AAROHI : HIS FORCED WIFE
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आरुषि: एक मजबूरी का बंधन

moonshine

इस स्टोरी में ये थीम शामिल हैं: घरेलू हिंसा

सर्वाधिकार सुरक्षित ©

स्टोरी नोट्स

उसे एक मोहरे की तलाश है। अपने दादाजी की एक प्रॉपर्टी डील के लिए। शर्त यह है कि सिर्फ शादीशुदा वारिस ही उस संपत्ति का दावा कर सकता है।


उसे ऐसी पत्नी चाहिए जो उसकी ज़िंदगी में दखल न दे...


उसने एक ऐसी मासूम रूह को कैद करने का फैसला किया जो उसके काम में बाधा न डाले।


उसने उसे कैफे में देखा और अपना दांव चलने का फैसला किया...


"प्लीज, मेरी माँ को नुकसान मत पहुँचाओ," वह घुटनों पर बैठकर गिड़गिड़ाती है।


"तो मुझसे शादी कर लो," वह हुक्म देता है।


"अगर तुम अपनी माँ को ज़िंदा देखना चाहती हो, तो मुझसे शादी कर लो आरुषि, वरना--"

वह धमकी देता है।


..



क्या उसे आरुषि के लिए कोई एहसास होगा?


क्या आरुषि इस जबरन शादी में खुश रह पाएगी?


क्या भविष्य में वे एक हो पाएंगे?

..

सारांश

आरुषि ने कभी नहीं सोचा था कि उसकी ज़िंदगी रातों-रात बदल जाएगी। सरकार परिवार के ठंडे और शक्तिशाली वारिस, वीरांश सरकार के साथ एक जबरन शादी में बंधकर, वह एक ऐसी दुनिया में कदम रखती है जिसे उसने कभी नहीं चुना था—एक ऐसी दुनिया जो दौलत, अपेक्षाओं और एक ऐसे पति से भरी है जो शुरुआत में इस शादी को केवल एक समझौते से ज़्यादा कुछ नहीं मानता। नफरत, गलतफहमियों और गहरे भावनात्मक ज़ख्मों से शुरू हुआ यह रिश्ता धीरे-धीरे कुछ ऐसा बन जाता है जिसकी किसी ने उम्मीद नहीं की थी। जैसे-जैसे आरुषि सरकार हाउसहोल्ड में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष करती है, वीरांश खुद को उसकी छोटी-छोटी बातों पर गौर करते हुए पाता है—कैसे वह अपने दर्द को छिपाती है, कैसे वह खुद को छोड़कर सबका ख्याल रखती है, और उसकी मुस्कान के पीछे छिपे अकेलेपन को वह महसूस करने लगता है। लेकिन ठीक उसी समय जब उनके बीच प्यार की शुरुआत होती है, पुरानी गलतियाँ, अतीत के गहरे राज़ और एक विनाशकारी गलतफहमी सब कुछ तबाह करने की धमकी देते हैं। एक जबरन शादी से लेकर एक अनपेक्षित प्रेम कहानी तक, दिल टूटने और अलगाव से लेकर मरहम और दूसरी मौकों तक, आरुषि और वीरांश को यह सीखना होगा कि प्यार का मतलब परफेक्ट शुरुआत नहीं, बल्कि हर हाल में ज़ख्मों के बावजूद एक-दूसरे को चुनना है। और जब दो नन्हीं धड़कनें उनके जीवन में आती हैं, तो उन्हें एहसास होता है कि परिवार इस बात से तय नहीं होता कि कहानी कैसे शुरू हुई, बल्कि इससे कि मुश्किल वक्त में कौन आपके साथ खड़ा रहा। प्यार, माफी, हीलिंग, परिवार और सबसे अनपेक्षित इंसान में अपना घर ढूंढ लेने का एक भावुक सफ़र। "तुम भी बहुत पहले से मेरा घर बन चुके थे।" एक slow-burn, arranged marriage रोमांस, जो इमोशनल हीलिंग, प्रेगनेंसी, फैमिली बॉन्ड्स, possessive yet caring हसबैंड एनर्जी, डोमेस्टिक मोमेंट्स और हर तूफ़ान से गुज़रने की ताकत रखने वाले प्यार से भरपूर है।

