अध्याय 1 - गुस्सा और गुहार
इंदौर का ये पुराना, ऊपर वाली मंजिल का कमरा, सस्ता सा किराए का, दीवारों पर सफेदी उखड़ी हुई, पंखा भी जैसे जान बचा कर चल रहा था, चरमराता, हर घुमाव में आवाज़ करता। कमरे में बस एक डबल बेड, उस पर मटमैली सी चादर, एक कोने में खुली अलमारी जिसमें कपड़े लटक रहे थे—कुछ आधे बाहर, कुछ अंदर। एक कोने में छोटी सी रसोई, वही से आती बासी चाय की गंध पूरे कमरे में घुली हुई थी। खिड़की खुली थी, जिससे सामने वाली बिल्डिंग की छत साफ दिखती थी, जहां कभी-कभी कोई औरत बाल सुखाती, कोई बच्चा पतंग उड़ाता दिख जाता।
बिस्तर पर दो जवान जिस्म पड़े थे—विकास और आसिफा। दोनों की उम्र वही इक्कीस-बाईस, पर हालात ने चेहरों पर थकावट कुछ ज्यादा ही लिख दी थी। आसिफा, पतली, गोरी, हल्की सी गुलाबी, बड़ी-बड़ी काली आँखें, बाल बिखरे हुए, जैसे भाग कर, लड़ कर, किसी लड़ाई के बाद यहाँ आई हो। विकास, उसके मुकाबले लंबा, सांवला, चेहरे पर हल्की दाढ़ी, आँखें बंद किए दीवार की तरफ मुंह करके लेटा था। आसिफा उसकी पीठ की तरफ देख रही थी, होंठ दाँतों में दबाए, कैसे मनाऊँ इसे, यही सोचती रही।
कमरे में अजीब सा सन्नाटा था। बाहर गाड़ियों के हॉर्न, बच्चों की आवाज़ें आती थीं, पर भीतर बस पंखे का शोर। आसिफा ने हिम्मत की, धीरे-धीरे अपने घुटनों पर सरक कर विकास के करीब आई।
"विकास..." उसकी आवाज़ बड़ी धीमी थी, जैसे डर रही हो कि ज़्यादा जोर से बोली तो गुस्सा और बढ़ जाएगा।
कोई जवाब नहीं।
"विकास, प्लीज़... सुनो न..." और करीब। अब उसकी उंगलियाँ विकास के कंधे तक पहुंच गईं, हल्का सा स्पर्श, जैसे प्यार से जगाने की कोशिश हो।
विकास ने झटका दिया, "सोने दे!" उसकी आवाज़ में कड़वाहट थी, पर आसिफा को पता था, ये गुस्सा दिखावा है, अंदर कुछ और चल रहा है।
आसिफा की आँखें भर आईं, हल्के-हल्के आँसू गाल पर बह चले। "मेरी गलती नहीं थी... प्लीज़... बात तो कर लो..."
कोई असर नहीं। विकास पत्थर की तरह पड़ा रहा। आसिफा को लगा, अब कुछ और करना होगा।
उसने धीरे-धीरे आगे बढ़कर अपनी छाती उसकी पीठ से सटा दी। उसकी सांसें गर्म थीं, गर्दन पर बिखर रही थीं। “विकास... देखो तो सही मेरी तरफ...”
अब उसका हाथ आगे आया, पहले कंधे पर, फिर सीने पर, फिर नीचे पेट पर। विकास की सांस एक पल को अटक गई, फिर थोड़ा तेज़ हुई, पर मुँह अब भी बंद रखा।
आसिफा ने हाथ बढ़ाया, उसकी पैंट के ऊपर से उभार को हल्के से महसूस किया। एक पल को ठिठकी, फिर थोड़ी हिम्मत से उंगलियाँ दबाईं।
विकास ने फिर भी मुँह नहीं खोला, पर अब उसकी साँसें खुद बोल रही थीं।
आसिफा समझ गई—रास्ता यही है। उसने elastic band पकड़ी, उंगली घुसा दी। अंदर अंडरवियर की गर्मी महसूस हुई।
"विकास..." उसने उसके कान में धीरे से फुसफुसाया, "माफ कर दो न... प्लीज़..."
