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KRIPI GATHA : CHAPTER 1 - VANSHAVALLI OF TRISHAL

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Summary

यह कहानी न स्याही से लिखी गई है, न ही रक्त से। यह गाथा शौर्य, त्याग और अपराजेय वीरता से रची गई है। यह कथा है उस समय की, जब एक सिंहासन लाखों मृत्यु का कारण बन गया। यह कहानी है एक पिता और पुत्रों के बीच हुए महासंग्राम की।

Status
1yr ago
Chapters
1
Rating
n/a
Age Rating
16+

KRIPI GATHA : VANSHAVALLI OF TRISHAL

सदियों पूर्व, जब भारत को संपूर्ण विश्व में *आर्यावर्त* के नाम से जाना जाता था, उस युग में वेदों का प्रादुर्भाव हो चुका था। सभ्यता आकार ले रही थी, नगरों और राज्यों की स्थापना प्रारंभ हो गई थी। नरेश और सम्राट अपने साम्राज्य गढ़ रहे थे, और धरती पर वीरों का जन्म हो रहा था।

उसी काल में *त्रिशल* नामक नगर पर *राजा व्यापी* का शासन था। उनकी रानी *विहिका* गर्भवती थीं। एक दिन रानी माँ भद्रकाली के मंदिर में दर्शन हेतु गईं। वहीं मंदिर में उन्हें प्रसव पीड़ा हुई। उनके साथ आई स्त्रियों ने मंदिर को चारों ओर से घेर लिया और उसी पुण्यभूमि पर रानी ने एक तेजस्वी बालक को जन्म दिया।

उस बालक का मुख सूर्य के समान तेजमय था। चूँकि उसका जन्म माँ भद्रकाली की छत्रछाया में हुआ था, अतः राजपुरोहितों ने उसका नाम रखा — सूर्यभद्र।

---


समय बीतता गया और सूर्यभद्र एक अजेय योद्धा और न्यायप्रिय सम्राट के रूप में ख्यात हुआ। उन्हीं दिनों उत्तर-पश्चिम में तक्षशिला का उत्कर्ष हो रहा था। वहाँ के सम्राट वीरसेन अपनी युद्धकला और रणशक्ति के लिए प्रसिद्ध थे। त्रिशल और तक्षशिला के मध्य अक्सर संघर्ष की स्थिति बनती, किन्तु दोनों राज्यों ने सदैव अपने सामर्थ्य से सीमाओं की रक्षा की।



सूर्यभद्र का विवाह रूपा नामक राजकुमारी से हुआ, जिनसे उन्हें दो पुत्र प्राप्त हुए — विहद्र और कृपी।



कृपी बचपन से ही पराक्रमी, उदार और युद्धकला में निष्णात था। वहीं विहद्र भी बलवान और वीर था, परंतु लोभी और स्वार्थी प्रवृत्ति का। सूर्यभद्र जानते थे कि यदि उन्होंने कृपी को उत्तराधिकारी घोषित किया, तो विहद्र विद्रोह कर देगा। पुत्रों के बीच युद्ध से बचने के लिए उन्होंने राज्य का विभाजन कर दिया।

विहद्र को मिला सरस्वती नदी के पार का क्षेत्र — जिसका नाम पड़ा सरसपार, जबकि कृपी को मिला जनप्रिय क्षेत्र — जिसका नाम पड़ा देवभूमि। वहाँ की प्रजा कृपी को देववत पूजती थी।

राजपुरोहितों की सलाह से, देवभूमि की राजधानी का नाम रखा गया — कृपी।

यह नाम केवल एक राजा का नहीं, बल्कि एक विचारधारा का प्रतिनिधित्व करता था —

धर्म, दया और शक्ति का संगम।


कृपी ने देवभूमि को समृद्ध किया, परंतु विहद्र की दृष्टि अब भी उसके राज्य पर थी। इसी बीच मत्स्यराज ने अपनी पुत्री वनुष्का का स्वयंवर रखा, जहाँ कृपी और विहद्र दोनों उपस्थित हुए। प्रतियोगिताओं को पार कर अंत में विजय कृपी की हुई, और वनुष्का ने उनके गले में जयमाला डाल दी। यह अपमान विहद्र के हृदय में विष की भाँति उतर गया।

समय बीतता गया और कृपी के राज्य में पुत्र जन्मा — भानु, जो भविष्य में देवभूमि का भाग्यविधाता और चक्रवर्ती सम्राट बनने वाला था।

भानु उन्हीं कालों में जन्मा, जब चक्रवर्ती राजा भरत का यशगान हर दिशा में गूंज रहा था — वही राजा भरत, जिनके नाम पर भविष्य में आर्यावर्त भारतवर्ष कहलाया।

छह वर्षों में कृपी ने अपनी सीमाएँ समुद्र तक फैला दीं। परंतु विहद्र, जो अब भी ईर्ष्या से जल रहा था, उसने देवभूमि पर आक्रमण कर दिया। युद्धभूमि में भाइयों का आमना-सामना हुआ और कृपी ने विहद्र का वध किया।

किन्तु इस भाईवध का पश्चाताप कृपी के अंतर्मन को खा गया। उन्होंने अन्न-जल त्याग दिया और कुछ ही दिनों में वे भी स्वर्ग सिधार गए।

भानु अभी शैशव में थे, अतः मंत्रियों ने पूरे निष्ठा से राज्य का संचालन किया। परंतु तक्षशिला और मगध जैसे शक्तिशाली राज्यों ने देवभूमि को विभाजित कर दिया। अब राज्य केवल राजधानी कृपी तक सिमट गया था।

