Henry the poor boy joker in circus

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Summary

"Henry" – एक प्रेरणादायक सफर की कहानी हेनरी, लंदन के पुराने समय में रहने वाला एक किसान का बेटा था, जब सर्कस देखना लोगों के लिए सबसे बड़ा मनोरंजन हुआ करता था। गांव में सादगी से जीवन बिताने वाला हेनरी एक दिन अपने पिता के साथ शहर जाता है, जहाँ उनकी मुलाकात एक अमीर और दयालु व्यक्ति से होती है, जो एक मशहूर सर्कस का मालिक है। हेनरी की होशियारी और लगन से प्रभावित होकर वह व्यक्ति हेनरी को पढ़ाई के लिए अपने साथ शहर ले जाता है। वहीं, सर्कस के करीब रहकर हेनरी की उसमें गहरी दिलचस्पी बढ़ती जाती है। छोटे-छोटे अनुभवों और मेहनत से वह न केवल सर्कस में अपनी पहचान बनाता है, बल्कि समय के साथ उसे नई ऊंचाइयों पर ले जाकर खुद एक सफल और प्रसिद्ध सर्कस का मालिक बन जाता है। यह कहानी है सपनों, मेहनत और जुनून की—जहाँ एक किसान का बेटा अपने हुनर और हिम्मत से दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाता है।

Genre
Drama
Author
Uusha
Status
Ongoing
Chapters
6
Rating
n/a
Age Rating
18+

Chapter 1 Henry

Page no 1 Henry the poor boy joker in circus

यह उस दौर की बात है, जब पूरी दुनिया में सर्कस एक नया करिश्मा बनकर उभरा था। लोग इसकी चकाचौंध और जादू से मंत्रमुग्ध हो जाते थे, लेकिन सर्कस की टिकट इतनी महंगी होती थी कि हर कोई उसे देख पाने का सपना भी नहीं देख सकता था। सर्कस सिर्फ अमीरों की दुनिया का हिस्सा लगता था — गरीबों के लिए तो मानो वह कोई अधूरा सपना हो।

यह कहानी एक ऐसे ही गरीब लड़के की है, जिसका नाम था हेनरी ब्लैकस्मिथ। वह लंदन के एक छोटे से गांव में रहता था। उसका परिवार बेहद गरीब था। उसके पिता, फिलिप ब्लैकस्मिथ, एक साधारण किसान थे, जो खेतों में मेहनत करके दो वक्त की रोटी जुटाते थे। उसकी माँ, लिली ब्लैकस्मिथ, एक सादा-सी गृहिणी थीं। हेनरी उनके इकलौते बेटे थे। उनका जीवन तंगहाली और संघर्षों से भरा हुआ था। हर दिन उनके लिए एक नई चुनौती लेकर आता — कभी खाने का संकट, तो कभी मौसम की मार से बर्बाद हुई फसल। उनके पास इतने पैसे भी नहीं थे कि हेनरी को किसी अच्छे स्कूल में भेज सकें। लेकिन इसके बावजूद, जैसे-तैसे हेनरी ने दसवीं कक्षा तक की पढ़ाई पूरी की।

हेनरी का मन पढ़ाई में कम और सपनों में ज़्यादा लगता था। गांव की संकरी गलियों से ऊपर उठकर वह उस चमकती दुनिया को देखना चाहता था, जिसका ज़िक्र लोग शहर से लौटकर किया करते थे — और सर्कस... वही तो था उसके बचपन के सपनों का एक रंगीन झूला। वो पढ़ाई के साथ-साथ छोटे-मोटे काम करके पैसे कमाता था। कहीं किसी के यहाँ अख़बार फेंकने का काम करता, तो कहीं किसी का सामान उठाने में मदद करता। कभी-कभी वह अपने पिता के साथ खेत में भी काम करता था।

उनका गांव बहुत छोटा था। वहां ज़्यादातर लोग मध्यमवर्गीय या गरीब ही थे। उनके पास ऐसी सुविधाएं नहीं थीं कि वे अमीरों की तरह रह सकें, न ही वे अच्छी शिक्षा या बड़ा घर अफ़ोर्ड कर सकते थे। उनके घर बहुत ही छोटे होते थे, लेकिन फिर भी वे सुंदर लगते थे — जैसे मिट्टी में भी कोई फूल खिला हो।

