DIED AS A HERO (HINDI)

Summary

“Died as a Hero” follows Samar, a brave soldier from the Rajasthan Regiment who sacrifices everything for his nation. Stationed in the desert, Samar endures hunger, sorrow, and the pain of missing his family. When fellow soldiers fall sick after eating unsafe food, and terrorists launch a surprise attack, panic spreads in the camp. Despite overwhelming odds and limited resources, Samar motivates his fellow soldiers with a powerful speech on duty, sacrifice, and patriotism. A fierce battle ensues. Samar is critically wounded in a grenade explosion and drifts into memories of his family. As terrorists approach, he makes one final act of courage — triggering a grenade to take down the enemies with him. In the end, Samar dies, unable to see his family one last time, but as a hero who gave his life for his country.

Status
Complete
Chapters
1
Rating
n/a
Age Rating
13+

DIED AS A HERO


राजस्थान रेजीमेंट का एक सिपाही, जो अपने देश की सेवा के लिए अपने घर-परिवार को छोड़ चुका है, अपनी पूरी ज़िन्दगी भारत माँ को समर्पित कर चुका है। वह राजस्थान की रेत पर लेटा हुआ अपने घर को याद कर रहा होता है। उसकी बटालियन के कई साथी पहले ही आतंकी हमले में शहीद हो चुके होते हैं। समर के चेहरे पर मायूसी होती है, वह आसमान की ओर देखता है और अपने परिवार को याद करता है। वह अपने पर्स से उनका फ़ोटो निकालता है और देखता है — तभी दूर से एक और सिपाही की आवाज़ आती है:

"समर... समर... समर...”

पर समर नहीं सुनता। वह सिपाही पास आकर कहता है:

सिपाही 2: समर! खाना ख़त्म हो गया है। सभी लोग सुबह से भूखे-प्यासे हैं। समर: ये कब हुआ? और तुम मुझे अब बता रहे हो? सिपाही 2: आप भी सुबह से भूखे पेट यहाँ बैठे हैं। समर: हाँ... सिपाही 2: जल्दी चलिए, वहाँ सब लोग पेट दर्द से तड़प रहे हैं। समर: पेट दर्द क्यों हो रहा है? सिपाही 2: सबको बहुत तेज़ भूख लगी थी, तो उन्होंने एक बकरे को मारकर खा लिया। उसके बाद से ही पेट में दर्द हो रहा है। समर: चलो जल्दी!

दोनों कैम्प की तरफ़ दौड़ते हैं। वहाँ पहुँचते हैं तो देखते हैं कि सभी दर्द से कराह रहे हैं। इससे पहले कि वे कुछ समझ पाते, अचानक एक ज़ोरदार आवाज़ आती है— “बूम!” कैम्प के पास ही एक ग्रेनेड फटता है।

समर बाहर भागकर देखता है, लेकिन वह घबराता नहीं ताकि बाक़ी लोग भी घबराएं नहीं। वह वापस अंदर आता है और कहता है:

समर: आतंकवादियों ने हमला कर दिया है।

दूसरा सिपाही डर जाता है, क्योंकि उनके पास न खाना बचा है, न ही ज़्यादा सैनिक।

सिपाही 2: हमला हो चुका है, और हमारे पास कोई साधन नहीं हैं। समर: शांत हो जाओ। सिपाही 2: लेकिन हम क्या करें? हम बहुत कम हैं, और सबकी तबीयत भी खराब है। समर: सबको एक साथ बुलाओ और शांत रहने को कहो।

सभी सैनिक एक जगह इकट्ठा होते हैं और घबराए हुए होते हैं। समर उन्हें हिम्मत दिलाने के लिए बोलता है —


समर:

"जवानों, हम यहाँ रोने नहीं आए हैं। ना ही डर कर बैठने आए हैं। तुम यहाँ क्यों आए हो? रोने के लिए? या भारत माँ के लिए अपनी जान कुर्बान करने के लिए? परिस्थितियाँ कैसी भी हों, फर्क नहीं पड़ता। जिस दिन हमने वर्दी पहनी थी, उसी दिन सिर पर कफ़न बाँध लिया था। आज उसी कफ़न की कसम है, उन आतंकवादियों की आँखों में आँख डालकर लड़ो। चाहे हजार गीदड़ आ जाएं, वे शेर से नहीं जीत सकते। चाहे वे 100 हों या 10,000 — हम 100 हैं या 50 — जीत हमारी ही होगी।

अब बोलो, जीत किसकी होगी? हमारी या उनकी?” सभी: हमारी! समर: जीत किसकी होगी? सभी: हमारी!

