BEHULA

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Summary

नियति की बुनी हुई जाल कहते हैं, ब्रह्मांड में हर धागा किसी अदृश्य शक्ति द्वारा बुना गया है। कुछ धागे प्रेम के होते हैं, कुछ शक्ति के, और कुछ सिर्फ़ विनाश के। सदियों पहले, जब धरती पर देवता और मनुष्य एक ही सांस लेते थे, तब एक ऐसा ही जटिल ताना-बाना बुना गया था, जिसकी गाँठें इतनी मज़बूत थीं कि समय के साथ भी वे ढीली नहीं पड़ीं। पूरब के वैभवशाली Champaknagar में, जहाँ व्यापार की हर लहर समृद्धि लाती थी, एक ऐसा पुरुष रहता था जिसका नाम हवाओं में गूँजता था—Chand Sadagar। वह सिर्फ़ एक व्यापारी नहीं था; वह अडिग संकल्प का दूसरा नाम था, एक ऐसा अभिमान जो पर्वतों से भी ऊँचा था। उसकी आस्था एक ही देव में थी—महादेव, शिव। उसकी इस अटूट भक्ति ने उसे एक ऐसी अदृश्य शक्ति के सामने खड़ा कर दिया, जिसके क्रोध से धरती और आकाश दोनों काँप उठते थे। यह शक्ति कोई और नहीं, बल्कि नागों की देवी, Manasa थीं, जिनके नेत्रों में हज़ारों सर्पों की चमक थी। वे चाहती थीं कि Champaknagar का हर प्राणी उनकी पूजा करे। पर Chand Sadagar ने तिरस्कार से मुँह मोड़ लिया। "मैं किसी नागिन के सामने नहीं झुकूँगा!" उसकी आवाज़ में एक ऐसी चुनौती थी, जो देवलोक तक पहुँची और जिसने एक भयंकर प्रतिशोध की नींव रखी। Manasa का क्रोध, जो विष से भी गहरा था, प्रज्वलित हो उठा। उन्होंने एक ऐसी शपथ ली, जिसने Chand Sadagar के पूरे वंश पर काला साया डाल दिया। उनके परिवार पर एक-एक कर संकट मंडराने लगे, हर सुबह एक नई चीख और हर शाम एक नया मातम लेकर आती। विनाश ने उसके घर के दरवाज़े पर दस्तक दी, और Chand Sadagar ने दर्द का हर घूँट पिया, पर उसका अभिमान नहीं टूटा।

Genre
Fantasy
Author
Ajay
Status
Ongoing
Chapters
1
Rating
n/a
Age Rating
16+

Chapter 1 कालरात्रि का दंश


रात अपने स्याह पंख पसारे, Champaknagar पर गहरी नींद का शासन कर रही थी। चाँद बादलों की ओट में दुबका था, जैसे किसी अशुभ घटना का साक्षी बनने से कतरा रहा हो। हवा में एक अजीब-सी सिहरन थी, और उस सन्नाटे को चीरती हुई, सिर्फ़ एक जगह से सिसकियों और दबी हुई चीखों की हल्की आवाज़ आ रही थी—वह थी Chand Sadagar की अभेद्य हवेली, जिसे उसने लोहे की मजबूत दीवारों से ढँक रखा था, मानो मृत्यु भी उसकी चौखट लाँघ न सकेगी। यह हवेली, जो अपनी भव्यता और दृढ़ता के लिए पूरे पूरब में प्रसिद्ध थी, आज किसी किले से कम नहीं लग रही थी, हर तरफ़ भारी लोहे के किवाड़ और ऊँची दीवारें, जिनके ऊपर पहरेदार मशालें लिए घूम रहे थे, हर आने-जाने वाले पर पैनी नज़र रखते हुए। Chand Sadagar ने अपनी आखिरी बची हुई उम्मीद को बचाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी थी।

हवेली के सबसे सुरक्षित कक्ष के भीतर, जहाँ हर दरार, हर छोटा-सा छेद भी सावधानी से बंद कर दिया गया था—यहाँ तक कि खिड़कियों को भी लोहे की मोटी चादरों से ढका गया था और दरवाजों पर कई ताले जड़े थे—एक युवा जोड़ा अपने मिलन की पहली रात मना रहा था। यह कक्ष सिर्फ़ एक कमरा नहीं था, यह Chand Sadagar के दशकों के संघर्ष, उसके अटूट विश्वास और उसके गहरे भय का प्रतीक था। Lakhindar, Chand Sadagar का आँखों का तारा, उसका इकलौता बचा हुआ वारिस, और उसकी नवविवाहिता पत्नी, Behula, एक-दूसरे की बाहों में खोए हुए थे। उनके माथे पर अभी भी शादी की रस्मों की ताज़ी हल्दी का पीलापन था, जिसकी खुशबू कमरे में फैली थी, और दिलों में सुनहरे भविष्य के अनगिनत सपने तैर रहे थे। हर सपना इतना जीवंत, इतना रंगीन था कि लग रहा था जैसे वे अभी इसी क्षण साकार हो जाएँगे।