शैली
Romance
लेखक
moonshine
स्थिति
पूरी
अध्याय
86
रेटिंग
5.0 (1 समीक्षा)
आयु रेटिंग
18+

PROLOUGE

आरुषि:

मुझे उसी पल लग गया था कि कुछ गड़बड़ है, जब कैफे का पिछला दरवाज़ा मेरे पीछे बंद होने से इनकार कर गया।

दुकान बंद होने का समय बीत चुका था। मैं कचरे का आखिरी थैला नगर निगम के कूड़ेदान में फेंकने के लिए तंग गली में गई थी।

बारिश से भीगी धूल हवा में घुली हुई थी। उदयपुर की रातें अक्सर शोर भरी होती हैं—स्कूटर, फेरीवाले, पर्यटक—लेकिन उस रात गली ऐसी शांत थी, जैसे आवाज़ को किसी ने बंधक बना लिया हो।

मेरे हाथ खुद-ब-खुद कचरे के थैले को और कसकर पकड़ लिए। जब मैंने कदमों की आहट सुनी, तो मैं मुड़ी भी नहीं।

मैं जम गई। मेरी साँसें गले में अटक गईं, ठीक वैसे ही जैसे खतरे का अहसास होते ही होता है। मैं घूमी।

दो आदमी गली के मुहाने पर खड़े थे। उन्होंने काले कपड़े पहने थे और नारंगी स्ट्रीटलाइट के सामने उनकी परछाइयां साफ दिख रही थीं। वे कैफे के लोग नहीं थे। वे ग्राहक भी नहीं थे। वे ऐसे लोग लग रहे थे जिनसे माँ अपनी बेटियों को सावधान रहने के लिए कहती हैं।

मेरी धड़कन इतनी तेज़ थी कि मुझे लगा वे भी उसे सुन सकते हैं। "मुझे... मुझे अंदर जाना है," मैंने फुसफुसाते हुए कहा, हालाँकि मेरी आवाज़ बमुश्किल मेरे होंठों से बाहर आ पा रही थी। उनमें से एक आदमी आगे बढ़ा।

"मिस आरुषि पुरोहित?"

मेरा कलेजा मुँह को आ गया। मैंने कोई जवाब नहीं दिया। देने की ज़रूरत भी नहीं थी। किसी अजनबी के मुँह से अपना नाम सुनना किसी अपशकुन जैसा लगा। उस आदमी ने अपना फोन आगे किया। स्क्रीन पर एक फोटो थी जो उसे नहीं दिखानी चाहिए थी, वह मेरी थी। शायद उसी शाम ली गई थी, जब मैं कैफे की खिड़की से मेज़ साफ कर रही थी।

"हमारे साथ चलो।" उसका लहज़ा धमकी भरा नहीं था।

"म-मैं नहीं-"

मेरी हकलाहट ने मेरे बाकी शब्दों का गला घोंट दिया।

उसने मेरे बोलने का इंतज़ार नहीं किया। उसने मेरी कलाई पकड़ी, ज़ोर से नहीं पर मजबूती से, और मुझे आगे खींच लिया। कचरे का थैला मेरे हाथ से छूटकर गीली ज़मीन पर फट गया, पर मैंने पीछे मुड़कर भी नहीं देखा।

मेरा दिमाग बस एक ही जगह था, माँ।

"प्लीज़," मैंने कांपती साँसों के साथ कहा। "म-मेरी माँ... वह मेरा इंतज़ार कर रही हैं... वह घबरा जाएंगी-"

"तुम उन्हें जल्द ही देख लोगी," उस आदमी ने कहा। उसने यह साफ नहीं किया कि वह ज़िंदा होने की बात कर रहा था या नहीं। मेरे घुटने जवाब दे गए।

मुझे एक काली कार की पिछली सीट पर धकेल दिया गया, जिसकी खिड़कियों पर इतनी गहरी काली फिल्म लगी थी कि वे आँखों पर पट्टी जैसी लग रही थीं। दरवाज़े बंद होते ही लॉक हो गए। इंजन धीमी आवाज़ में गूँज रहा था, कुछ ज़्यादा ही धीमी।

गाड़ी चलते ही शहर धुंधला पड़ गया, स्ट्रीटलाइट कांच पर पीली लकीरों की तरह खिंचती जा रही थी। "आप मुझे कहाँ ले जा रहे हैं?" मैंने बमुश्किल पूछा। दोनों में से किसी ने जवाब नहीं दिया।

