दिल के उस पार ❤️

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Summary

उस रात हम दोनों ने महसूस किया कि कभी-कभी किसी अपने को हमेशा दिल में रखने के लिए, उसे खुद से दूर करना पड़ता है। हम दोनों पूरी रात सो नहीं पाए… दूर होकर भी एक-दूसरे का दर्द और एहसास महसूस कर रहे थे, बस इस डर के साथ कि शायद अब जिंदगी पहले जैसी नहीं रहेगी…

Genre
Drama
Author
Nupur
Status
Ongoing
Chapters
1
Rating
n/a
Age Rating
16+

Chapter 7

वक्त के साथ हमारी बातें और गहरी होती जा रही थीं…

अब उसकी आवाज़ सुने बिना दिन अधूरा लगता था,

और मेरी छोटी-छोटी बातों में भी आरव खुद को ढूंढ लिया करता था।

हम दोनों को एक-दूसरे की आदत हो चुकी थी…

ऐसी आदत, जो बिना कहे हर एहसास समझ लेती है।

लेकिन मैं हर रोज़ खुद को समझाती रहती —

कि आरव मेरा होकर भी मेरा नहीं है…

एक दिन उसे हमेशा के लिए प्रज्ञा के पास लौट जाना है।

मैंने लाख कोशिश की इस सच को अपनाने की,

पर दिल था कि हर बार बगावत कर बैठता…

क्योंकि कुछ रिश्ते गलत नहीं होते,

बस अधूरे लिखे होते हैं…

मैं खुद को काम में उलझाए रखने की कोशिश करती…

ताकि आरव मेरे बारे में थोड़ा कम सोचे,

और शायद मैं भी उसे थोड़ा कम महसूस करूँ।

लेकिन कुछ लोगों की आदत होने के लिए,

पूरी ज़िंदगी साथ रहना जरूरी नहीं होता…

कभी-कभी कुछ ही पल किसी को दिल में हमेशा के लिए बसाने के लिए काफी होते हैं।

आरव जब भी प्रज्ञा से मिलने जाता,

उसकी बातें सुनकर हमेशा ऐसा लगता जैसे उसका मन वहाँ होकर भी कहीं और है…

जैसे वो बस उस पल का इंतज़ार कर रहा हो,

जब वो वापस आकर मुझसे बात करेगा।

पर मैंने पहले ही तय कर लिया था —

उन दोनों के रिश्ते के बीच मेरी वजह से कभी कोई दूरी नहीं आनी चाहिए।

इसलिए मैं हमेशा आरव से कहती,

“जब प्रज्ञा से मिलने जाओ, मुझे पहले बता देना…

मैं तुम दोनों को परेशान नहीं करूँगी।”

और हर बार मेरी ये बात सुनकर वो चिढ़ जाता था…

शायद उसे मेरा यूँ खुद को पीछे करना अच्छा नहीं लगता था।

लेकिन मेरे दिल को पता था…

कि जब भी वो प्रज्ञा और अपने मिलने की बातें करता,

मेरे चेहरे की मुस्कान कहीं खो जाती थी…

और मैं फिर भी मुस्कुराने का नाटक करती रहती थी…

वक्त धीरे-धीरे बीत रहा था…

और मैं आरव में कहीं खोती जा रही थी।

उसकी हर एक बात जैसे मेरे दिल में अपना घर बना रही थी…

मैं फिर से एक ऐसा सपना देखने लगी थी,

जिसका इस जन्म में पूरा होना शायद नामुमकिन था…

फिर भी ना जाने क्यों,

दिल हर रोज उसी अधूरी उम्मीद को जी लेता था।

सब कुछ ठीक चल रहा था…

मैं और आरव रोज घंटों वीडियो कॉल पर बातें करते,

और जब भी वक्त मिलता, हम एक-दूसरे से मिल लिया करते थे।

ऐसा लगने लगा था जैसे जिंदगी आखिरकार थोड़ी सुकून भरी हो गई हो…

लेकिन शायद जिंदगी हमें हकीकत से रूबरू कराना चाहती थी।

कुछ दिनों बाद…

दोपहर में अचानक मुझे आरव का कॉल आया।

उसकी आवाज़ घबराई हुई थी…

उसने बताया कि उसके पापा की तबीयत बहुत खराब हो गई है।

और शायद यहीं से सब कुछ बदलने वाला था…

मैं और आरव, दोनों ही ये खबर सुनकर डर गए थे।

खुद को संभालने के बाद मैंने उसे हौसला देते हुए कहा —

“सब ठीक होगा… पापा भी जल्दी ठीक हो जाएंगे।

अभी तुम्हें बस उनके साथ रहने की जरूरत है…”