कभी-कभी ऐसा लगता था कि वे अपनी इस गरीबी में भी बहुत खुश थे। मगर सच तो यह था कि भीतर ही भीतर वे कहीं न कहीं दुखी भी थे। उनका जीवन कठिनाइयों से भरा हुआ था, फिर भी वे लोग छोटी-छोटी बातों में खुशियाँ ढूंढ़ ही लेते थे।

हेनरी ने कभी शहर नहीं देखा था। उसने बस अपने माता-पिता से सुना था कि वहाँ के लोग बहुत अमीर होते हैं। उनका जीवन खुशियों से भरा होता है। उनके पास ढेर सारे पैसे होते हैं, अच्छा खाना, सुंदर और बड़ा घर, महंगी कारें और अच्छे कपड़े होते हैं।

हेनरी जब यह सब सुनता, तो वह मासूमियत से अपने माता-पिता से पूछता, “हम शहर क्यों नहीं जा सकते?” उसके पिता कहते, “हम जा सकते हैं... जब हमारे पास पैसे होंगे।” हेनरी फिर मासूमियत से पूछता, “तो हमारे पास पैसे क्यों नहीं हैं?”

उसकी यह बात सुनकर उसके माता-पिता एक-दूसरे की ओर देख लेते, जैसे उस सवाल का कोई सीधा उत्तर उनके पास न हो। फिर वे टालते हुए कहते, “हेनरी, जब तुम बड़े हो जाओगे, तब तुम्हें सब कुछ समझ में आ जाएगा। अभी तुम बहुत छोटे हो।”

और वे अपने-अपने काम में व्यस्त हो जाते। हेनरी उत्सुकता भरी नज़रों से उन्हें देखता रहता, मानो उसकी आंखों में हज़ारों सवाल तैर रहे हों।

और कई हज़ारों सवाल उसके मन में लगातार घूमते रहते।

तभी वह अपने माता-पिता से कहता, “एक दिन मैं भी शहर जाऊँगा। खूब पैसा कमाऊँगा। और देखना, वहाँ मैं बहुत अच्छा घर और गाड़ी खरीदूंगा। जिसमें हम तीनों रहेंगे और घूमेंगे।” उसकी यह मासूम और सपनों से भरी बात सुनकर उसके माता-पिता ज़ोर से हँस पड़ते।

हेनरी ने कई बार अपने पिता से कहा, “पिताजी, मुझे शहर जाना है। मुझे देखना है कि शहर कैसा होता है। वहाँ के लोग कैसे होते हैं?”

यह सुनकर हेनरी के पिता थोड़े चिंतित हो जाते और गंभीर स्वर में कहते, “वहाँ के लोग, बेटा, बहुत ही कठोर और निर्दयी होते हैं। सिर्फ कुछ ही लोग तुमसे अच्छे से बात करेंगे। बाक़ी सब लोग वहाँ सिर्फ पैसे कमाने की दौड़ में लगे रहते हैं।”

वहाँ किसी के पास किसी के लिए वक़्त नहीं होता।

तब हेनरी ने पूछा, “पिताजी, आप शहर क्यों नहीं जाते? वहाँ पैसे कमाने?” यह सुनकर फिलिप ने मुस्कुराते हुए कहा, “जाओ, खेलो। जब तुम बड़े हो जाओगे, तब तुम सब समझ जाओगे।”

यह सुनकर हेनरी गहरी सोच में डूब जाता। “ऐसा क्या है शहर में कि वहाँ पैसा ज़्यादा है? और हम गांव वाले लोग गरीब क्यों हैं?” वह मन ही मन ठान लेता, “मैं भी एक दिन शहर जाऊंगा... ज़रूर जाऊंगा।”

एक दिन फिलिप ज़रूरी काम से शहर जा रहे थे—अपनी खेती से जुड़े किसी काम के सिलसिले में। जब हेनरी को उसकी माँ से यह पता चला कि उसके पिता शहर जा रहे हैं, तो वह खुशी से झूम उठा।

वह उत्साहित होकर अपनी माँ से कहने लगा, “मुझे भी शहर जाना है, माँ! पिताजी कहाँ हैं?” उसका चेहरा खुशी से चमक रहा था। उसके मन में उत्सुकता थी, जैसे कोई सपना अब हक़ीकत बनने जा रहा हो—शहर को देखने का सपना।

उसकी माँ कुछ कहती, उससे पहले ही हेनरी दौड़ता हुआ बाहर निकल गया और सीधे अपने पिता के पास जाकर खड़ा हो गया। उसके पिता फिलिप शहर जाने की तैयारी कर रहे थे।

उन्होंने हेनरी को देखा और पूछा, “क्या हुआ? कुछ चाहिए क्या?” यह सुनकर हेनरी ने जल्दी से कहा, “पिताजी, आप शहर जा रहे हैं? माँ ने मुझे बताया। मैं भी चलूंगा आपके साथ!”

