एक गृहिणी की एक शाम
दिन भर का काम पूरा करने के बाद शाम हुई। बच्चों की खिलखिलाहट और उसकी सहेलियों से बातचीत शुरु हुई। यहां सबने अपना आज सुनाया और दिन भर की थकान पूरी की। ओह ! सॉरी कुछ लोगों ने वीडियो काल के जरिए ये किया तो किसीने गली-मोहल्ले में चक्कर लगाते हुए। जब नजर खेलते बच्चों पर पड़ती तो भले ही कोई उन्हें डांटता तो कोई उनके कारनामों पर हंसता और इसी बीच शुरू होती बच्चों की पुरानी यादों की हिस्ट्री... कुछ उस जमगढ़ में खुशियां लाती, तो कुछ भड़काती । पर समानता दिखती तो माता के ममता के आंचल की। जो अपने बच्चे की हर हरकत को सुनती समझती और फिर उसकी मासूमियत का इजहार करती। यह कभी-कभी एक मां दूसरी मां के बच्चे के लिए प्रकट करती। आखिर हैं तो वे मां ही। सारी थकान अपने बच्चों की तस्वीर याद आते ही दूर हो जाती। और हर बार यदि मुद्दा बच्चों का हो, तो उस बैठक का अंत भी उसी मुद्दे पर होता। क्योंकि ये ममता छुपाए नहीं छुपती। फिर वो जाती अपने काम पर फिर एक नई ऊर्जा लिए, अपने बच्चों को आवाज लगाती हुई। कभी डांटकर, तो कभी हंसकर और फिर लग जाती अपने गृहिणी होने के कर्म पर ।