कमरे में मंद-मंद जल रहे दीपक की लौ थिरक रही थी, जिसकी धीमी रोशनी में Behula का चेहरा किसी कमल-सा खिल रहा था। उसकी आँखों में लाज और प्रेम का एक अद्भुत, गहरा मिश्रण था, जो उसके भीतर उमड़ते अनछुए अहसासों को बयां कर रहा था। उसके होंठों पर एक हल्की-सी मुस्कान थी, जिसने Lakhindar के हृदय को छू लिया। Lakhindar ने धीरे से उसका घूँघट उठाया, और पहली बार उन दोनों की आँखें मिलीं—दो आत्माएँ जो सदियों से एक-दूसरे की प्रतीक्षा कर रही थीं, अब एक हो रही थीं। यह मिलन सिर्फ़ शरीरों का नहीं, बल्कि दो पवित्र आत्माओं का था, एक ऐसा संगम जो दैवीय शक्ति से कम नहीं था। उसके हाथों की गर्माहट महसूस करते हुए Behula थोड़ी सिहर उठी, पर यह सिहरन डर की नहीं, बल्कि एक नए, अनछुए प्रेम की थी। Lakhindar के होंठों पर एक कोमल मुस्कान थी, और उसने Behula का हाथ अपने हाथों में ले लिया। उनकी उँगलियाँ ऐसे गुँथ गईं, जैसे कभी अलग न होने के लिए बनी हों, एक अटूट बंधन का प्रतीक, जिसे तोड़ने की हिम्मत शायद काल भी न कर पाता।

"मेरी Behula," Lakhindar ने फुसफुसाते हुए कहा, उसकी आवाज़ में गहरा प्रेम और एक अजीब-सी कोमलता थी, "आज से तुम ही मेरा संसार हो। मेरा हर पल, मेरा हर ख्वाब, सिर्फ़ तुम्हारे लिए है।"

Behula ने शरमाते हुए अपना सिर उसकी मजबूत छाती से लगा लिया। उस क्षण, सारी चिंताएँ, सारे डर, सब कुछ गायब हो गया था। बाहर दुनिया में क्या चल रहा है,कोई कुछ नहीं पता यहां सिर्फ़ प्रेम था, और अनंत भविष्य की आशा थी। वह पल जैसे समय से परे था, जहाँ सिर्फ़ उन दोनों का प्रेम जीवित था, जहाँ दुनिया की सारी बुरी शक्तियाँ बेमानी थीं। वे एक-दूसरे में इतने खो गए थे कि उन्हें किसी और चीज़ का भान नहीं था। यह उनके प्रेम का अमृत था, जो उन्हें हर भय से परे ले जा रहा था। Lakhindar ने धीरे से Behula के घुँघराले बालों को सहलाया, उसकी कोमल त्वचा पर अपनी उँगलियाँ फेरीं। उसने महसूस किया, उसके रोम-रोम में प्रेम की एक नई लहर दौड़ गई थी। वह उसके चेहरे पर झुका, उसकी साँसों की गर्माहट महसूस करते हुए, और एक पल को लगा जैसे पूरा ब्रह्मांड ठहर गया हो, सिर्फ़ उनके इस पवित्र मिलन का साक्षी बनने के लिए।

लेकिन, जैसे ही Lakhindar ने Behula के पूरे शरीर को चूमा और बहुला सिसक उठी,

तभी एक तीखी पीड़ा से उसका शरीर ज़ोर से अकड़ गया। वह पीड़ा इतनी अप्रत्याशित और तीव्र थी कि उसके पूरे शरीर में एक कंपकंपी दौड़ गई। दर्द की एक लहर बिजली की तरह उसके नस-नस में दौड़ गई। उसकी आँखें फटी रह गईं, पर उनमें से कोई आवाज़ नहीं निकली। एक पल को उसने सोचा—यह क्या है? यह कैसा असहनीय दर्द है? उसका मन, जो अभी प्रेम में डूबा था, अचानक किसी अनजाने भय से भर गया।

