होली की रात
होली की वो खूबसूरत शाम,
बंद कमरे में गुज़र जाती।
जो न आते वो रंगने मुझे,
मैं शायद फिर बिखर जाती।
जब हर तन मन रंग रहा था,
किसी ना किसी के प्यार में।
मैं बेताब बेरंग बैठी हूँ,
उस बेदर्द के इंतज़ार में
पहला हक तुम पर बस मेरा है,
पहला रंग भी मेरा ही हो।
जिसकी छुअन तुम्हें बेचैन करे,
वो अंग भी मेरा ही हो।
और रंगूँगा मैं ही... तुम्हें रंग में अपने,
वो चले गए अपना फरमान सुनाकर।
मुझे बताकर अपनी सारी हसरत,
कुछ अपने अरमान सुनाकर
इस दिल में एक आस जगाकर,
और बेचैन भरा एहसास जगाकर।
एक बेताबी, एक प्यास जगाकर,
वो चले गए, लौट आएंगे जल्द,
ये विश्वास जगाकर।
कैसे बताऊँ कैसे गुज़ारा दिन,
फिर बचती रही मैं रंगों से,
सबकी नज़रों से छुपती रही।
लड़ती रही अपनी उमंगों से।
बंद कमरे में बैठी रही,
नज़रअंदाज़ किया हर आहट को।
उनकी आरज़ू में घड़ी गुज़ारती रही,
मत पूछो, संभाला कैसे
अपनी घबराहट को।
बीत गया सारा ही दिन,
ढलने को आई शाम जब।
बेसब्री पल पल बढ़ती रही,
रहा न एक लम्हे को आराम अब।
उनकी चाहत में तन ये जलता रहा,
मन तड़पता रहा, मचलता रहा।
इंतज़ार में तकती रही घड़ी को,
और आहिस्ते ये पल
निकलता रहा।
बस चंद लम्हे दूर थे अश्क,
सहारे आँखों के बह जाते आज।
फीकी सी रह जाती होली,
हम बेरंग ही रह जाते आज।
फिर अचानक...
दस्तक दिया किसी ने खिड़की पर,
और साँसों को साँस मिली।
उम्मीद हार चुके इस दिल को,
फिर जीने की आस मिली।
हर एक की निगाहों से बचकर,
हाथों में गुलाल लिए।
होंठों पर हल्की सी मुस्कान,
और नज़रों में कुछ मलाल लिए।
कमरे में दाखिल होने को,
उन्होंने माँगी इजाज़त फिर।
और बेताबी बेबस करने लगी,
याद रही कहाँ शराफत फिर।
काफ़ी देर कर दी ना, कहकर इतना,
मुझे सीने से उन्होंने लगाया फिर।
और गुलाल रखकर कोने में,
लिपटकर वजह बताने लगे।
नाराज़ मैं नहीं थी उनसे वो,
फिर भी मुझे मनाने लगे।
जी, एक पल ना और गँवाया फिर।
मैं सुनती रही हर बात को उनकी,
और तेज़ धड़कनों को राहत मिली।
ऐसा आराम है उनकी बाहों में,
क्या कहूँ कैसी हिफाज़त में।
और ....कुछ पलों बाद....
फिर दूर ज़रा सा हटकर मुझसे,
मुझे देखने लगे वो प्यार से।
और उतरने लगी हया नज़रों में,
उनकी एक ही इज़हार से।
बताने लगे कि कितना याद किया,
वो मेरे लिए कितने बेताब हुए।
इज़्तराब संभाली कैसे अपनी,
झेला कैसे जो उन्हें अज़ाब हुए।
सुनती रही खामोश खड़ी मैं,
उनकी हर बात दिल को छूती रही।
उन नज़रों में इंतज़ार झलकता रहा,
और आँखें मेरी रोती रही।
करीब आकर धीरे से फिर,
मुझे समेटा अपनी बाहों में।
मोहब्बत में चूमा माथे पर,
देखने लगे निगाहों में।
रोना नहीं जान, आ गया हूँ ना,
फिर उन्होंने ....इतना कहकर दरवाज़ा बंद किया।
खिड़की पर साया कर पर्दों का,
रोशनी को कमरे की मंद किया।
गुलाल लिया फिर हाथों में,
नज़दीक थोड़ा आने लगे।
मुझसे कितना इश्क़ है उनको,
बेशर्मी से बताने लगे।
भरकर रंग एक हथेली में,
थाम...मेरी कमर दूसरी हाथ से।
मुझे याद किया ना तुमने? पूछने लगे वो,
बहकाने लगे अपनी हर बात से।
हाँ किया, मैं बेचैनी में बोल उठी,
और उनकी छुअन तले पिघलती रही।
कितना किया जान? बोलो,
वो सवालों से उलझाते रहे।
मैं उनमें खोने को मचलती रही।
बहुत किया, मुझे रंगोगे नहीं हाँ?
