दिल के उस पार ❤️

All Rights Reserved ©

Summary

आख़िर में नायिका ने अपने प्यार से ज्यादा आरव की खुशी को चुना। उसने दर्द सहकर भी यही माना कि आरव और प्रज्ञा एक-दूसरे के लिए बने हैं।

Genre
Romance
Author
Nupur
Status
Ongoing
Chapters
1
Rating
n/a
Age Rating
16+

Chapter 5

उसकी हर बात मेरे दिल में कहीं गहराई तक उतर चुकी थी... मैं चाहकर भी उससे दूर होने का ख्याल अपने मन में ला नहीं पा रही थी...

मन ही मन मैंने यह तय कर लिया था कि चाहे हालात कितने भी बदल जाएं, मैं आरव का हाथ कभी नहीं छोड़ूंगी... क्योंकि कुछ रिश्ते नाम से नहीं, एहसासों से जुड़े होते हैं...

उस रात मैंने खुद को बहुत समझाने की कोशिश की, कि हर चाहत मुकम्मल नहीं होती... कुछ लोग जिंदगी में आते तो हैं, मगर किस्मत में नहीं लिखे होते...

शायद आरव भी मेरी जिंदगी का वही अधूरा हिस्सा था, जिसे मैं चाहकर भी अपना नहीं बना सकती थी... लेकिन दिल फिर भी यही दुआ कर रहा था, कि अगर वो मेरा नहीं बन सकता, तो कम से कम उसकी मुस्कान कभी मुझसे दूर ना हो...

अगली सुबह जब आरव का कॉल आया, तो मैंने अपनी आवाज़ में ज़रा भी दर्द आने नहीं दिया... जैसे पिछली रात हमारे बीच कुछ हुआ ही ना हो...

मैंने मुस्कुराते हुए उससे कहा, “एक बार प्रज्ञा से बात करके देखो... शायद कुछ रिश्ते सिर्फ एक मौके की दूरी पर होते हैं...”

आरव कुछ पल खामोश रहा, और मैं उस खामोशी के पीछे छुपे उसके टूटे हुए मन को महसूस कर पा रही थी...

प्रज्ञा... वो लड़की जो न जाने कितने सालों से आरव के साथ जुड़ी हुई थी, जिसने उसके हर अच्छे-बुरे वक्त को करीब से देखा था... शायद उसके प्यार की गहराई तक पहुँचना मेरे बस की बात नहीं थी...

मैं चाहकर भी खुद को उससे बेहतर साबित नहीं कर सकती थी... क्योंकि कुछ लोग किसी की जिंदगी में इतने पुराने हो जाते हैं, कि उनकी जगह कोई नया इंसान कभी ले ही नहीं पाता...

और शायद यही सच था — कि इस जिंदगी में मैं आरव से बेहद प्यार तो कर सकती थी, मगर प्रज्ञा जैसी उसकी “अपनी” कभी नहीं बन सकती थी...

मेरी और आरव की बातें तो हो रही थीं, लेकिन अब उन बातों में पहले जैसी बेफिक्री नहीं बची थी...

हम दोनों जैसे हर शब्द सोच-समझकर बोल रहे थे, मानो हमारे बीच कोई अनदेखी सीमा खिंच गई हो...

शायद आरव के मन में यह चल रहा होगा कि उसने कायरा की जिंदगी उलझा दी... और मेरे दिल में बस यही सवाल था, कि क्या मैंने उसकी जिंदगी में आने की बहुत जल्दी कर दी...?

हर बार जब वो कुछ पल चुप होता, मेरा दिल घबरा जाता... क्या वो मुझसे नाराज़ है? क्या अब हमारी बातें हमेशा ऐसी ही रहेंगी...? थोड़ी अधूरी, थोड़ी बिखरी हुई...

जैसे हमारे रिश्ते की वो मिठास, जो कभी हर बात में महसूस होती थी, धीरे-धीरे कहीं खो रही हो...

अब हम बात तो करते थे, लेकिन पहले की तरह दिल खोलकर नहीं... और शायद सबसे ज्यादा दर्द इसी बात का था, कि दूरी हमारे बीच नहीं, हमारे एहसासों के बीच आने लगी थी...