यह सुनकर फिलिप ने उसकी ओर गंभीर नज़रों से देखा और पूछा, “तुम वहाँ क्या करोगे? मैं खेत के काम से जा रहा हूँ। वहाँ मुझे तुम्हारा भी ध्यान रखना पड़ेगा। यहाँ तुम्हारी माँ अकेली है... जाओ, उसके साथ रहो।” फिर उन्होंने हेनरी के सिर पर हल्का सा हाथ फेरते हुए कहा, “मैं शाम तक जल्दी वापस आ जाऊंगा।”

हेनरी की आँखों में थोड़ी निराशा तैर गई, पर उसने कुछ नहीं कहा। बस चुपचाप अपने पिता को जाते हुए देखता रहा।

“नहीं पिताजी, मैं आपके साथ चलूंगा! मुझे शहर देखना है... प्लीज़ पिताजी, प्लीज़!” हेनरी ने बहुत मिन्नतें कीं, मगर फिलिप ने साफ़ मना कर दिया। “नहीं, हेनरी।”

हताश होकर हेनरी दौड़ता हुआ अपनी माँ के पास गया और शिकायत करते हुए बोला, “माँ, देखो न! पिताजी मुझे अपने साथ शहर नहीं ले जा रहे।”

यह सुनकर उसकी माँ ने समझाते हुए कहा, “वहाँ तुम क्या करोगे? वो अपने काम से जा रहे हैं, बेटा।”

हेनरी ने आँसू भरी आँखों और मासूम चेहरे से कहा, “नहीं माँ, प्लीज़... पिताजी से कहो न! एक बार, बस एक बार... माँ, प्लीज़!”

उसकी ज़िद देखकर माँ का दिल पिघल गया। उसने फिलिप से कहा, “क्या तुम इसे भी अपने साथ ले जा सकते हो? ले जाओ न, एक बार... ये भी देख लेगा, थोड़ा घूम लेगा।”

फिलिप ने गहरी साँस ली, फिर मुस्कराते हुए कहा, “ठीक है... अब तुम कह रही हो, तो ले जाता हूँ।”

यह सुनकर हेनरी की आँखों में चमक दौड़ गई। वह ख़ुशी से उछल पड़ा। “माँ, मैं तैयार हो जाता हूँ!”

उसकी माँ मुस्कराई और बोली, “रुको, पहले तैयार हो जाओ, फिर अपने पिताजी के साथ जाना।”

हेनरी फटाफट दौड़कर तैयार होने लगा। उसके चेहरे की ख़ुशी देखते ही बनती थी। आज वह सातवें आसमान पर उड़ रहा था।

उसने मन ही मन बहुत कुछ सोच रखा था — “आज मैं शहर जाकर खूब घूमूंगा... और जब वापस आऊँगा, तो अपने दोस्तों को सब कुछ बताऊंगा!” वो बहुत खुश था। उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसका सबसे बड़ा सपना पूरा होने वाला है।

वह अपने पिता के साथ, माँ को अलविदा कहकर शहर की ओर चल पड़ा। रास्ते में वह लगातार अपने पिता से सवाल करता जा रहा था — “पिताजी, शहर में और क्या-क्या होता है?” “आप मुझे कहाँ ले जाएंगे?” “क्या हम सर्कस भी देखेंगे?”

फिलिप मुस्कुराकर उसके सवालों का जवाब देते, कभी टालते, तो कभी प्यार से समझाते।

वे कच्चे रास्तों से होते हुए रेलवे स्टेशन की ओर बढ़ रहे थे। रास्ते भर हेनरी खुशी से उछल-कूद करता चल रहा था। वह बीच-बीच में ज़ोर से बोल उठता, “हाँ, हाँ! आज मैं शहर जाऊँगा!” “मैं बहुत खुश हूँ!”