अब उसका हाथ अंडरवियर के नीचे। सीधा लंड तक पहुंच गया—मुलायम, गर्म, अभी-अभी सख्त होना शुरू हुआ था।
विकास का बदन हल्का अकड़ गया, वो अब भी सोने का नाटक कर रहा था, मगर उसके लंड ने उसकी पोल खोल दी थी—धीरे-धीरे पूरा खड़ा हो रहा था।
आसिफा ने पूरी हथेली में लपेटा, गर्दन से लेकर सिर तक पूरी लंबाई महसूस की। मन में मुस्कराई—“इतना बड़ा... हमेशा की तरह...”
अब उसने ऊपर-नीचे हल्का-हल्का हिलाना शुरू किया, पैंट के अंदर ही, जगह कम थी, मगर हाथ तो एक्सपीरियंस्ड हो गया था।
फिर धीरे-धीरे स्पीड बढ़ाई, अब आवाज़ आने लगी—‘सर-सर-सर’—कपड़े और हाथ के रगड़ की आवाज़, बीच-बीच में हल्की-सी सांसों की भी।
लंड पूरी तरह तन गया, अब उसमें जान आ गई थी।
“फक... आसिफा...” आखिर विकास से रहा नहीं गया, उसके मुँह से धीमी आवाज़ निकली।
“हाँ जान, मैं ही हूँ...” आसिफा ने अपनी रफ्तार बढ़ाई।
अब अंडरवियर के अंदर हल्की-सी गीली गर्मी महसूस होने लगी, आसिफा की हथेली भीग गई—precum निकल रहा था। उसने हाथ नहीं रोका, बल्कि और तेज़ कर दिया।
विकास की आवाज़ अब भारी हो गई, गुस्सा जाने कहाँ उड़ गया। “गुस्सा छोड़ दो ना... देखो कितना प्यार करती हूँ...”
“हाँ... छोड़ दिया... बस... रुक मत...” विकास की आवाज़ अब पूरी हवस में बदल चुकी थी।
आसिफा मुस्कराई, दूसरा हाथ उसकी छाती पर रखा, जैसे अपनी ममता, प्यार और हवस सब एक साथ बहा रही हो। एक हाथ लंड पर, रफ्तार अब फुल हो चुकी थी, दूसरा हाथ उसकी छाती पर प्यार से रगड़ता।
“निकालने वाला है...” विकास ने करवट बदलकर उसके कान में फुसफुसाया।
“निकाल दो... यहीं... मेरे हाथ में...” आसिफा ने जैसे इजाजत दे दी।
विकास का बदन एक पल को पूरा तन गया, “आह्ह्ह...” उसके लंड से गर्म, गाढ़ा माल निकला, पैंट के अंदर, आसिफा की हथेली पर, अंडरवियर भीग गया, आसिफा ने हाथ नहीं रोका, आखिरी बूँद तक हिलाती रही, फिर धीरे-धीरे रफ्तार कम कर दी।
हाथ बाहर निकाला—पूरा गीला, चिपचिपा, सफेद लकीरों से सना हुआ।
विकास अब पूरा रिलैक्स, हाँफ रहा था।
आसिफा ने अपने हाथ को देखा, उंगलियों के बीच सफेद धागे जैसे निकल रहे थे। गंध भी आई—तेज, मस्की, हल्का ब्लिच जैसा।
फिर उसने बिना रुके, बिना हिचक, हाथ मुँह के पास लाया, जीभ बाहर निकाली और चाटना शुरू कर दिया।
“ममम...”, स्वाद नमकीन, थोड़ा कड़वा, अब तो उसे इसकी आदत हो गई थी।
एक-एक उंगली चाटी, सारा माल साफ कर दिया, फिर हथेली भी जीभ से चाट डाली जैसे आइसक्रीम हो।
विकास ने करवट बदली, उसे देखा—ये सीन देखकर उसकी हालत और खराब हो गई।
“तू...”, उसकी आँखों में अब सिर्फ हवस थी, गुस्सा जैसे कब का उड़ गया।
अब विकास का बदन जाग गया था, एक झटके में उठा, आसिफा को कंधों से पकड़ा, धक्का देकर नीचे बिस्तर पर गिराया।
“अब मेरी बारी...” उसकी आवाज़ अब भरी हुई थी, गला सूखा, आँखों में जानवर जैसा पागलपन।
ऊपर चढ़ गया उसके, पूरा वजन डालकर, जैसे पकड़ के ही छोड़ेगा नहीं।
आसिफा हँसी—मिशन सक्सेसफुल।
“माफ कर दिया?”
