हर रोज तुमसे फिर से (शार्ट स्टोरी)
उपन्यास शीर्षक: हर रोज़ तुमसे फिर से.....
लेखक: हृदयांश "हृदय"
प्रस्तावना
ज़िंदगी की भीड़ में हम कई लोगों से मिलते हैं। कुछ पल भर के लिए आते हैं, और कुछ... हमेशा के लिए रह जाते हैं। लेकिन कभी-कभी कोई ऐसा भी होता है जिससे हर रोज़ मिलना, हर रोज़ उससे फिर से प्यार करना... एक आदत बन जाती है। यही कहानी है आरव और सानवी की। एक ऐसी कहानी जहाँ प्यार में गिरना भी एक नई तरह की उड़ान बन जाता है।
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दिल्ली की सर्दियों की शाम थी। हवा में हल्की-सी धुंध और बुक कैफ़े की खिड़कियों पर जमी हुई भाप, जैसे हर किसी के मन की उलझनों को छुपा रही हो। कैफ़े के कोने की टेबल पर बैठा था आरव — अपनी वही पुरानी कॉफी, और सामने रखी थी एक किताब:
दरवाज़ा खुला... और वो आई।
सानवी। घुंघराले बाल, गहरे नीले रंग का स्कार्फ, और हाथों में थी एक किताब। वो सीधी काउंटर की ओर गई और फिर उसकी नज़र आरव पर पड़ी।
“क्या मैं यहाँ बैठ सकती हूँ?” आरव ने सिर हिलाया।
फिर आई वो लाइन — जो इस कहानी की नींव बन गई। आरव ने कहा:
“ज़ीवन में जीने के लिए रोज़ प्यार में गिरना पड़ता है...”
सानवी हँसी, “वो भी हर बार उसी इंसान के साथ?”
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अब हर शनिवार को वही बुक कैफ़े, वही टेबल, वही दो लोग — आरव और सानवी। किताबों की बातों से शुरू हुआ सफ़र अब दिल के पन्नों तक पहुँच चुका था।
सानवी ने पूछा, “तुम इतना चुप क्यों रहते हो?”
आरव ने कहा, “क्योंकि शब्द ज़िम्मेदारी माँगते हैं, और मैं डरता हूँ खो देने से।”
वो अब किताबें बाँटते, बारिश देखते, एक-दूसरे के ख्यालों में खुद को खोजते। उनके बीच कुछ ऐसा था जिसे शब्दों की ज़रूरत नहीं थी।
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एक शाम सानवी नहीं आई। एक मैसेज: “आज नहीं आ पाऊँगी, पापा को अस्पताल ले जाना पड़ा।”
आरव बेचैन हो गया। वही अस्पताल जहाँ उसने अपनी माँ को खोया था। सानवी ने जब उसे वहाँ रोते देखा और पास आई, तो आरव चिल्ला उठा:
“तुम क्या जानती हो मेरे बारे में?”
सानवी सिर्फ़ इतना बोली, “तुमने कभी मौका ही नहीं दिया समझने का।”
और चली गई।
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दोनों दूर हो गए। न कॉल, न मैसेज। बुक कैफ़े अब अधूरा लगने लगा। सानवी ने लिखना शुरू किया — अपनी डायरी में, अपनी तकलीफ़ें, आरव की खामोशियाँ।
आरव ने खुद को किताबों में, पुराने गानों में और चाय की खाली प्यालियों में खो दिया।
एक शाम वो उसी कैफ़े में लौटा, और उसकी वही पुरानी कॉफी — बग़ैर शक्कर के — टेबल पर रखी थी।
वेटर ने कहा, “सानवी आई थी। बोली शायद आज तुम आओगे।”
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आरव भागा। वही पार्क जहाँ वो कभी साथ बैठे थे।
सानवी वहाँ बैठी थी — वही स्कार्फ, वही मुस्कान।
आरव ने कहा, “मैं आज भी रोज़ प्यार में गिरता हूँ... लेकिन अधूरा गिरता हूँ, जब तक तुम साथ नहीं होती।”
सानवी की आँखें नम थीं, “क्या अब भी डरते हो?”
आरव ने उसका हाथ थामा, “अब सिर्फ़ तुम्हें खोने से डरता हूँ।”
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अंत: हर रोज़ तुमसे फिर से
कहानी वहीं लौट आई जहाँ से शुरू हुई थी — प्यार में गिरने की आदत पर।
लेकिन अब वो आदत नहीं रही, अब वो ज़रूरत बन गई थी। वो दोनों अब हर रोज़ एक-दूसरे से दोबारा मिलते थे।
हर सुबह एक नई शुरुआत होती। हर शाम एक नया एहसास। हर झगड़े के बाद एक मीठी माफ़ी। और हर दिन...
हर रोज़ फिर से प्रेम। हर रोज़ सिर्फ तुमसे फिर से वही प्रेम...
- समाप्त -
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