मेरी उंगलियां गोद में बुरी तरह कांप रही थीं। मैंने माँ की सिखाई हुई तकनीक से साँसें गिनने की कोशिश की: एक... दो... तीन... लेकिन मेरे फेफड़े मेरी बात नहीं सुन रहे थे।

जब गाड़ी धीमी हुई, तो हवा और ठंडी हो गई। हम झील के पास एक सुनसान गोदाम इलाके में रुके, जो उदयपुर का ऐसा औद्योगिक हिस्सा था जहाँ रात में कोई नहीं आता।

एक आदमी प्रवेश द्वार के बाहर खड़ा था, हाथ जेब में, मुद्रा बिल्कुल निश्चिंत थी। जैसे लड़कियों का अपहरण करना उसके काम का एक छोटा सा हिस्सा हो।

मेरे लिए कार का दरवाज़ा खोला गया, लेकिन मेरा शरीर हिलने को तैयार नहीं था। तभी वह आगे बढ़ा।

वीरंश सरकार।

मैंने उसे पहले नहीं पहचाना, बस उसकी महंगी घड़ी, शर्ट की करीने से की गई कटिंग और जिस तरह उसने बिना पलक झपकाए मुझे देखा, उसे देख पाई। लेकिन उसके आस-पास उन आदमियों की घबराहट ने मुझे सब बता दिया:

वह ऐसा इंसान था जिसके होने भर से हवा का मिज़ाज बदल जाता था।

"इसे बाहर लाओ," उसने कहा। उसकी आवाज़ धीमी थी। यह चिल्लाने से कहीं ज़्यादा डरावनी थी। आदमियों ने मुझे बाहर खींचा। मेरी टांगें कंकड़ पर लड़खड़ा गईं।

"तो।" वीरंश की नज़रें मेरे कांपते हुए शरीर, मेरी कैफे यूनिफॉर्म और मेरी बिखरी हुई चोटी पर टिकीं।

"यही वह लड़की है।"

वह मुड़ा और गोदाम के ऑफिस के अंदर चला गया, जैसे उसे यकीन हो कि मैं पीछे आऊंगी। मैं हिली नहीं। उनमें से एक आदमी ने मुझे आगे धकेला। अंदर, कमरे में कागज और धूल की महक थी।

ऊपर एक ट्यूबलाइट झिलमिला रही थी, जो वीरंश के चेहरे पर कठोर परछाइयां बना रही थी।

वह दस्तावेज़ों से भरी एक मेज़ के पीछे खड़ा था।

"बैठो।"

मैं बैठ गई क्योंकि खड़े रहना मुमकिन नहीं लग रहा था। उसने एक फाइल थपथपाई। "तुम्हारी माँ मीरा पुरोहित हैं। पैंतालीस साल की। वह दर्जी का काम करती हैं। स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतें हैं, अनियंत्रित हाइपरटेंशन है।"

मेरी रीढ़ की हड्डी में सिहरन दौड़ गई। "आपको-आपको कैसे-" उसने रिमोट का एक बटन दबाया और दीवार पर लगी स्क्रीन पर तस्वीरें उभर आईं।

मेरी माँ। सब्ज़ियां खरीद रही हैं, घर लौट रही हैं, हमारी इमारत में प्रवेश कर रही हैं, हमारा दरवाज़ा खोल रही हैं।

ये तस्वीरें आज की थीं। मेरा सीना धंस गया। मुझे अपनी धड़कन के सिवा कुछ सुनाई नहीं दे रहा था जो मेरे कानों में चीख रही थी। "मुझे अपनी बात दोहराना पसंद नहीं है," वीरंश ने सादगी से कहा। "इसलिए ध्यान से सुनो।"

वह करीब आया। रोशनी उसके चेहरे पर तीखी लकीरें उभार रही थी, गालों की हड्डियां हथियार जैसी थीं, आँखें ऐसी थीं जिन्हें पढ़ा नहीं जा सकता था।

"मुझे एक पत्नी चाहिए।"

मेरी साँसें टूट गईं। "और मुझे वह तुरंत चाहिए।" मैंने सिर हिलाया। "मैं-नहीं-नहीं, प्लीज-प्लीज़, मैं नहीं कर सकती-"

"तुम कर सकती हो।"