Behula ने देखा—उसके पति की आँखें अचानक खुली रह गईं, उनमें एक अजीब-सी, भयभीत चमक उतर आई थी। उसकी आँखें जो अभी प्रेम से भरी थीं, अब किसी भयानक सत्य को देख रही थीं। उसके चेहरे पर फैली मधुर मुस्कान पल भर में एक चीख में बदल गई, जो गले में ही घुटकर रह गई। Lakhindar का हाथ, जो अभी तक उसके गालों पर था, तेज़ी से फिसला और हवा में लहरा कर बेजान-सा गिर पड़ा, जैसे उसमें कोई जान ही न हो। उसका शरीर ठंडा और भारी होता जा रहा था, और उसके होंठ नीले पड़ने लगे। साँसें उखड़ती चली गईं, हर साँस के साथ उसका जीवन उससे दूर जा रहा था। उसके पूरे शरीर में एक भयानक ज़हर तेज़ी से फैल रहा था, उसे अंदर ही अंदर निगल रहा था, उसके जीवन की ज्योति को बुझाता हुआ।

Behula की आँखें फटी रह गईं। उसका मस्तिष्क इस भयानक दृश्य को स्वीकार करने से इनकार कर रहा था। उसे एक पल में सब समझ आ गया। यह वही था—वही काला शाप जिसके बारे में उसने फुसफुसाहटें सुनी थीं। वही भविष्यवाणी जिसे Chand Sadagar ने टालने की हर संभव कोशिश की थी। नागिन देवी Manasa का प्रलयंकारी कोप। Chand Sadagar और नागदेवी के बीच की सदियों पुरानी शत्रुता ने आज फिर अपना ज़हर उगला था, और इस बार उसका शिकार Lakhindar था।

पूरा कमरा, जो अभी कुछ देर पहले प्रेम और उम्मीद से जगमगा रहा था, अचानक मृत्यु की भयानक ठंड से भर गया। Behula ने Lakhindar के निष्प्राण शरीर को अपनी बाहों में उठाया, उसका चेहरा अपने सीने से लगा लिया। उसके आँसुओं ने Lakhindar के ठंडे गालों को भिगो दिया, पर उसके भीतर एक ज्वालामुखी फूट पड़ा था—दुख का, सदमे का, और एक अनकहे संकल्प का।

बाहर, Chand Sadagar, जो हर आहट पर चौकन्ना बैठा था, उसे भीतर से आती उस भयावह खामोशी ने चीखने पर मजबूर कर दिया। यह वो खामोशी थी जो मौत के बाद आती है। उसके कानों में ज्योतिषियों की भविष्यवाणी गूँज उठी थी—"आपके आठवें पुत्र की मृत्यु भी विवाह की रात, सर्पदंश से होगी।" उसका सीना दर्द से फट गया। उसने अपनी सारी दौलत, अपनी सारी शक्ति, और अपनी सारी चतुराई लगा दी थी इस एक रात को सुरक्षित रखने में। उसने सोचा था, उसने Manasa को हरा दिया है। उसने लोहे का घर बनाया, हर छेद बंद किया, लेकिन क्या यह सब व्यर्थ था?

मगर Manasa की शक्ति उसकी सोच से कहीं परे थी। उसने एक सूक्ष्म छिद्र ढूँढ ही लिया था—एक अदृश्य छेद, जो शायद किसी चूहे ने बनाया था, हवेली की लोहे की दीवारों में। और उसी छोटे से छेद से, एक विषैला नाग, Manasa का क्रूर दूत, अंधेरे की चादर ओढ़कर अंदर घुस आया था। उस नाग ने चुपचाप, बिना किसी आहट के, उसी Lakhindar को डस लिया, जिसे इतनी सुरक्षा दी गई थी, उस अमर प्रेम की पहली रात को ही उसने काल का ग्रास बना लिया।

Behula अपने मृत पति के पास बैठी रही, उसका शरीर सदमे से सुन्न था, पर उसके भीतर एक अद्भुत लौ धधक उठी थी—यह प्रतिशोध की नहीं, बल्कि अटूट प्रेम की लौ थी। उसके मन में एक ही विचार गूँज रहा था—उसका Lakhindar मर नहीं सकता था। वह उसे नहीं मरने देगी। वह इस भयानक नियति को बदल देगी, चाहे उसे पूरी दुनिया से लड़ना पड़े, चाहे उसे देवताओं को ही चुनौती क्यों न देनी पड़े।

यह सिर्फ़ एक पति की मृत्यु नहीं थी, यह एक पत्नी के अदम्य साहस और अमर प्रेम की अग्निपरीक्षा थी, जो अभी-अभी शुरू हुई थी। एक ऐसी परीक्षा, जहाँ उसे मृत्यु से भी लड़ना था, देवताओं के लिखे को भी बदलना था।

पर क्या एक नश्वर स्त्री, जिसका हृदय अभी-अभी टूटा था, देवताओं के क्रोध और नियति के लिखे को सचमुच बदल सकती थी?

क्या मृत्यु के इस अगाध अँधेरे से, वह अपने जीवन को, अपने प्राण-प्रिय प्रेम को वापस खींच ला पाती? इस भयावह रात के बाद, Behula का अगला कदम क्या होता, जब उसके सामने केवल एक अंतहीन शून्य था?