Not So Diffrent (Hindi) by Saurav Kumar at Inkitt
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NOT SO DIFFRENT (HINDI)

Summary

In a world where wealth and worries paint starkly different lives, two teenage boys—Ansh and Priyansh—navigate the challenges of friendship, hardship, and hope. Ansh struggles to pay his school fees, burdened by fear and responsibility, while Priyansh lives a carefree life, yet feels an emptiness that luxury can’t fill. When their worlds unexpectedly collide, they discover that despite their differences, they share more in common than they ever imagined.

Status
Complete
Chapters
1
Rating
n/a
Age Rating
13+

NOT SO DIFFRENT

कहानी शुरू होती है एक छोटे से घर से। उस घर के एक छोटे से कमरे में एक लड़का, अंश, अपनी क्लास की फीस जमा करने के लिए पैसे जोड़ रहा होता है। महीने का आख़िरी वक़्त नज़दीक है, और अंश घबराया हुआ है क्योंकि दो महीने से वह फीस नहीं दे पाया है। उसे डर लग रहा है कि अगर वह ऐसे ही क्लास गया तो सर क्या कहेंगे। उसके पास कुछ पैसे हैं, लेकिन फीस भरने के लिए पर्याप्त नहीं।

दूसरी तरफ, प्रियांश नाम का एक और लड़का है जो एक अमीर परिवार से है। वह आराम से पार्टी कर रहा है — न उसे आज की चिंता है, न कल की। उसके घरवालों ने कभी किसी कमी का एहसास नहीं होने दिया। लेकिन फिर भी, अंदर से वह लगभग डिप्रेशन में रहता है। जब प्रियांश पार्टी करके घर लौटता है, तो उसे अक्सर यह सुनने को मिलता है:

"कैसा लड़का है तू, न कुछ कर पाता है, न करना चाहता है। देख अंश को — तेरी ही उम्र का है, तेरी ही क्लास में है, अकेला रहता है फिर भी सब कुछ संभाल लेता है। और तू? कुछ करना ही नहीं चाहता।”

गुस्से और दुख से भरकर प्रियांश छत पर चला जाता है। वहां उसे अंश बैठा हुआ मिलता है, जो चुपचाप रो रहा होता है। पहले तो वह नज़रअंदाज़ करता है, लेकिन फिर खुद को रोक नहीं पाता और पूछ बैठता है:

"क्या हुआ? सब ठीक है ना? कोई परेशानी है तो बता सकते हो।”

अंश पहले से ही दुखी था, और वह प्रियांश को ठीक से जानता भी नहीं था — तो वह चुपचाप वहां से चला जाता है। उसके जाते ही प्रियांश देखता है कि वहां कुछ पैसे गिरे हुए हैं। वह उन्हें उठाकर लौटाने का सोचता है, लेकिन तभी अंश वापस आकर बिना कुछ कहे पैसे उसके हाथ से लेकर चला जाता है।


अगले दिन

अंश और प्रियांश दोनों क्लास के लिए निकलते हैं — एक साइकिल से और एक पैदल। प्रियांश उसे साथ चलने को कहता है, लेकिन अंश उसे नज़रअंदाज़ कर देता है। क्लास पहुंचकर प्रियांश उसका इंतज़ार करता है, और थोड़ी देर बाद अंश आ भी जाता है।

दोनों साथ चलते हैं। प्रियांश बात करने की कोशिश करता है लेकिन अंश कोई दिलचस्पी नहीं दिखाता।

क्लास पहुंचते ही एक टीचर अंश को बुलाकर डांटते हैं कि उसने फीस अब तक क्यों नहीं दी। अंश जितने पैसे लाया होता है, सर को देकर कहता है:

"सर, अभी बस इतने हैं। मैं वादा करता हूँ कि अगले महीने पूरा पेमेंट कर दूंगा।”

सर गुस्से में कहते हैं:

"अगली बार पूरा पेमेंट समय पर देना, वरना क्लास छोड़ देना।”

अंश दुखी मन से क्लास खत्म कर के वापस जा रहा होता है। तभी प्रियांश उसे रोककर पूछता है:

"सर तुम पर इतना चिल्ला क्यों रहे थे? सब ठीक है ना?”

लेकिन अंश कुछ नहीं कहता और आगे बढ़ जाता है। फिर दोनों अपने-अपने घर चले जाते हैं। प्रियांश खिड़की से देखता है कि अंश कहीं जा रहा है। वह उसका पीछा करता है और देखता है कि अंश एक दुकान पर काम कर रहा है। यह देख कर उसे अच्छा नहीं लगता, पर वह चुप रहता है।


रात को

फिर से प्रियांश के घर में झगड़ा हो रहा होता है। वह छत पर चला जाता है — और हमेशा की तरह, वहां अंश पहले से मौजूद होता है।

इस बार, प्रियांश पूछता है:

"सब ठीक है?”

अंश बस ′हां′ में जवाब देता है।

प्रियांश कहता है:

"तुम कहीं नौकरी के लिए अप्लाई क्यों नहीं करते? पार्ट टाइम तो कर ही सकते हो, या फ्रीलांसिंग।”

यह सुनकर अंश थोड़ा खुश होता है और पूछता है:

"कैसे अप्लाई करूं?”