प्रज्ञा और आरव का रिश्ता सच में बहुत खूबसूरत था... वो सिर्फ एक रिश्ता नहीं, बल्कि सालों से साथ चलती हुई एक पूरी कहानी थी...

प्रज्ञा आरव का पहला प्यार थी... उसने आरव को सिर्फ उसके अच्छे दिनों में नहीं, बल्कि उसकी हर छोटी शुरुआत, हर संघर्ष, हर टूटन और हर जीत में करीब से देखा था...

जब आरव अपनी जिंदगी की राह तलाश रहा था, तब भी प्रज्ञा उसके साथ खड़ी थी...

“और जब वो धीरे-धीरे अपनी मेहनत से ऊंचाइयों तक पहुँचा, तब भी हर मोड़ पर सबसे मजबूती से उसका हाथ थामे वही खड़ी रही...”

कुछ लोग सिर्फ प्यार नहीं करते, वो किसी इंसान की पूरी यात्रा का हिस्सा बन जाते हैं... प्रज्ञा शायद आरव की जिंदगी में वही जगह रखती थी...

और शायद इसी वजह से, उनके रिश्ते में एक अलग ही गहराई थी... जिसे देखकर कभी-कभी मुझे खुद से शिकायत होने लगती थी, कि मैं चाहकर भी उस जगह तक कभी नहीं पहुँच पाऊंगी...

प्रज्ञा लड़की बहुत अच्छी थी... बस वो अपने और आरव के रिश्ते को एक मुकम्मल नाम देना चाहती थी... इतने सालों के इंतज़ार के बाद, अब वो और देर नहीं करना चाहती थी...

उसे डर था, कि अगर इस बार भी वो दोनों एक नहीं हुए, तो शायद जिंदगी उन्हें फिर किसी नए इंतज़ार में डाल देगी... और कहीं ऐसा ना हो कि सालों का साथ, बस अधूरी कहानी बनकर रह जाए...

और सच कहूँ, तो प्रज्ञा अपनी जगह बिल्कुल गलत भी नहीं थी...

उस दिन मेरी और आरव की बात खत्म होने के कुछ देर बाद ही उसका मैसेज आया... “प्रज्ञा घर आ रही है...”

उस एक मैसेज ने जैसे मेरी धड़कनों को अचानक तेज कर दिया... मन में हजार सवाल आने लगे... डर लग रहा था कि अब आगे क्या होगा...

लेकिन फिर मैंने खुद को संभाला, और आरव से बस इतना कहा — “बैठकर आराम से बात करो... इतने खूबसूरत रिश्ते को यूँ टूटने मत दो... कुछ रिश्ते बड़ी मुश्किल से मिलते हैं...”