उसे देख उसके पिता भी हँसने लगे। उसकी मासूम खुशी उनके थके चेहरे पर भी मुस्कान ले आई।

फिलिप बोले, “बस करो अब... हम रेलवे स्टेशन पहुँचने वाले हैं।”

हेनरी की आँखें चमक उठीं, “क्या हम ट्रेन से जाएंगे? तब तो बहुत मज़ा आएगा!”

“मुझे ट्रेन बहुत पसंद है!” हेनरी खुशी से चहकते हुए बोला। “ठीक है-ठीक है हेनरी, अब शांत हो जाओ,” उसके पिता मुस्कुराकर बोले।

वे दोनों रेलवे स्टेशन पहुँचते हैं। फिलिप टिकट काउंटर से दो टिकटें लेते हैं और ट्रेन के आने का इंतज़ार करने लगते हैं। वे एक बेंच पर आकर बैठ जाते हैं।

कुछ देर बाद वहाँ दो लोग आते हैं और पास की ही बेंच पर बैठकर आपस में बातें करने लगते हैं। “तुम्हें मालूम है, शहर में सर्कस लगा है?” दूसरा व्यक्ति चौंककर कहता है, “क्या सच में? तब तो हम भी ज़रूर जाएँगे!”

यह सुनते ही हेनरी के मन में उत्सुकता जाग उठती है। वह तुरंत अपने पिता से पूछता है, “पिताजी, सर्कस क्या होता है?” हेनरी ने पहले कभी ‘सर्कस’ शब्द भी नहीं सुना था।

फिलिप ने मुस्कुराते हुए समझाया, “सर्कस... वो एक मेले जैसा होता है, बेटा। वहाँ लोग रंग-बिरंगे कपड़े पहनकर तरह-तरह के खेल दिखाते हैं—जैसे जादू, जानवरों के करतब, रस्सी पर चलना वगैरह।”

हेनरी की आँखें उत्साह से चमक उठती हैं। “तो क्या हम भी वहाँ जाएँगे?” उसने मासूमियत से पूछा।

‌फिलिप की मुस्कान हल्की सी फीकी हो गई। “नहीं, बेटा... वहाँ की टिकट बहुत महँगी होती है।”

यह सुनकर हेनरी सहम जाता है। उसका उत्साह एकदम से थम जाता है। वह चुपचाप उन दो लोगों के खुश चेहरे देखने लगता है, जो अब भी सर्कस की बातें कर रहे थे।

तभी फिलिप ने धीरे से कहा, “चलो, ट्रेन आ गई।”

ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आकर रुकती है। हेनरी और उसके पिता अपने डिब्बे में चढ़ते हैं और जहाँ जगह खाली मिलती है, वहाँ बैठ जाते हैं।

संयोग से वही दो लोग भी उसी डिब्बे में आकर पास की सीट पर बैठ जाते हैं।

थोड़ी देर बाद, ट्रेन जैसे ही चलती है, वे दोनों फिर सर्कस की बातें शुरू कर देते हैं। “अरे, तुम्हें मालूम है, सर्कस में एक जोकर है — एक लंबा और एक छोटा! दोनों कितने मज़ेदार होते हैं!” “और वो जादूगर! कितने जादू के खेल दिखाता है...” “सुनो, सर्कस में जानवर भी होते हैं, शेर, हाथी... कितना मज़ा आएगा!”

ये सारी बातें सुनकर हेनरी का मन जैसे उड़ने लगता है। उसकी आँखों में सपनों की चमक तैरने लगती है। वह मन ही मन कुछ सोचने लगता है — एक ऐसी दुनिया जो उसने कभी देखी नहीं, पर अब बहुत करीब लग रही थी।

फिलिप यह सब देख रहा था। उसने धीरे से हेनरी से कहा, “हेनरी, तुम इधर ध्यान दो। तुम्हें शहर में घूमने में बहुत मज़ा आएगा।”

हेनरी ने हल्की सी मुस्कान दी और फिर उन लोगों की ओर एक नज़र डाली।

फिलिप जानता था कि हेनरी के मन में क्या चल रहा है। वह समझ रहा था कि उसका बेटा सर्कस देखने के लिए कितना व्याकुल हो रहा है। लेकिन वह अपनी आर्थिक स्थिति के चलते उसे सर्कस नहीं दिखा सकता था।