प्रियांश कहता है:

"कल क्लास में बताता हूं। और हां, एक बात और — मैंने तुम्हें दुकान पर काम करते देखा है।”

अंश घबरा जाता है, क्योंकि वह यह बात किसी को नहीं बताना चाहता था। पहले तो वह नाराज़ होता है, लेकिन फिर सारी बातें प्रियांश को बता देता है।

प्रियांश कहता है:

"भाई, ऐसा कर — तू मुझसे पैसे ले ले।”

अंश मना कर देता है।

प्रियांश कहता है:

"मुझे पता था तू मना करेगा। सुन — मैं पैसे दे रहा हूं, लेकिन जब तेरे पास हो जाए, तब मुझे लौटा देना। चिंता मत कर, ये मेरी मेहनत की कमाई है। मैं तेरी फीस भर देता हूं — जो तूने सर को दिया वो मुझे दे देना आराम से।”

अंश मान जाता है।

“और हां, कल जॉब के लिए अप्लाई करना — भूलना मत!”


अगले दिन

इस बार अंश खुद प्रियांश के पास आता है और कहता है:

“चलो, आज साथ चलते हैं।”

प्रियांश बहुत खुश होता है। वे दोनों क्लास पहुंचते हैं। प्रियांश बताता है कि कैसे जॉब के लिए अप्लाई करते हैं। अंश अप्लाई करता है और 2-3 घंटे में ही उसे एक पार्ट टाइम जॉब मिल जाती है।

इसके बाद दोनों ज़्यादातर वक्त साथ बिताने लगते हैं। अब प्रियांश के पुराने दोस्तों को यह दोस्ती अच्छी नहीं लगती। एक दिन अंश को अपने काम से फुर्सत होती है, तो वह फिर अपनी पुरानी दुकान पर कुछ काम करने चला जाता है।

वहीं, प्रियांश के पुराने दोस्त उसे देख लेते हैं और उसके बारे में बुरा बोलने लगते हैं:

“क्या लड़का है यार, दुकान पर काम करता है — उससे दोस्ती कर रखी है?”

वो लोग यह बातें प्रियांश के घर तक पहुंचा देते हैं। उसकी मम्मी ये सब सुन लेती हैं और दोस्तों की बातें सुनकर प्रियांश भी भ्रमित हो जाता है।


फिर अगले दिन

जब अंश उसे क्लास चलने के लिए बुलाने आता है, तो वह बहाने बनाकर मना कर देता है। अंश अकेले ही क्लास चला जाता है। वहां पहुंचकर देखता है कि प्रियांश पहले से वहां है। यह देख अंश दुखी हो जाता है कि:

“मैंने क्या किया? ये क्यों बदल गया मुझसे?”

प्रियांश के पुराने दोस्त अंश का मज़ाक उड़ाते हैं — और प्रियांश चुप रहता है।

अंश बुरा मानकर क्लास छोड़े बिना ही चला जाता है।

बाद में जब प्रियांश घर जा रहा होता है, तब उसके दोस्त फिर अंश को दुकान पर देख लेते हैं और मज़ाक उड़ाने लगते हैं। इस बार प्रियांश उन्हें रोकता है और अंश से माफी मांगने की कोशिश करता है। लेकिन अंश उसे नजरअंदाज करके चला जाता है।

घर पहुंचते ही उसकी मम्मी डांटती हैं:

“तुम्हें दोस्ती का मतलब पता है? जाओ, माफी मांगो उससे। किसी की बातों में आकर अपनी सच्ची दोस्ती क्यों तोड़ रहे हो?”

प्रियांश गुस्से में अपने कमरे में चला जाता है और पूरा दिन सोचता रहता है:

“मैंने क्या कर दिया? जिसने मेरी परवाह की, उसी से लड़ लिया…”


रात को

जब दोनों छत पर मिलते हैं, तो बात सुलझने की जगह और बिगड़ जाती है। अंश प्रियांश को बचे हुए पैसे लौटाता है और कहता है:

“तू दोस्त कहता है, लेकिन निभाता नहीं। आज के बाद मुझे अपना चेहरा मत दिखाना।”


अगले दिन

प्रियांश क्लास नहीं जाना चाहता, लेकिन उसकी मम्मी ज़बरदस्ती भेजती हैं। वह साइकिल ढूंढ रहा होता है, पर मिलती नहीं। तभी बाहर से आवाज आती है:

“जल्दी आओ! लेट हो जाएंगे क्लास के लिए!”

वह दौड़ता है — सामने अंश खड़ा होता है। वह दौड़कर उसे गले लगा लेता है।

प्रियांश की मम्मी खिड़की से देख रही होती हैं। मुस्कुराकर कहती हैं:

“दोस्ती एक ऐसा रिश्ता है जिसे हम खुद चुनते हैं। किसी तीसरे की बातों में आकर इसे खोना मत।”


“कभी किसी तीसरे की बातों पर भरोसा मत करना — वो सब कुछ बर्बाद कर देंगे जो तुम्हारे पास है।”

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Great Character

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Strong Dialog

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author

बहुत ही अद्भुत अद्वितीय और अकल्पनीय यह प्लॉट मुझे बहुत पसंद आया क्या आप हमें व्हाट्सएप पर यह सब कंटेंट प्रोवाइड कर सकते हैं अगर कर सकते हैं प्लीज मेरे भई भैया कंटेंट दे दीजिए

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