Chapter 1
“गुड इवनिंग, लेडीज़ एंड जेंटलमेन…”
स्टूडियो की तेज़ लाइट्स के बीच एंकर की आवाज़ गूंजी।
“आज का सवाल — क्या Gen-Z हमारी सोसाइटी को बिगाड़ रही है… या हम ही उन्हें समझ नहीं पा रहे?”
कैमरा धीरे-धीरे पैन हुआ।
एक तरफ बैठी थीं शांति देवी —
सफेद बाल, साड़ी, चेहरे पर उम्र का अनुभव साफ दिख रहा था।
दूसरी तरफ एक 19 साल का लड़का —
निर्वाण।
चेहरे पर न कोई घबराहट, न कोई ओवरकॉन्फिडेंस… बस एक सादगी।
एंकर ने पहला सवाल किया—
“शांति जी, आपको क्या लगता है? आज की पीढ़ी में सबसे बड़ी कमी क्या है?”
उन्होंने बिना सोचे जवाब दिया—
“कमी? बहुत हैं।
इन बच्चों में सब्र नहीं है…
बड़ों की इज़्ज़त नहीं है…
हर चीज़ तुरंत चाहिए — चाहे काम हो, रिश्ता हो या सफलता।”
दर्शकों में हल्की तालियाँ गूंजीं।
एंकर ने निर्वाण की तरफ देखा—
“आप क्या कहना चाहेंगे?”
निर्वाण ने हल्की सी मुस्कान के साथ माइक उठाया—
“शांति जी गलत नहीं कह रहीं…
बस पूरी बात नहीं कह रहीं।”
स्टूडियो एकदम शांत हो गया।
“हाँ, हम impatient हैं…
क्योंकि हमने लोगों को सालों इंतज़ार करते देखा है… और फिर भी खाली हाथ लौटते हुए देखा है।
हाँ, हम फोन ज़्यादा इस्तेमाल करते हैं…
क्योंकि असल ज़िंदगी में सुनने वाला कोई नहीं होता।”
शांति जी ने तुरंत टोका—
“ये सब बहाने हैं। हमारे समय में भी मुश्किलें थीं… लेकिन हम भागे नहीं।”
निर्वाण ने उनकी तरफ देखा, इस बार थोड़ा गंभीर होकर—
“आपके समय में मुश्किलें थीं…
लेकिन आपके पास लोग भी थे।”
कुछ सेकंड के लिए पूरा स्टूडियो खामोश हो गया।
निर्वाण ने आगे कहा—
“आज का बच्चा कमज़ोर नहीं है…
बस थोड़ा अकेला है।
वो रोना चाहता है…
पर उसे सिखाया जाता है — ‘इतनी सी बात पर रोते नहीं।’
वो कुछ कहना चाहता है…
पर जवाब मिलता है — ‘ये सब तुम्हारी उम्र की बातें हैं।’”
अब दर्शकों का माहौल बदलने लगा था।
शांति जी ने थोड़ा नरम होकर पूछा—
“तो क्या करें हम?
क्या सब कुछ छोड़ दें?
बच्चों को बस फोन में ही रहने दें?”
निर्वाण ने धीरे से कहा—
“नहीं…
बस एक बार हमें गलत कहने से पहले…
पूछ लीजिए — ‘तुम ठीक हो?’”
एंकर भी अब गंभीर हो चुका था।
निर्वाण ने माइक थोड़ा कसकर पकड़ा—
“Gen-Z गलत नहीं है…
बस ये वो पीढ़ी है जो दिखावा नहीं कर पाती।
हम fake smile नहीं दे पाते…
तो हम चुप हो जाते हैं।”
शांति जी कुछ कहना चाहती थीं…
लेकिन इस बार…
शब्द उनके पास नहीं थे।
दर्शकों में एक लड़की की आँखें भर आईं।
एंकर ने धीरे से कहा—
“तो क्या समस्या पीढ़ी में नहीं… बल्कि बातचीत में है?”
निर्वाण ने सिर हिलाया—
“समस्या तब होती है…
जब समझने से पहले ही फैसला सुना दिया जाता है।”
लाइट्स धीरे-धीरे मंद होने लगीं।
डिबेट खत्म हो गई।
लेकिन उस रात…
कई लोगों ने पहली बार…
अपने बच्चों को मैसेज किया—
“तुम ठीक हो ना?”