हेनरी अब चुपचाप हो गया था। वह ट्रेन की खिड़की से बाहर झाँकने लगा, जहाँ पेड़, खेत और रास्ते पीछे छूटते जा रहे थे... और साथ ही हेनरी का मासूम सपना भी थोड़ी देर के लिए खामोश हो गया था। और तभी स्टेशन आ जाता है। “चलो, अब स्टेशन आने वाला है। मुझे इसी स्टेशन पर उतरना है। हमें भी वहीं उतरना है,” फिलिप ने कहा।

“अच्छा, मुझे आपसे मिलकर बहुत अच्छा लगा। फिर मिलेंगे, फिलिप,” जॉन रोड्रिग्स ने कहा।

“ठीक है, जॉन। अलविदा,” फिलिप ने जवाब दिया।

हेनरी भी बोला, “गुड बाय अंकल!”

दोनों स्टेशन पर उतरते हैं, एक-दूसरे को मुस्कुराते हुए विदा करते हैं और फिर अपने-अपने रास्ते चल देते हैं। हेनरी जाते-जाते बार-बार पीछे मुड़कर देखता रहता है।

“अब चलो, हेनरी। हम देर हो जाएंगे,” फिलिप कहता है। “हम्म,” हेनरी जवाब देता है।

फिलिप और हेनरी आगे बढ़ते हुए स्टेशन से बाहर निकलते हैं और सीधे मार्केट की ओर चल पड़ते हैं।

रास्ते में हेनरी शहर की चकाचौंध, तेज़-तेज़ चलने वाले लोग, भीड़-भाड़ और बहुत सारी कारें देखकर रोमांचित हो जाता है। ‌

कहाँ उसकी गाँव की शांति और सुकून भरी जिंदगी, और कहाँ ये शहर की भीड़-भाड़! ये सब देखकर हेनरी मन ही मन सोचता रहा, “मैं भी बड़ा होकर इसी शहर में आऊँगा, यहीं रहूँगा। ऐसी बड़ी कार खरीदूंगा, और अपने माँ-बाप को भी उसी कार में घुमाऊंगा।”

फिलिप खेती-बाड़ी के बाजार में गया, जहाँ खेतों की दवाइयाँ और सब्ज़ियाँ खरीदने वाले बड़े व्यापारी आते थे। वह हेनरी से बोला, “तुम मेरे साथ रहना, कहीं अकेले मत जाना।” “ठीक है, पिताजी,” हेनरी ने मान लिया।

फिलिप उस व्यापारी की दुकान पर पहुंचा। वहाँ वह व्यापारी से मिला और अपनी सब्ज़ियों और काम की बातें करने लगा। व्यापारी ने हेनरी को देखकर पूछा, “क्या ये तुम्हारा बच्चा है?” “हाँ, ये मेरा बेटा हेनरी है,” फिलिप ने जवाब दिया।

व्यापारी एक बहुत अच्छा इंसान था। उसने फिलिप और हेनरी के लिए चाय और कुछ नाश्ता मंगवाया, साथ ही हेनरी के लिए खाने का एक पैक किया। हेनरी ने देखकर खुशी से कहा, “थैंक यू।”

कुछ देर बाद फिलिप का काम खत्म हो गया। “चलो हेनरी, अब हमें चलना होगा,” उसने कहा।

दोनों दुकान से बाहर निकले और चलने लगे। हेनरी ने पूछा, “पिताजी, आपने कहा था कि आप मुझे शहर में घुमाएंगे?”

फिलिप ने मुस्कुराते हुए कहा, “ठीक है, तुम्हें भूख लगी होगी। चलो, कुछ खाकर चलते हैं।”

हेनरी और फिलिप एक छोटे, सस्ते रेस्टोरेंट में जाकर बैठे। उन्होंने खाना ऑर्डर किया और खाने लगे।

तभी कुछ देर बाद, वही लोग जो ट्रेन में मिले थे...

जॉन रोड्रिग्स वहा उस रेस्टोरेंट में लंच के लिए आया। उसे देखकर हेनरी ने अपने पिता से कहा, “देखो पिताजी, ये वही है ट्रेन वाला।”

यह सुनकर फिलिप भी उसकी ओर देखने लगा। जॉन की नज़रें फिलिप और हेनरी पर पड़ीं। वह मुस्कुराता हुआ उनके पास आया और पूछा, “क्या मैं तुम्हारे साथ बैठ सकता हूँ?”