परंतु वर्षों की तपस्या के पश्चात भानु युवा हुए और राज्य की बागडोर संभाली। उन्होंने अपना राज्य पुनः संगठित किया और नाम रखा — कृपी राज्य। भानु ने अपने सभी शत्रुओं को युद्धभूमि में परास्त कर दिया।


भानु के छह पुत्र हुए, जिनमें सबसे पराक्रमी था — उग्र । उसका वास्तविक नाम *चन्द्र* था, पर युद्धभूमि में उसका स्वरूप महाकाल के समान प्रतीत होता था, अतः उसे “उग्र” पुकारा जाने लगा।

उसी समय तक्षशिला के सम्राट – सुवश ने अपने चार पुत्रों के साथ कृपी पर चढ़ाई कर दी। भानु ने युद्ध की कमान उग्र को सौंपी। उग्र ने रणभूमि में तक्षशिला की सेना को विध्वस्त कर दिया। उसने सुवश के सभी पुत्रों का वध किया और अंततः स्वयं सुवश को परास्त कर, कृपी का ध्वज उसकी देह पर फहराया।

सम्राट भानु के स्वर्गवास के पश्चात उग्र कृपी का सम्राट बना।

उसका विवाह शिभुता नाम की राजकुमारी से हुआ और उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई



उसके पुत्र का नाम था — रुद्रसेन।

रुद्रसेन बचपन से ही क्रूर और स्वार्थी था। उसे यह स्वीकार नहीं था कि उसके चचेरे भाई भी उत्तराधिकार में गिने जाएँ। उसने एक दिन शिकार के बहाने उन्हें वन में बुलाया और बाघ के नखों से सभी का वध कर दिया। सबको यह बता दिया गया कि वे बाघ के हमले में मारे गए।

किन्तु राजा उग्र अपने पुत्र की प्रवृत्ति से भलीभाँति परिचित थे। वे जान गए कि यह रुद्रसेन का षड्यंत्र था। उन्हें भय था कि रुद्रसेन एक दिन उन्हें भी मार देगा। और वही हुआ — एक रात भोज में विष मिलाकर रुद्रसेन ने अपने पिता को मार डाला।

मरणासन्न अवस्था में राजा उग्र ने रुद्रसेन से कहा:

“मैं जानता हूँ, अब मेरा अंत समीप है। मेरी सबसे बड़ी भूल थी — तुम्हारा पालन-पोषण।

तुम मेरे पुत्र नहीं, राक्षस हो।

मैं तुम्हारे सभी पापों का दोषी हूँ।

परंतु ध्यान रहे, मैं तुम्हें श्राप देता हूँ —

तुम्हारी मृत्यु मेरे ही हाथों होगी।

और जैसे तुमने मुझे तड़पाया, वैसे ही तुम्हारा पुत्र तुम्हें तड़पा-तड़पा कर मारेगा।”

जब वर्षों बाद रुद्रसेन सम्राट बना, उसने इस श्राप की व्याख्या अपने विश्वस्त राजपुरोहित से माँगी। पुरोहित ने ध्यान मग्न होकर कहा:

“राजा उग्र धर्मात्मा थे। उनका उच्चारण किया गया श्राप व्यर्थ नहीं जा सकता।

परंतु उन्होंने दो ऐसे श्राप दिए हैं, जो एक साथ पूर्ण नहीं हो सकते —

एक, कि आपकी मृत्यु उनके (उग्र) हाथों होगी।

दूसरा, कि आपकी मृत्यु आपके पुत्र के हाथों होगी।

परंतु ये दोनों घटनाएँ एक साथ कैसे घट सकती हैं?”

रुद्रसेन ने घबराकर पूछा, “तो क्या यह श्राप व्यर्थ जाएगा ?”

पुरोहित मंद मुस्कान के साथ बोले:

राजन नारायण की लीला तो असंभव और संभव जाना ही नहीं करती

रावण और हरियाणाकश्यप जैसे राक्षस भी कुछ ऐसे वर ले कर बैठे थे जिनका कोई तोड़ ही ना निकाला जा सके परंतु धर्म की रक्षा हेतु नारायण ने उस असंभव को भी संभव किया था

रुद्रसेन भयभीत हो गया — और फिर एक दिन...

रुद्रसेन का पुत्र जन्मा — और वह हूबहू उग्र के समान था। जन्म का समय, ग्रह-नक्षत्र, स्वरूप — सब कुछ।

सभी ज्योतिषियों ने कहा — “यह उग्र का पुनर्जन्म है।”

रुद्रसेन भयभीत हो गया। उसे अपने पिता की गर्जना याद आने लगी — “मैं तेरी मृत्यु बनकर लौटूँगा।

रुद्रसेन को अपना ही पुत्र किसी विषैले शूल की भांति चुभने लगा और उसने अपने ही पुत्र को मौत के घाट उतारने की मंशा बना ली

अगले भाग में चर्चा करेंगे कि कैसे एक मां की ममता ने न केवल अपने पुत्र को बल्कि धर्म की रक्षा की


~आदित्या


ये केवल कहानी के पत्रों का परिचय और त्रिशल राज्या का कृपी बनने तक की कहानी थी

ज़रूरी बातें

ये कहानी काल्पनिक है

और इसका असल इतिहास से कोई लेना देना नहीं है

इस कहानी का उद्देश्य केवल मनोरंजन है और किसी समुदाय को ठेस पहुंचाना नहीं है !

शुक्रिया

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