प्रज्ञा एक ऐसा नाम बन चुकी थी,

जिसे सुनते ही मुझे एहसास हो जाता था कि आरव की दुनिया कहाँ बसती है।

वो थोड़ी जिद्दी थी, थोड़ी चिड़चिड़ी भी…

पर उसके हर गुस्से के पीछे सिर्फ आरव के लिए बेशुमार प्यार था।

मैं उससे कभी मिली नहीं थी,

फिर भी ना जाने क्यों उसे महसूस करने लगी थी।

आरव जब भी उसके बारे में बात करता,

उसकी आवाज़ बदल जाती…

और मैं हर बार ये समझ जाती कि

कुछ रिश्ते सिर्फ साथ होने से नहीं,

सालों की मोहब्बत से गहरे हो जाते हैं।

मैं तो बस उसकी जिंदगी में अभी-अभी आई एक कहानी थी,

और प्रज्ञा…

वो उसकी पूरी किताब थी।

शायद इसी लिए मेरे होने के मायने

मुझे खुद ही बहुत छोटे लगने लगे थे…

उन दिनों हमारे बीच की बातें

थोड़ी नहीं… बहुत कम हो गई थीं।

शायद दूरी शब्दों में नहीं, एहसासों में आने लगी थी।

मैं जानबूझकर हर बात को प्रज्ञा तक ले जाती,

ताकि आरव समझ सके कि

जिस प्यार के पीछे वो भाग रहा है,

उससे कहीं ज्यादा खूबसूरत वो प्यार होता है

जो बिना शर्त सिर्फ तुम्हें चाहता है।

मैं उसे बार-बार एहसास दिलाना चाहती थी कि

किसी को चाह लेना आसान होता है,

पर किसी का पूरी शिद्दत से तुम्हें चाहना…

ये हर किसी की किस्मत में नहीं होता।

प्रज्ञा की हर छोटी जिद में,

हर नाराज़गी में,

मुझे सिर्फ उसका डर दिखता था—

आरव को खो देने का डर।

और शायद मैं धीरे-धीरे

अपने हिस्से की मोहब्बत कम करके,

उन दोनों के रिश्ते को बचाने की कोशिश कर रही थी…

मैं समझने लगी थी कि

सिर्फ मैं ही नहीं,

आरव भी अब मेरे बिना अधूरा महसूस करने लगा था।

शायद उसे पहली बार

किसी के साथ वो सुकून मिला था,

जिसे वो सालों से

अपने और प्रज्ञा के रिश्ते में ढूंढ रहा था।

और वो सुकून उसे

कुछ ही दिनों में… कायरा के साथ मिल गया था।

उसकी बातें,

उसका मुझे बार-बार रोक लेना,

बिना वजह याद करना,

हर छोटी बात में मुझे ढूंढना—

सब धीरे-धीरे बहुत कुछ कहने लगा था।

मैं समझ रही थी कि

अब उसे सिर्फ मेरे करीब आने की चाह नहीं थी,

बल्कि मुझसे दूर हो जाने का डर भी सताने लगा था।

और शायद यही वो मोड़ था,

जहाँ हमारा रिश्ता

सिर्फ आदत नहीं रहा था…

दिल की जरूरत बनने लगा था।

आरव ने कभी भी प्रज्ञा को गलत नहीं ठहराया।

वो हमेशा जानता था कि

प्रज्ञा सिर्फ उसका प्यार नहीं,

उसकी जिम्मेदारी भी है।

बरसों का साथ,

अनगिनत यादें और वादे…

उन सबकी अहमियत वो अच्छी तरह समझता था।

लेकिन शायद वो खुद भी नहीं समझ पा रहा था कि

फिर आखिर क्यों

वो मुझसे दूर नहीं जा पा रहा।

उसे मुझसे मिलने का मन करता,

बिना वजह बातें करने का मन करता,

दिन की छोटी-छोटी बातें भी

सबसे पहले मुझे बताने का दिल करता।

धीरे-धीरे उसके और प्रज्ञा के बीच

सब कुछ फिर से ठीक होने लगा था।

नाराज़गियाँ कम हो रही थीं,

रिश्ता फिर संभलने लगा था…

लेकिन इन सबके बीच

आरव का ध्यान सबसे ज्यादा

मेरे ऊपर रहने लगा था।

और यही बात मुझे अंदर से तोड़ती भी थी…

क्योंकि मैं जानती थी,

जिस जगह पर मैं खड़ी थी,

वहाँ किसी एक का दिल टूटना तय था…

और शायद उसी दिन

मैंने अपने दिल को समझा दिया था कि

अगर इस कहानी में किसी का दिल टूटना लिखा है,

तो वो मेरा होगा।

क्योंकि आरव और प्रज्ञा…

वो दोनों एक-दूसरे के लिए ही बने थे।

उनके रिश्ते में अधूरी बातें हो सकती थीं,

दूरी हो सकती थी,

नाराज़गियाँ भी…

लेकिन उनके बीच जो सालों की मोहब्बत थी,

उसकी जगह कोई नहीं ले सकता था।

मैं बस उनकी कहानी का

एक खूबसूरत मगर अधूरा हिस्सा थी।

जिसे शायद किस्मत ने

सिर्फ इतना हक दिया था कि

वो आरव को समझ सके,

उसे सुकून दे सके…

पर उसे अपना कभी ना कह सके।

शायद प्यार हमेशा पा लेने का नाम नहीं होता,

कभी-कभी किसी को उसके अपने तक पहुँचा देना भी

मोहब्बत ही होती है।