“हाँ, क्यों नहीं?” फिलिप ने कहा, “हमें अच्छा लगेगा।”

तीनों एक साथ उस टेबल पर बैठ गए और बातचीत करने लगे।

दोनों एक-दूसरे के बारे में पूछते हैं। फिलिप अपने बारे में बताता है कि वह गाँव में खेती-बाड़ी करता है। हेनरी स्कूल नहीं जाता था, बस दसवीं तक पढ़ा है।

उनकी बातें सुनकर जॉन को पता चल जाता है कि फिलिप की आर्थिक हालत ठीक नहीं है।

फिलिप ने पूछा, “वैसे आप क्या करते हो?”

जॉन ने कहा, “कुछ खास नहीं, मेरा खुद का सर्कस है।”

यह सुनकर हेनरी बहुत खुश हो जाता है और जोर-जोर से हँसते हुए अपने पिता से कहता है, “पिताजी, देखो! इनका खुद का सर्कस है!”

“हाँ हेनरी, शान्त हो जाओ,” फिलिप ने हेनरी को समझाया।

जॉन ने हेनरी से पूछा, “तुम्हें सर्कस पसंद है?”

“हाँ, मुझे सर्कस देखना है। मैंने कभी नहीं देखा।” हेनरी ने जवाब दिया।

कैसा होता है सर्कस? फिलिप ने कहा, “बेटा, ऐसा मत पूछो। अच्छा नहीं लगता।”

फिर उसने जॉन से कहा, “माफ़ करना, जॉन, ये कभी सर्कस नहीं देखा। उसने थोड़े दिन पहले ही गाँव में पहली बार सर्कस के बारे में सुना था। तब से उसकी जिद लग गई है कि उसे भी सर्कस देखना है।”

जॉन ने कहा, “कोई बात नहीं।”

फिर उसने बताया, “इस शहर में हमारा सर्कस का शो होने वाला है। मैं शहर-शहर घूम कर शो करता हूँ।”

“हाँ, बहुत अच्छा,” फिलिप ने कहा।

जॉन ने हेनरी से पूछा, “क्या तुम्हें सर्कस देखना है?”

हेनरी ने अपने पिता की ओर देखते हुए कहा, “नहीं, फिर कभी।”

यह सुनकर जॉन ने अपनी भौंहें चढ़ाकर कहा, “क्यों नहीं? तुम तो सर्कस देखने के लिए उत्साहित थे? अब क्या हुआ?”

यह सुनकर फिलिप ने कहा, “वैसे माफ़ करना, मुझे नहीं कहना चाहिए था, पर मैं सर्कस की टिकट अफोर्ड नहीं कर सकता। इसलिए मैं इसे नहीं ले जा सकता।”

बिना कुछ सोचे जॉन ने कहा, “तो तुम्हें किसने कहा कि तुम्हें टिकट के पैसे देने हैं? तुम्हें तो सिर्फ वहाँ जाकर सर्कस देखना है। मैं तुम्हें मेरे सर्कस में फ्री एंट्री दूंगा। आज शाम 5:30 बजे हमारा शो शुरू होने वाला है। चलो मेरे साथ, मैं तुम्हें ले चलता हूँ।”

पर फिलिप हड़बड़ी और संकोच से बोला...

नहीं, फिर कभी।

जॉन ने कहा, “मुझे कुछ नहीं सुनना। हेनरी को देखो, वो बहुत खुश हो जाएगा। ज्यादा मत सोचो, फिलिप। चलो, खाना खाएं। मैं तुम्हें ले चलता हूँ।”

फिलिप ने कहा, “पर हमें तो शाम तक घर पहुंचना है।”

“कोई बात नहीं, मैं अपने ड्राइवर को बोल दूंगा, वो तुम्हें घर तक छोड़ने आ जाएगा।”

फिलिप ये सुनकर बोला, “इसकी कोई जरूरत नहीं।”

जॉन ने तुरंत कहा, “मुझे कुछ नहीं सुनना! क्या तुम मुझे पसंद नहीं करते?”

यह सुन फिलिप बोला, “नहीं, जॉन, ऐसा नहीं है।”

जॉन ने बहुत जोर दिया और फिलिप मना नहीं कर पाया।

यह सुनकर हेनरी जोर से अपने हाथ उठाकर चिल्लाया, “आज मैं सर्कस देखूंगा!”