उसका लहज़ा ऊपर नहीं हुआ। यही बात उसे खौफनाक बना रही थी। उसने मेरी तरफ एक दस्तावेज़ सरकाया। शादी का अनुबंध। मेरा गला सूख गया। "मैं तो आपको जानती भी नहीं हूँ," मैंने फुसफुसाया।

वह घुटनों के बल बैठ गया। वह वाकई घुटनों पर था, पर कोमलता के लिए नहीं, बल्कि जैसे वह मुझे विकल्प दे रहा हो और मुझे एक चुनना ही था। वह सीधे मेरी आँखों में देख रहा था।

"मुझे तुम्हारी ज़रूरत नहीं कि तुम मुझे जानो," उसने कहा। "मुझे तुम्हारी ज़रूरत है कि तुम मेरी बात मानो।" मेरी आवाज़ की हकलाहट इतनी तेज़ हो गई कि मैं बोल नहीं पाई। उसने जारी रखा, उसकी आवाज़ स्थिर, भावहीन... उबाऊ थी।

"अगर तुमने मना किया, तो तुम्हारी माँ आज रात मर जाएगी।" मेरी साँसें थम गईं।

"तुम झूठ बोल रहे हो," मैंने कांपते हुए कहा, पर उन शब्दों में डर का स्वाद था। उसने पीछे की ओर झुककर अपने एक आदमी को इशारा किया। आदमी ने अपना फोन उठाया और लाइव वीडियो फीड दिखाई। मेरी इमारत। मेरा मुख्य दरवाज़ा। एक आदमी उसके बाहर इंतज़ार कर रहा था। मेरा खून जम गया।

"मैं झूठ नहीं बोलता," वीरंश ने कहा। आँसुओं ने मेरी नज़र धुंधली कर दी। मेरी उंगलियां अपने घुटनों को नोचने लगीं। "मैं आपसे भीख मांगती हूँ-प्लीज़-प्लीज़ उन्हें चोट मत पहुंचाइए-उन्होंने-उन्होंने कुछ नहीं किया-"

"मुझे उसकी परवाह नहीं है," उसने सपाट कहा। "और न तुम्हारी। मुझे शादी चाहिए। तुम बस काम की हो। इतना ही काफी है।"

मेरे अंदर कुछ टूट गया। मेरा हाथ कॉन्ट्रैक्ट की तरफ बढ़ा, कांपता हुआ, पर मैं पेन नहीं पकड़ पा रही थी। वह दो बार मेरी उंगलियों से फिसला, फिर उसने उसे उठाया और मेरी कांपती उंगलियों के बीच रख दिया।

"साइन करो।"

मैंने कोशिश की। मेरा हाथ हिला तक नहीं। मेरी आँखों के आगे अंधेरा छा गया। "मैं नहीं कर सकती-मेरा हाथ-यह नहीं-" वह इतना करीब झुका कि मैंने उसके कान के पास उसकी साँसें महसूस कीं।

"साइन करो," उसने फुसफुसाया, "वरना मुझे एक फोन कॉल करना होगा।" घबराहट से मेरा पूरा शरीर कांप उठा। मैंने अपना नाम लिख दिया। टेढ़ा-मेढ़ा। बदसूरत। मुश्किल से पढ़ा जाने वाला। उसके बाद उसके दस्तखत आए, मज़बूत और सुंदर, जैसे वह कोई बिजनेस कॉन्ट्रैक्ट साइन कर रहा हो।

उसने पीछे किसी को इशारा किया। एक आदमी एक छोटा सा मखमली डिब्बा लेकर आगे आया। अंदर एक अंगूठी थी, चांदी की। वीरंश ने उसे उठाया और खुद मेरी उंगली में पहना दिया।

चांदी की अंगूठी लोहे से भी भारी महसूस हो रही थी। "मुबारक हो," उसने धीरे से कहा, बिना किसी मुस्कान के। "तुम अब मिसेज़ आरुषि वीरंश सरकार हो।" बत्ती फिर से झिलमिलाई, गोदाम की दीवारें जैसे मेरे करीब सिमटने लगीं।

मैं साँस नहीं ले पा रही थी, बोल नहीं पा रही थी, सोच नहीं पा रही थी।

मुझे बस एक बात पता थी: मेरी ज़िन्दगी अब मेरी नहीं रही।

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