकि अंत कभी होता सिर्फ नया आरंभ ही होता हैं....सदैव
[समाप्त]
उपन्यास: हवेली — जंगल की पुकार
लेखक: हृदयांश "हृदय"

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