जब हो , जब न हो
जब दोस्त साथ होते हैं ,
तो गम का पता नहीं चलता;
जब हम अकेले होते हैं,
तो कहीं मन नहीं लगता।
जब होती है सर पर छत,
तो बाहर घूमा करते हैं;
जब छिनने लगे ये सर से,
तो बौखलाए रोते फिरते हैं।
जब माँ- बाप साथ हों,
तो बातें कम ही होती हैं;
जब खयाल दूरी का आए,
तो रूह सिहर जाती है।
जब छोटे साथ हों,
तो फटकारा करते हैं;
जब पड़ जाएं अकेले ,
तो याद उन्हीं को करते हैं।
ये नाचीज़ इंसान हैं,
आख़िर ये तो ऐसे ही होते है।








