Chapter 4
उस रात मैं बस यही सोचती रह गई कि
आख़िर ऐसी कौन सी बात है जो आरव को परेशान कर रही है…
क्या मैंने गलत समझ लिया था,
कि हम दोनों एक-दूसरे के लिए वही महसूस करते हैं?
या फिर मेरी ही कोई बात उसे चुभ गई…
डर ने मेरे दिल और दिमाग को घेर लिया था,
और जाने कितने बुरे ख्याल आने लगे थे…
वो दिन इतना लंबा लग रहा था,
जैसे खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा हो…
और हर गुजरते पल के साथ,
उसकी खामोशी और भी ज़्यादा चुभने लगी थी…
मुझे लग रहा था कि आरव को मुझसे कुछ कहना है…
पर वो कह नहीं पा रहा था,
और मैं भी उसे पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी…
दिन धीरे-धीरे बीत रहा था,
हर पल जैसे किसी अनकहे सच का इंतज़ार कर रहा था…
फिर उसने बस इतना कहा—
“हम कल मिलते हैं… फिर से।”
मैं कुछ समझ ही नहीं पा रही थी
कि आखिर ये सब हो क्या रहा है…
उस रात हमारी ज़्यादा बात भी नहीं हुई,
लेकिन उसकी खामोशी सब कुछ कह रही थी…
मैं समझ गई थी,
कि जरूर कोई बड़ी वजह है…
और उस रात,
नींद ने जैसे हम दोनों से ही मुँह मोड़ लिया था…
और फिर वो दिन आ ही गया…
जिस दिन हमें मिलना था।
हमने तय किया था कि हम
Marine Drive पर मिलेंगे…
मैं स्टेशन पहुँची…
और थोड़ी देर बाद आरव भी आ गया।
जैसे ही मैंने उसका चेहरा देखा,
मैं समझ गई…
वो अपनी हँसी के पीछे बहुत कुछ छुपाने की कोशिश कर रहा था।
उसके ठंडे हाथ
जैसे सब कुछ कह रहे थे…
कि उसे मुझसे बहुत कुछ कहना है,
या शायद वो चाहता था कि
मैं बिना कहे ही सब समझ जाऊँ…
आज की हमारी मुलाक़ात…
बहुत अलग थी।
बस हम दोनों थे…
और हमारी खामोशी।
ना वो कुछ कह रहा था,
ना मैं कुछ पूछने की हिम्मत कर पा रही थी…
हम दोनों ही चुप बैठे थे,
जैसे दिल में बहुत कुछ था,
पर ज़ुबान तक कुछ भी नहीं आ रहा था…
और शायद…
हम दोनों ही डर रहे थे,
कि जो सच बाहर आएगा,
वो सब कुछ बदल देगा…
इस मुलाक़ात का जैसे कोई मतलब ही नहीं निकला…
आरव कुछ कह नहीं पाया,
और मैं बस सोचती ही रह गई…
वो दिन इतना भारी लग रहा था,
जैसे हर पल दिल पर बोझ बनकर बैठ गया हो…
ऐसा लग रहा था कि
वो कभी बोल ही नहीं पाएगा…
और मैं…
मैं कभी पूछ ही नहीं पाऊँगी…
बहुत देर तक हम वहीं बैठे रहे,
बिना कुछ कहे…
शायद दोनों ही अपने-अपने डर से लड़ रहे थे…
फिर आखिरकार हम उठे…
और साथ-साथ चलते हुए बाहर आ गए…
निकलते वक्त,
मैंने उसे गले लगाया…
वो पल बहुत छोटा था,
पर उसके अंदर जैसे सब कुछ था—
डर, प्यार, और एक अजीब सी दूरी…
और फिर…
वो चला गया।
उसे जाते हुए देख,
दिल में बस एक ही डर रह गया था…
कि शायद…
अब हम कभी फिर नहीं मिलेंगे…
घर आने के बाद भी
मेरा किसी चीज़ में मन नहीं लग रहा था…
बहुत मुश्किल से मैं सबके सामने खुद को संभाल रही थी,
ताकि कोई ये न समझ पाए
कि अंदर से मैं कितनी उलझन में हूँ…
शाम तक हमारी कोई खास बात नहीं हो पाई…
और हर बीतते पल के साथ
बेचैनी और बढ़ती जा रही थी…
रात को हम दोनों ऑनलाइन आए…
और बात शुरू हुई…
पर आज भी कुछ अलग था…
आरव जैसे अभी भी किसी गहरी सोच में डूबा हुआ था…
मैं कुछ पूछ पाती,
उससे पहले ही उसका मैसेज आया—
“मुझे तुमसे बात करनी है…”
ये पढ़ते ही
मेरी धड़कनें तेज़ हो गईं…
सवालों से घिरा हुआ दिल,
और दिमाग जैसे एकदम सुन्न पड़ गया…
क्या वो मुझे छोड़ देगा…?