“चुप…” विकास ने उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए।
पहला किस हल्का था, पर जैसे ही दूसरा शुरू हुआ, उसमें पूरी प्यास, गुस्सा, प्यार, हवस सब मिलकर पागलपन बन गए।
विकास ने उसके नीचे वाले होंठ को दाँतों से पकड़ा, खींचा, चूसा—“मममम…”
आसिफा की आवाज़ खुद ब खुद बाहर निकल गई, उसके बालों को मुठ्ठी में पकड़ा, सिर पीछे खींचा, गर्दन खुल गई, विकास ने होंठ छोड़कर गर्दन पर हमला किया—चूमा, चाटा, हल्का काटा, “आह… विकास… धीरे…”
पर विकास को अब ‘धीरे’ का मतलब ही नहीं पता था, वो जैसे पागल हो गया था।
कान के पास चूमा, कान की लोब मुँह में ली, चूसा, फिर नीचे कॉलरबोन तक पहुंचा, जीभ से लंबी, गीली लाइन बनाई।
आसिफा के नाखून उसकी पीठ में गड़ गए, “हाँ… वैसे ही… और…”
फिर होंठ वापस होंठों पर, अब ब्रूटल किसिंग, दोनों के मुँह के अंदर थूक का स्वाद, “चपु-चपु-चपु” की आवाज़, एक पल को भी कोई नहीं रुका।
विकास का बदन जैसे उसका अपना कंट्रोल नहीं रहा, आसिफा नीचे दबी, सांसें फूली हुई, पर एक भी शिकवा नहीं—उल्टा उसकी आँखों में भी वो ही हवस थी।
कमरे में अब सिर्फ दो बदन, दो साँसें, और दो हवसें थीं—बाहर क्या हो रहा, अब किसी को मतलब नहीं था।
(पाठक ध्यान दे यह एक उपन्यास नहीं अपने आप में कामुकता का महाकाव्य होने वाला है लगभग 300 अध्यायों में विस्तारित इस उपन्यास के पास आपको कामुकता की हर काली दुनिया दिखाने की क्षमता है यह भले ही पड़ोसी स्वैपिंग से शुरू होता है किन्तु असल में यह हर यौनिक संभावना की ओर अग्रसर होकर एक कामुकता की अपनी दुनिया बनाता हैं यहां कहानी कहने से ज्यादा आपको दृश्य दिखाए जाते है
चार पात्रों से आपका परिचय कुछ ही अध्याय में हो जाएगा
इनके अलावा सुहानी (अविवाहित मैच्योर स्त्री) ,इकरा (आसिफा की छोटी बहन) के अलावा एक बड़ा सरप्राईज है जो लगभग अपने आप में इस उपन्यास में 150 अध्यायों के बाद प्रवेश करता है किंतु यह इस उपन्यास का सबसे बड़ा हिस्सा है
अगर आप इसे पढ़ना चाहते है तो इसे रेट कीजिये ओर अपने कॉमेंट जरूर करे कहानी को लेकर ताकि इसे में उत्साह के साथ आगे लिख कर पेश कर सकू आपके उत्साहवर्धन से मेरा आलस्य भाग जाएगा और में आपको प्रतिदिन नए अध्यायों के समूह देती रहुंगी)