आरव के मम्मी-पापा गांव में रहते थे,

और वो उसी दिन तुरंत गांव के लिए निकल पड़ा…

वो गांव पहुंचने तक हमारी लगातार कॉल और मैसेज पर बातें होती रहीं।

मैं बार-बार आरव से पापा की तबीयत के बारे में पूछती,

और हर छोटी बात जानना चाहती थी…

मैंने उससे कहा —

“कुछ भी हो, मुझे बताते रहना…

पापा की सारी रिपोर्ट्स मुझे भेज देना, मैं तुम्हें समझा दूंगी।

डॉक्टर से हर बात अच्छे से पूछना…

और पापा से कहना, अपना ख्याल रखें…”

मैं आरव की हालत बहुत अच्छे से समझ सकती थी…

क्योंकि “पापा” सिर्फ एक शब्द नहीं थे,

मेरी पूरी दुनिया उस एहसास से जुड़ी थी।

शायद इसलिए उस मुश्किल वक्त में,

मैं आरव को बिल्कुल अकेला नहीं छोड़ना चाहती थी…

4–5 दिन बीत चुके थे…

आरव गांव में अपने पापा के साथ था।

हॉस्पिटल से डिस्चार्ज मिलने के बाद अब वो वापस मुंबई आने वाला था…

लेकिन इन कुछ दिनों में हमारी बातें कम होने लगी थीं…

और मेरी बेचैनी बढ़ती जा रही थी।

ना जाने आरव किस हालत में होगा…

कैसे खुद को संभाल रहा होगा…

उसके भाई, प्रज्ञा… सब उसके साथ थे,

फिर भी ना जाने क्यों मुझे बार-बार यही लग रहा था

कि उसे मेरी जरूरत है।

हर थोड़ी देर में मैं फोन उठाकर उसका मैसेज देखती,

और फिर खुद को समझा लेती —

“वो अभी अपने परिवार के साथ है…”

लेकिन दिल फिर भी उसकी चिंता करना नहीं छोड़ पा रहा था…

जब हमारी बात हुई,

तो उसकी आवाज़ में कुछ अलग सा महसूस हो रहा था…

ऐसा लग रहा था जैसे आरव मुझसे कुछ कहना चाहता है,

लेकिन कह नहीं पा रहा…

वो कोशिश तो बहुत कर रहा था सामान्य रहने की,

पर मैं उसकी खामोशी पढ़ पा रही थी।

उसके हर छोटे जवाब के पीछे जैसे कोई बात छुपी हुई थी…

मुझे बार-बार यही महसूस हो रहा था

कि उसे ये बातें फोन पर नहीं,

मेरे सामने बैठकर कहनी हैं…

शायद कुछ एहसास ऐसे होते हैं,

जो शब्दों में नहीं, सिर्फ आंखों में दिखाई देते हैं…

लेकिन मैं कुछ दिनों से आरव से ठीक से बात नहीं कर रही थी…

ना उसे वक्त दे पा रही थी…

कभी काम की वजह से, तो कभी इसलिए कि उसे और प्रज्ञा को थोड़ा साथ में समय मिल जाए…

उसके पापा की तबीयत के बाद मुझे कुछ बातों का एहसास पहले ही होने लगा था…

आरव मुझसे बहुत कुछ कहना चाहता था…

लेकिन मैं ही उसे वो मौका नहीं दे रही थी…

शायद इसी बात का गुस्सा उसके अंदर बढ़ता जा रहा था…

उसे समझ नहीं आ रहा था कि मैं अचानक उससे इतनी दूर क्यों होने लगी हूँ…

उस रात आरव का गुस्सा सच में टूटकर बाहर आ रहा था…

वो बार-बार यही कह रहा था कि पिछले कुछ दिनों से वो सिर्फ मुझसे बात करने की कोशिश कर रहा था, लेकिन मैं हर बार उससे दूर होती जा रही थी…

