दिल के उस पार❤️

All Rights Reserved ©

Summary

ये एक ऐसी कहानी हैं... जिस मैं दो लोग एक ऐसे रिश्ते मैं खुद को जोड़ देते हैं .. जहां उनका मिलना उनके नसीब मैं नहीं था.. लेकिन उनका प्यार आज भी जिंदा हैं।

Genre
Fantasy
Author
Nupur
Status
Ongoing
Chapters
1
Rating
n/a
Age Rating
16+

दिल के उस पार❤️

“किसी और के होते हुए भी… दिल ने उसे ही चुना”


“वैसे तो हम ज़िंदगी में बहुत से लोगों से मिलते हैं,

अलग-अलग रिश्तों को देखते हैं, समझते हैं…

लेकिन कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जिन्हें समझने के लिए

दिमाग से ज़्यादा दिल से सोचना पड़ता है…”

यह कहानी शुरू हुई 21 मई 2025 से,

जब कायरा पहली बार अपनी नानी के घर गई थी।

वहीं उसने अपनी ज़िंदगी का एक ऐसा मोड़ जिया,

जिसे वो शायद कभी शब्दों में पूरी तरह बयां नहीं कर पाएगी।

कायरा—थोड़ी सी भोली,

जिसके अंदर आज भी बचपना ज़िंदा है,

और जो अपने परिवार की जान है।

नानी के घर जाना सिर्फ एक सफर नहीं था,

बल्कि एक ज़रूरत थी…

क्योंकि एक साल पहले ही कायरा ने अपने पापा को खो दिया था—

जो उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी ताकत थे।

उनके जाने के बाद,

कायरा ने खुद को बहुत मुश्किल से संभाला था…

इतना कि कोई अंदाज़ा भी नहीं लगा सकता था

कि वो कभी टूटी भी थी।

नानी के घर से दिखते पहाड़ों का वो खूबसूरत नज़ारा

मानो उसकी सारी थकान और दर्द अपने साथ ले गया हो।

वो सब से हँसते-खेलते मिली,

कुछ चेहरे नए थे, कुछ अनजाने…

“दोपहर का वक्त था…

हल्की ठंडी हवा चल रही थी, और दूर पहाड़ों के पीछे सूरज धीरे-धीरे छिप रहा था।

घर में सब लोग हँसी-मज़ाक में लगे हुए थे…

लेकिन तभी, कायरा की नज़र अचानक एक कोने में खड़े उस शख्स पर पड़ी…

वो बाकी सब से अलग था

खामोश, जैसे अपने ही ख्यालों में खोया हुआ…

कायरा ने उसे पहले कभी नहीं देखा था,

फिर भी… पता नहीं क्यों,

उस एक पल में उसे ऐसा लगा जैसे वो उसे बहुत पहले से जानती हो…

दिल ने अचानक से अजीब सा महसूस किया

कुछ नया, कुछ अनजाना…

और शायद,

उसी पल से उसकी ज़िंदगी धीरे-धीरे बदलने लगी…”

“वो चेहरा कुछ यूँ सुकून दे गया…

जैसे आईने में खुद को देख लिया हो,

बस फर्क इतना था

वो सामने खड़ा था,

और मैं… उससे बात करने की हिम्मत भी ना कर पाई…”

चारों तरफ लोग थे, बातें थीं, हँसी थी…

पर मेरे लिए सब कुछ धुंधला सा हो गया था।

बस एक वही चेहरा साफ दिखाई दे रहा था…

और अजीब सी बात ये थी—

मेरी तरह, उसकी नज़रें भी

बार-बार मुझे ही ढूंढ रही थीं…

जैसे हम दोनों कुछ कहना चाहते थे,

पर खामोशी ने हमें रोक रखा था ।

“मैं नानी के घर सिर्फ चार दिनों के लिए आई थी…

लेकिन उन चार दिनों में जैसे साल भर की खुशियाँ समा गई थीं।

पूरे एक साल बाद,

मैंने मम्मी को इतना खुश देखा था…

और शायद यही वजह थी कि

मैं भी धीरे-धीरे सबके साथ घुलने-मिलने लगी।

सब कुछ ठीक था…

पर फिर भी,

बार-बार वही चेहरा

मेरी आँखों के सामने आ रहा था…

जिसके नाम तक से मैं अनजान थी,

फिर भी… दिल जैसे उसे पहचानती हो।

और फिर उसी दिन,

संजना दी—मेरी बड़ी बहन—मुस्कुराते हुए मेरे पास आई और बोली…

“वो आरव है…

जिसे तुम बार-बार देख रही थी,

या शायद… जो तुम्हें देख रहा था।”

मैं थोड़ा घबरा गई,

और उससे पहले कि मैं कुछ समझ पाती,

वो फिर हँसते हुए बोली

“वैसे… क्या चल रहा है तुम्हारा?”

मैंने थोड़ा सा मुँह बनाकर नज़रें चुराते हुए कहा

‘नहीं… ऐसा कुछ नहीं है,

तुम ज़्यादा सोच रही हो…’

लेकिन दिल की धड़कनें कुछ और ही कहानी कह रही थीं…

शायद जितना मैं छुपाना चाह रही थी,

उतना ही सब साफ नज़र आ रहा था।

संजना दी बस हल्का सा मुस्कुराई…

जैसे बिना कुछ कहे ही

सब समझ गई हो…

दिन गुजर रहे थे, पर आरव और मैंने अब तक सामने से कोई बात नहीं की थी…

फिर भी, जब भी हमारी नज़रें मिलतीं, ऐसा लगता था जैसे हमारी आँखें वो सब कह देती हैं, जो हम शब्दों में कभी कह नहीं पाए।

एक पल के लिए दिल चाहता था कि अभी जाकर उससे बात करूँ…

पर शायद हमारा मिलना ही एक इत्तेफाक था…

और हमारी पहली मुलाक़ात भी शायद कुछ अलग, कुछ खास होने वाली थी।