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10 selective short story

सर्वाधिकार सुरक्षित ©

सारांश

यह किताब 10 लघुकथाओं का संकलन है।

शैली
Fantasy
लेखक
Virendra
स्थिति
चल रही
अध्याय
1
रेटिंग
n/a
आयु रेटिंग
16+

Chapter 1 पडोसी का फर्ज

घोषणा -असल घटनाओं से प्रेरित इस संग्रह की समस्त "लघुकथाएं" काल्पनिक हैं। अतः, इनके किसी नाम, स्थान, पात्र और घटना से साम्यता महज संयोग मात्र है।

----00----

पुणे में आइटी कंपनी में नौकरी के लिए इंटरव्यू देने सीटी बस से स्मृति हिंजेवाड़ी गई हुई थी। वहां उसी के उम्र के सैकड़ों लड़के-लड़कियां हाथों में फाईल लिए हुए पहुंचे थे।

इंटरव्यू 12 बजे दोपहर से प्रारंभ होनेवाला था और अंग्रेजी के वर्णक्रम के अनुसार सबको इंटरव्यू कक्ष में उपस्थिति के लिए पर्जी जारी कर दिया गया था।

स्मृति सोच रही थी कि उसका नंबर करीब-करीब आखिर में आएगा। फिर भी उसको उम्मीद थी कि वो शाम तक घर पहुंच जाएगी।

तभी पौने बारह बजे उन्हें पता चला कि मुख्य इंटरव्यूअर की कार दुर्घटनाग्रस्त हो गई है, जिससे कंपनी का मैनेजमेंट आज का इंटरव्यू कल रखना चाह रहा है।

इससे अभ्यर्थी भड़क उठे और वहीं धरने पर बैठ गए। मैनेजर बाहर आकर उनसे मिला, तो अभ्यर्थियों की दलील थी, ‘‘हममें से आधे उम्मीदवार दूसरे शहरों से आए हुए हैं और उनकी शाम-रात को वापसी का ट्रेन है। लिहाजा, आज का इंटरव्यू आज ही ले लिया जाए, तो उनकी वापसी मुकम्मल हो सकेगी। वरना, उनके लिए पुणे में रहने, खाने-पीने व वापसी के टिकट की भरपाई की जाए।’’

अब, मैनेजर दुविधा में। वो ऐसे गंभीर मसले पर अकेले निर्णय कैसे ले? लिहाजा, उसने मैनेजमेंट से बात किया, तो अभ्यर्थियों के दबाव में मैनेजमेंट ने इरादा बदला और अन्य साक्षात्कार लेनेवाले का प्रबंध किया, जिसमें तीन बज गए।

शाम को इंटरव्यू प्रारंभ हुआ, तो स्मृति का नंबर लगते-लगते छह बज गए। दिसंबर 2022 का यह आखिरी दिन था, जिसमें साढ़े पांच बजे ही सूर्यास्त हो रहा था।

कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। ऊपर से बादल छाए हुए थे। घटाटोप अंधियारा पहले से ही छा चुका था।

बारिश की बूंदें रह-रहकर बरस रही थी, जो शीतलता को और बढ़ा दी थी। इससे उसके शरीर में कंपकंपी छूट रही थी।

वो बड़े-बूढ़ों से सुन रखी थी कि सुबह का लड़ना और शाम का बरसना रुकता नहीं है। दोनों देर से ही थमा करता है।

इस तरह अब, उसको नौकरी मिलने की चिंता कम, घर पहुंचने की चिंता ज्यादा सताने लगी।

समस्या ये भी थी कि वो भीमाशंकर जाने के रास्ते में जिस कोने में रहती थी, वहां के रोड तक सर्दी में सीटी बसें आठ बजे तक ही दौड़ती थी।

टैक्सियां बंद हो जाती थी। आटो नदारद हो जाते थे। सड़कों पर ऐसा सन्नाटा छा जाता था, मानो उपनगर इंसानों से विरान हो गया हो। लोग घरों में दुबक जाते थे।

हां, सड़कों पर यदा-कदा आवारा किस्म के लड़के जरूर दिख पड़ते थे, जो सूनेपन का फायदा उठाया करते थे और अकेली लड़की को देखकर उससे छेड़खानी किया करते थे।

वह अपने पापा को इसी आशंका से फोन लगाई भी कि वे उसे बस स्टाप लेने चले आएं, ताकि वह स्कूटी में बैठकर आराम से घर पहुंच सके।

किंतु, फोन लगाने से स्मृति को पता चला कि पापा बाजार जाने से भीग गए हैं। उनको सर्दी-जुकाम था ही, बुखार ने आ घेरा है। वे दवाइयां लेकर बिस्तर पर पड़े हुए हैं।

उसे हिंजेवाडी जैसे-तैसे साढे सात बजे के आसपास सीटी बस मिली। सीटी बस उसे आठ बजे अपने स्टाप विधुतनगर छोड़ी और नौ-दो ग्यारह हो गई। विधुतनगर से उसके आवासीय कालोनी की दूरी तकरीबन एक किमी थी, जिसमें कई मोड़ भी थे।