जब पूछा मैंने, तो थम गए वो।
फिर फासलों को और भी कम किया,
करीब आ यूँ बोले कानों में,
कि दूर मेरा हर गम किया।
बोले, जान मेरी, हर अंग रंगूँगा,
थोड़ा सा बस सब्र करो।
अरे,..जी भर तुमको देख तो लूँ,
मुझे इतना ना बेसब्र करो।
कि जो छूने लगूँ, ना रोक सकोगी,
ना संभल पाओगी पल भर भी तुम।
मेरे प्यार का रंग गहरा कितना है,
नहीं इतनी बेखबर भी तुम।
बेताबी फिर मेरी नहीं जानती,
हर अंग पर अपना नाम लिखूँगा।
रंगूँगा तुम्हारे हर कतरे को,
ज़रा सोचो क्या अंजाम लिखूँगा।
तड़प तुम्हारी जान रहा हूँ,
बेताबी पहचान रहा हूँ।
मेरी चाहत हो तुम, जान मेरी,
मैं कहाँ कभी अनजान रहा हूँ।
थम सी गई ये धड़कनें जैसे,
उनकी बातों में मदहोशी है।
अब बाते करने लगी निगाहें,
इन लबों पर अब खामोशी है।
और अगले ही पल जो मुझे कसा कमर पर,
दिल ने आह भरकर उनका नाम लिया।
मुझे जकड़ लिया अपनी बाहों में,
इस नज़र को खुद में थाम लिया।
ज़रा संभलती कि इससे पहले ही,
गालों पर अबीर वो लगाने लगे
करीब आना फिर मुझे छूना उनका,
मुझपर मोहब्बत अपनी लुटाने लगे।
बेकरारी इतनी बेसब्र हुई,
कि फासलों को कुछ बढ़ाना पड़ा।
साँसों को धीमा करने को,
उनसे दूर ज़रा सा जाना पड़ा।
दो कदम जो दूर हुई,
तन से ओढ़नी सरकने लगे।
एक बार जो इंकार किया
मुझसे,रूठकर वो जाने लगे।
और बस अगले ही पल चले जाते वो,
जो गले से उन्हें लगाती नहीं।
मत जाइए ना, मैं मर जाऊँगी,कह
उन्हें हाल-ए-दिल सुनाती नहीं।
थम कर मुझे देखने लगे वो,
उन्हें गालों पर गुलाल लगाया फिर।
आँचल से ये तन आज़ाद किया,
और उन्हें लबों का स्वाद चखाया फिर।
अगर बेताबी मेरी जान रहे हो,
तड़प सारी पहचान रहे हो।
फिर क्या मतलब है सताने का,
यूँ अकेला छोड़कर जाने का।
अगर ज़रा भी परवाह नहीं आपको,
क्या फायदा यूं इश्क़ जताने का।
जो बोल इतना सिसक उठी मैं,
अपनी बाहों में भर लिया मुझे।
मज़ाक था बाबा, अच्छा माफ़ भी कर दो,
लब चूम खामोश कर दिया मुझे।
और देखने लगे फिर तन को मेरे,
वो तश्नगी भरे इरादों से।
बोले, अब जिस्म ज़रा रंगने दो जान,
मुकरता नहीं मैं वादों से।
मुझे अगले ही पल...ला बिस्तर पर
पैमान अपनी निभाने लगे
हुक्म चलाने लगे बदन पर
सुर्ख रंगों से सजाने लगे
डोरी खोली फिर अंगिया की
किया आजाद मुझे लिबाज़ो से
धीमे से पकड़ा बालों पर
नजरों से नजर मिलाने लगे
और...उतारे कंगन बाली खोली
अब पायल की ओर बढ़े
हौले से छेड़ा घुंघरू को
कुछ सोच मुस्कुराने लगे
यूं मुस्कुराता देख उन्हें
जो पूछती क्या सोच रहे..
कि इससे पहले ही भरकर बाहों में
कुछ कानों में फरमाने लगे
वह बोले...जान आज दूरियां मिटाने दो
तुम्हें अपना बनाने दो
हर कतरे पर हक जताने दो
अपने इश्क से भींगाने दो
अपना प्यार तुम पर लूटने दो
इस हद तक समा जाने दो
कि तुम्हारी हर आह पर हक सिर्फ मेरा हो
हर सांस पर मेरा पहरा हो
है गहराई जितनी इश्क़ मे मेरे
तुमपर मेरा रंग भी उतना ही गहरा हो
आज हर शिकवे को मिटाऊंगा
जी भर तुम्हें सताऊंगा
उस दर्द से रुलाऊंगा
और तुम कराहती रहोगी टूट कर मुझ में
हां तुम्हें सारी रात जगाऊंगा
और रोकने की जुर्रत,,
जो मुझे करोगी तुम
मैं हर हद भूल जाऊंगा
फिर ....
वो दो पल बिस्तर से दूर हुए
नज़रों में गुरूर लिए
कर इंतिज़ा हर किस्वत से
रवैये में सुरूर लिए
वो सामने खड़े हैं नजरों के
इश्क का फितूर लिए
ना रुख़्त कोई बदन पर उनके
ना मन में मेरे सवाल रहा
और वापस आए जब बिस्तर पर...
एक सा दोनों का हाल रहा
मैं तड़पती रही वो सताते रहे
पल पल इज्तिहाद जताते रहे
मैं भींगती रही रंग में उनके
वह अपनी जान मुझे बुलाते रहे
जान, तुम सिर्फ मेरी हो
मुझे समाना है तुममें... क्या इजाज़त है ?..
उन्होंने पूछा धीमे से..
जी..सिर्फ आपको ...
जो इतना कहा ही था
फासला लम्हे भर रहा ही था
कि वो और करीब आने लगे
इरादों को बताने लगे
अपने बदन तले दबाने लगे
और बोले...
तोह जान...मुझे रूह तक उतर आने दो
अब इस पायल को शोर मचाने दो...
किस्वत–कपड़ा/लिबास/clothes , इज्तिहाद–हक़/claiming authority
तश्नगी– चाहत/प्यास/desires , रुख़्त– कपड़ा/clothes