उसने मुझसे कहा —

कि मैंने उसे अपनी बात कहने का मौका ही नहीं दिया…

न मैं उसे खुद कॉल कर रही थी,

न उससे मिलने की कोशिश…

और हर बार जब वो मेरे करीब आना चाहता, मैं किसी ना किसी बहाने से दूर हो जाती…

आरव की नाराज़गी में सिर्फ गुस्सा नहीं था,

उसके शब्दों में वो डर भी साफ महसूस हो रहा था…

जैसे उसे लगने लगा हो कि मैं धीरे-धीरे उससे दूर हो रही हूँ…

आरव की वो बात सुनकर जैसे मेरी पूरी दुनिया एक पल में बदल गई…

उसने कहा कि उसके पापा की तबियत खराब होने की वजह से घरवाले चाहते हैं कि वो और प्रज्ञा जल्द से जल्द शादी कर लें…

ये सुनते ही मेरे अंदर जैसे सब कुछ टूट गया…

मैं बस उसे सुन रही थी, लेकिन उस पल ऐसा लग रहा था जैसे मेरी जिंदगी अचानक वहीं रुक गई हो…

दिल मानने को तैयार ही नहीं था कि जिस इंसान को मैं अपनी हर दुआ में मांगती थी,

अब वो किसी और का होने जा रहा है…

उस रात आरव की आवाज में मजबूरी थी…

और मेरी खामोशी में बिखरता हुआ पूरा संसार…

मैंने अपने आँसुओं को जबरदस्ती हँसी के पीछे छुपाकर उससे कहा —

“अरे, ये तो बहुत अच्छी बात है…

तुम और प्रज्ञा जो सपना इतने सालों से देख रहे थे, वो अब पूरा होने वाला है…

तुम दोनों हमेशा के लिए एक हो जाओगे… इससे अच्छी बात और क्या होगी…”

लेकिन मेरी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि आरव ने मुझे बीच में ही रोक दिया…

उसने धीमी आवाज़ में कहा कि वो जानता है मैं उसके सामने खुश होने का सिर्फ दिखावा कर रही हूँ…

क्योंकि वो समझ चुका था कि मैं अंदर ही अंदर पूरी तरह टूट गई हूँ…

मेरी आवाज़ काँप रही थी,

और लाख कोशिशों के बाद भी मेरे आँसू रुक नहीं रहे थे…

उस पल शायद पहली बार हम दोनों एक-दूसरे से सच छुपाने की कोशिश कर रहे थे…

और दोनों ही एक-दूसरे का दर्द साफ महसूस कर पा रहे थे…

आरव की आवाज़ उस वक्त पूरी तरह टूटी हुई लग रही थी…

उसने कहा कि उसे समझ ही नहीं आ रहा अब क्या करे…

वो मुझे कभी अकेला नहीं छोड़ना चाहता था…

और मैं…

अपने सारे जज़्बात दिल में दबाकर उसे समझा रही थी…

कि वो और प्रज्ञा एक-दूसरे के लिए ही बने हैं…

कि ये सब एक ना एक दिन होना ही था…

और अब जो हो रहा है, शायद वही सही है…

मैंने उससे कहा कि वो दोनों साथ में बहुत खुश रहेंगे…

हालाँकि ये कहते वक्त मेरा खुद का दिल हर शब्द के साथ टूट रहा था…

फिर कुछ देर चुप रहने के बाद आरव ने मुझसे कहा —

कि आगे अगर मुझे किसी और से कुछ पता चले,

तो मैं ये कभी ना सोचूँ कि उसने मुझसे कुछ छुपाया…

बस उसमें मुझसे वो बातें कहने की हिम्मत नहीं है…

और शायद वो कभी वो हिम्मत जुटा भी नहीं पाएगा…

क्योंकि उसके लिए मेरे बिना जिंदगी की कल्पना तक उसे अंदर से तोड़ देती थी…

जैसे सिर्फ उस खयाल से ही उसकी साँसें भारी हो जाती हों…

कई बार जिंदगी ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है,

जहाँ किसी अपने को हमेशा दिल के करीब रखने के लिए,

उसे कुछ वक्त के लिए खुद से दूर करना पड़ता है…

उस रात शायद ना मैं सो पाई थी,

ना आरव…

हम दोनों बस खामोशी में एक-दूसरे को महसूस कर रहे थे…

इतनी दूरी होने के बावजूद भी,

जैसे हमारी बेचैनी, हमारी साँसें और हमारे आँसू एक-दूसरे तक पहुँच रहे हों…

ना कोई शिकायत बची थी,

ना कोई सवाल…

बस एक डर था —

कि शायद जिंदगी अब हमें पहले जैसा कभी साथ रहने का मौका नहीं देगी…