एक जगह विराना भी था। वह बगैर विलंब किए पैदल ही अपने कालोनी की ओर चल पड़ी, ताकि जल्दी से घर पहुंच सके। इधर रुक-रुक कर बूंदाबांदी हो रही थी।

वह कुछ दूर चली ही थी कि उसे विराने में आभास हुआ कि दो परछाई खंडहर से निकली हैं और उसका पीछा कर रही हैं। वो अपनी चाल तेज कर दी। फिर भी, उसे अहसास हुआ कि दो लड़के द्रुत गति से चलकर उसके करीब और करीब पहुंच जाना चाहते हैं।

वह पीछे मुड़कर देखी, तो सहम गई। वाकई दो लफंगे टाइप लड़के उसके एकदम करीब पहुंच गए हैं और भूखे भेड़िये की तरह उसे दबोचना चाह रहे हैं। आगे एक मोड़ था। मोड़ के आसपास कोई घर न था।

तभी एक उचक्का उसके एकदम करीब आया और उसका हाथ पकड़ने ही वाला था कि एक सज्जन पुरुष जाने कहां-से वहां पहुंच गया और उन लुच्चों के इरादों को भांपकर जोर से बोला,‘‘अरी, बिटिया। आज तू पैदल। तेरी स्कूटी कहां गई? चल मैं तुझे तेरे घर तक छोड़ देता हूं। उधर मैं जा ही रहा हूं।’’

इतना सुनना था कि वे लुच्चे-लफंगे वहीं थम गए। उन्हें लगा कि वे पकड़े जाएंगे। चीखने-चिल्लाने से लोग घरों से निकलकर उन्हें दबोच लेंगे। इसलिए फौरन यूटर्न लिए और उलटे पांव भाग खड़े हुए।

स्मृति इस हादसे से सिहर उठी, सहम गई। उसके रोंगटे खड़े होे गए। आज उसे पहली बार गहराई से अहसास हुआ कि किसी बेबस, लाचार व बेसहारा लड़की का अपहरण किन परिस्थितियों में होता है? कैसे कोई अबला भूखे भेड़ियों का शिकार बन जाया करती है?

‘‘आप कौन हैं अंकल? कहां रहते हैं? आप तो फरिश्ते बनकर यहां पहुंच गए। वरना आज....’’ यह कहते-कहते वो रूंआंसा हो गई। उसका गला भर आया।

‘‘मैं उमाशंकर हूं बिटिया। पास में घर है मेरा। मैं इवनिंग वाक के लिए निकला ही था कि देखा-दो बदमाश विरानगी का फायदा उठाकर एक लड़की का पीछा कर रहे हैं, तो मैं इधर आ गया.’’उमाशंकर ने सहजता से जवाब दिया।

‘‘यदि आप समय पर नहीं पहुंचते, तो मेरे साथ....।’’ इतना कहकर स्मृति फूट पड़ी,‘‘आप तो मसीहा निकले अंकल। आप जैसे सज्जन पुरुष सब जगह मिल जाएं, तो देश की बिटियाएं सुरक्षित रह जाएं। उनका बाल भी बांका न हो।’’

वे चलते-चलते अगले मोड़ पर पहुंचे ही थे कि स्मृति के पड़ोसी अंकल रामशंकर स्कूटी लिए वहां पहुंच गए,‘‘स्मृति बिटिया, कैसी हो? तुम्हारे पापा की तबीयत अचानक बिगड़ गई है। इसलिए, उन्होंने मुझे तुम्हें स्कूटी में लिवा लाने के लिए भेजा है।.’’

पड़ोसी रामशंकर अंकल को देखकर स्मृति की आंखें डबडबा आईं। बोली,‘‘आपने पहुंचने में थोड़ी देरी कर दी अंकल। अभी-अभी यहां एक भयानक हादसा होते-होते रह गया, जो उमाशंकर अंकल के समय पर पहुंचने से टल गया।’’ वह उमाशंकर की ओर हाथ जोड़कर बोली।

‘‘तुम्हारे पापा ने मुझे अभी हाल बताया बिटिया। वे पहले से बताते, तो मैं तुम्हें लेने के लिए बस स्टाप समय पर पहुंच जाता।’’ रामशंकर ने अपनी विवशता बताई।

इतने में स्मृति उमाशंकर की ओर देखकर बोली,‘‘आप मेरे पितातुल्य हैं। आपने मेरी हिफाजत की है, इसलिए आप मेरे लिए सदैव आदरणीय रहेंगे। ईश्वर आपके परिवार को हमेशा खुश रखे।’’...और स्मृति उमाशंकर का फोन नंबर लेकर उसे सेव कर ली।

फिर स्मृति उनका पैर छुई और आशीर्वाद लेते हुए रामशंकर की स्कूटी में जा बैठी। अब वो ‘जाते हुए साल’ में बेफिक्री से अपने घर की ओर चली जा रही थी।

--00--

लघुकथा पढ़ने के लिए दिल से शुक्रिया। कृपया समीक्षा लिखें। फालो करें और सब्सक्राइब कर लेखक को प्रोत्साहित करें।

फिर मिलते हैं एक नए और रोचक लघुकथा के साथ। तब तक के लिए नमस्कार।

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रोचक कथानक

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शानदार चरित्र

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सशक्त संवाद

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