समर: ”तो चलो! अब लड़ो — मारो या मरो। ये बात सिर्फ हमारी नहीं, हमारे देश की है। और — “देश से बढ़कर कुछ नहीं… हम भी नहीं।”

समर जानता है कि जीतना लगभग नामुमकिन है, क्योंकि आतंकियों ने चारों ओर से घेर लिया है और उनके कैंप में भी घुस चुके हैं। फिर भी वह सबको लड़ने को कहता है।


सभी अपनी-अपनी पोज़िशन ले लेते हैं। चारों ओर गोलियों की आवाज़ गूंजने लगती है। आतंकियों की संख्या सच में बहुत ज़्यादा होती है और वे खत्म होने का नाम नहीं ले रहे थे। समर अपनी आँखों के सामने अपने साथियों को मरते देखता है। कई आतंकी भी मारे जाते हैं, पर उनकी संख्या बढ़ती ही जाती है।

इसी बीच एक ग्रेनेड उनके कैंप के भीतर गिरता है — जहाँ बाकी बचे लोग होते हैं। एक ज़ोरदार धमाका होता है। समर दीवार से टकराता है। उसे दोनों पैरों में गोली लग चुकी होती है, और धमाके से उसकी हालत और भी खराब हो जाती है। धीरे-धीरे उसकी आँखें बंद होने लगती हैं।


फ्लैशबैक:

समर अपनी यादों में खो जाता है — वह अपने दोस्तों के साथ खेल रहा होता है। उसके पापा आकर उसका कान पकड़ लेते हैं। माँ उसे बचाने आती है। उसका भाई हँस रहा होता है।

फिर वह खुद को अपनी पत्नी और 5 साल की बेटी के साथ देखता है। तीनों साथ में आइसक्रीम खा रहे होते हैं।

बेटी: “पापा, अगली बार जब आप आओगे ना, तो हम और आइसक्रीम खाएंगे।”


तभी वर्तमान में वापस — आतंकी उस जगह पर पहुँच जाते हैं जहाँ सब मारे जा चुके होते हैं। वे समर के पास आते हैं, उसके ज़ख़्मों पर बारूद छिड़कते हैं। वह दर्द से चिल्ला उठता है।

एक आतंकी पूछता है: “कोई आख़िरी ख़्वाहिश?”

समर: “मेरी बीवी और बेटी की फ़ोटो मेरे पर्स में है… उसे एक बार देखना चाहता हूँ। क्या देख सकता हूँ?”

आतंकी उसे उसका पर्स दे देते हैं, पर जैसे ही वो खोलने ही वाला होता है, वे उसके हाथ पर गोली मार देते हैं और पर्स दूर फेंक देते हैं। समर फिर भी घिसटता हुआ पर्स की तरफ़ बढ़ता है।

उसे पर्स से पहले एक ग्रेनेड का लीवर मिल जाता है। वह आतंकियों की ओर देख कर मुस्कुराता है और कहता है:

समर: “मैं तो अपने परिवार को नहीं देख सका, पर तुम लोग भी ज़िंदा नहीं बचोगे… “भारत माता की जय!”

इतना कहकर वह लीवर दबा देता है — पूरा कैंप धूल में बदल जाता है।


समर की लाश बाकी सबके साथ पड़ी होती है, मगर उसकी आँखों में अब भी आँसू होते हैं।

उस दिन, समर अपनी बीवी, बेटी, माँ — सबको हमेशा के लिए छोड़ चुका होता है। अब ना कोई आइसक्रीम होगी… ना हँसी-मज़ाक… सिर्फ़ एक गहरी शांति — जो किसी को अच्छी नहीं लगेगी।


"जय हिन्द”

लेखक: सौरव कुमार