या मैंने ही अनजाने में उसे कुछ ऐसा कह दिया
जो उसके दिल को चुभ गया…?
और फिर उसने सच बताया…
“मेरी ज़िंदगी में 13-14 साल से कोई है…
जिसके साथ मेरी ज़िंदगी की शुरुआत हुई…
वो मेरा पहला प्यार है…”
उसका ये मैसेज पढ़कर
मैं कुछ पल के लिए बिल्कुल खाली हो गई…
जैसे शब्द ही खत्म हो गए हों…
फिर उसने बताया…
कि कुछ गलतफहमियों की वजह से
उनके बीच बात कम हो गई थी…
और वो खुद को बहुत अकेला महसूस कर रहा था…
इसीलिए वो यहाँ आया था…
खुद को संभालने…
खुद से भागने के लिए…
लेकिन फिर…
उसने मुझे देखा…
और कुछ ही पलों में
वो अपनी पुरानी ज़िंदगी, अपना दर्द…
सब कुछ जैसे भूल गया…
उसने कहा—
कि मुझे देखते ही वो मेरी तरफ खिंचता चला गया…
और जो सुकून उसे 14 साल के रिश्ते में नहीं मिला,
वो उसे मेरे साथ कुछ ही दिनों में मिल गया…
“मैं तुम्हें कभी धोखा नहीं देना चाहता था…”
उसने लिखा…
“इसलिए जब तुमने अपने दिल की बात कही,
तब मुझे अपनी ज़िंदगी की सच्चाई समझ आई…”
“मैं तुम्हें दुख नहीं देना चाहता था…
लेकिन अब तुमसे झूठ बोलने की हिम्मत भी नहीं रही…”
उसके हर शब्द में सच था…
और उसी सच में कहीं मेरा दिल टूट रहा था…
“मुझे नहीं पता तुम अब मेरे बारे में क्या सोचोगी…
पर मेरा इरादा कभी गलत नहीं था…”
“14 साल में जिस तरह मुझे कोई नहीं समझ पाया…
उतना तुमने मुझे कुछ ही दिनों में समझ लिया…”
“मैं नहीं जानता हमारे इस रिश्ते को क्या नाम दूँ…
पर ये जो भी है…
मेरे लिए बहुत खास है…”
“और… मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता…”
फिर उसने कहा…
कि वो उसे छोड़ नहीं सकता…
क्योंकि वो…
उसका इंतज़ार कर रही है…
इतने सालों से…
उसकी ये बात सुनकर
मेरे अंदर जैसे सब कुछ थम गया…
जब वो ये सब कह रहा था,
मैं एक लफ्ज भी नहीं बोल पाई…
दिल में बहुत कुछ चल रहा था…
पर मैंने उसे ये महसूस नहीं होने दिया
कि कहीं न कहीं मुझे बहुत बुरा लगा है…
मैंने उसकी हर बात…
बस शांति से सुनी…
शायद पहली बार
मैं अपने जज़्बातों से ज़्यादा
उसकी सच्चाई को समझने की कोशिश कर रही थी…
थोड़ी देर बाद…
मैंने खुद को संभालकर उससे बस इतना कहा—
“तुम… एक बार उससे बात करने की कोशिश करो…”
“खुद से उसे मैसेज या कॉल करो…”
ये कहते वक्त
मेरे दिल ने जैसे खुद को ही चुप करा दिया था…
क्योंकि कहीं न कहीं
मैं जानती थी…
कि ये फैसला…
मुझे उससे दूर ले जाएगा…
खुद की तकलीफ़ से ज़्यादा…
इस बात का सुकून था
कि आरव ने अपना दिल हल्का कर लिया…
जो भी उसके दिल में था,
उसने मुझसे कह दिया…
लेकिन…
वो रात मेरी ज़िंदगी की
सबसे भयानक रात बन गई…
मैंने अपने आँसू
खुद से ही छुपा लिए…
चेहरे पर सब ठीक होने का दिखावा था,
पर अंदर से मैं टूट रही थी…
धीरे-धीरे… चुपचाप…
फिर भी…
मैं ये जान चुकी थी
कि मैं उसे इतना चाहने लगी हूँ…
कि उसकी खुशी के लिए
मैं कुछ भी कर सकती हूँ…
मैंने उससे कहा—
“तुम… एक बार उससे बात करो…”
“अपने प्यार को ऐसे जाने मत दो…”
और फिर…
दिल पर पत्थर रखकर ये भी कह दिया—
“मैं तो हूँ ना…
हमेशा…
तुम्हारे साथ…
एक सच्चे दोस्त की तरह…”
ये कहते वक्त
मेरी आवाज़ शायद शांत थी…
पर अंदर…
मैं पूरी तरह बिखर चुकी थी…