रो लिया करो
मेरे कुछ अल्फ़ाज़ मेरे बचपन से , और आप सब से...
"रोना तो बच्चों का काम है",
ऐसा तुमने भी शायद सुना होगा,
पर मेरे दोस्त , हम तुम भी इंसान हैं;
हमारे भी आंसू हैं, दिल है , जान है,
तो अपना ये कीमती वक़्त,
कभी खुद पर भी ज़ाया किया करो।
लगाओ मलहम अपने ज़ख्मों पर,
कंधा बनो अपनी निराशाओं का,
बातें, शिकायतें, उनसे भी सुना करो;
अगर फ़िर भी बोझ ना उतरे ,
तो लपेटो अपने दुखों को आसुओं मे,
और सारे के सारे बहा दिया करो।
जब चोट दिल ने खाई हो,
और रहे मशरूफ इस क़दर,
की चीख भी निकल ना पाई हो;
तो जब तक दिल हल्का ना हो,
ज़रा सा खुद के लिए,
चीखा करो, चिल्लाया करो।
जब लगे हाथ से छूटने,
लगाम अपनी ही जिंदगी की,
जब दम तुम्हारा लगे घुटने;
उसी लगाम से , जो,
अब हाथों तुम्हारे रही नही,
तो फूट- फूट कर रो लिया करो।
जब तकलीफ़ तुम्हें होती है,
याद रखना हर बार , गलती,
तुमसे नही होती है;
कभी हालात , तो कभी खुद से,
लड़ा करो , और देखो हरबार तुम,
समझौता मत कर लिया करो।
लगेगा , है तो दुख ही,
इतने सहे , एक और सही,
पर ये खंजर है, दुख नही;
धीरे से दिल में दाखिल होगा,
रह-रह कर ज़ख्म देगा,
और आसानी से यह निकलेगा नही।
हर कदम लगने लगेगा भारी,
बिखरते देखोगे तुम ज़िन्दगी तुम्हरी,
ये खंजर खुद नहीं जाएगा कहीं;
फ़िर यह सोचकर पछताओगे,
ना होता हमारा ये हश्र,
आखिर हम रोए क्यों नहीं।