‌यह सुन सब हँसने लगे। खाना खत्म करके जॉन तीनों का बिल भर देता है। फिलिप ने कहा, “धन्यवाद, जॉन। माफ़ करना, मुझे अच्छा नहीं लगता।” जॉन ने मुस्कुराते हुए कहा, “कोई बात नहीं, फिलिप। तुम ज्यादा मत सोचो।”

जॉन एक अच्छा इंसान था। वह गरीब लोगों की हमेशा मदद करता था। उसे दूसरों में अच्छाई और हुनर पहचानने की ताकत थी।

वह अपनी कार में हेनरी और फिलिप को बिठाता है। उनका ड्राइवर गाड़ी चला रहा होता है। हेनरी पहली बार कार में बैठा था। उसके लिए सभी चीज़ों का अनुभव रोमांच से भरा हुआ था। उसे ऐसा लग रहा था जैसे मानो उसने दुनिया जीत ली हो। उसके सपने सच हो रहे थे। वह कार में बैठकर खिड़की के बाहर शहर को बड़ी ध्यान से देख रहा था।

जॉन ने फिलिप से पूछा, “तुम गांव में खेती क्यों करते हो? तुम शहर आकर काम करो। तुम पैसे भी अच्छे कमा सकते हो।”

फिलिप ने कहा, “नहीं, गांव में मेरा खेत है, मेरा घर है। गांव में ही मुश्किल से खर्च उठा पाता हूँ। शहर में तो और भी मुश्किल हो जाएगा। नहीं, ऐसा नहीं है, मैं तुम्हें काम दिलवा सकता हूँ।”

“नहीं जॉन, थैंक यू। मुझे अब गांव में ही रहना पसंद है।”

जॉन की पत्नी बहुत ही अच्छी और दयालु थी। उनकी कोई संतान नहीं थी। जॉन हेनरी को देखकर बहुत खुश होता था।

वो फिलिप से कहता है, “ये मेरा कार्ड रख लो। जब तुम्हें लगे कि तुम्हें शहर आकर काम करना है, तो मुझसे मिलना।” “ठीक है, जॉन।”

जॉन का सर्कस अब वहीं था, विशाल मैदान में बड़े-बड़े लाल और पीले तंबू लगे थे।

ये देखकर हेनरी बहुत उत्सुकता से फिलिप से पूछता है, “देखो पिताजी, वो सब क्या हैं? यही तो सर्कस है बेटा?” फिलिप मुस्कुराकर कहता है, “हेनरी, क्या हम पहुँच गए?” “हाँ, बेटा, हम पहुँच गए।”

हेनरी खुशी से चिल्लाता है, “हुर्रे, मैं सर्कस देखूंगा!” फिलिप धीरे से कहता है, “चुप रहो हेनरी, शांत रहो।”

जॉन कहता है, “फिलिप, अब जाने दो। बच्चा है, वो बहुत उत्साहित है। उस उम्र में बच्चे ऐसे ही होते हैं।”

फिर अचानक गाड़ी सर्कस के पास रुकती है। हेनरी जल्दी से कार से उतरकर सर्कस के गेट को देखता है और कहता है, “वाह पिताजी, ये तो बहुत ही सुंदर है।”

वो बाहर ही खड़ा होता है। फिलिप और जॉन पूछते हैं, “अब क्या अंदर नहीं आओगे? हँसते हुए दोनों कहते हैं, “आओ, आ जाओ।”

हेनरी उनके साथ चलता है। सर्कस की तैयारियां जोर-शोर से चल रही होती हैं। कहीं जोकर, कहीं रिंग मास्टर, कहीं पिंजरे में बाघ, शेर, बंदर, चिंपांजी को देखकर वह बहुत खुश हो जाता है। उसके लिए यह सब एक खूबसूरत सपने जैसा था।

वो कुछ नहीं बोल रहा था, बस सर्कस और उसकी सारी चीज़ों को बड़ी सावधानी से देख रहा था। जॉन उसे देखकर हँसता है, पास आकर कहता है, “चलो अंदर, तुम्हें और भी बहुत सारे लोग देखने को मिलेंगे।” हेनरी हँसकर जवाब देता है, हेनरी उत्साहित होकर बोला, “अभी से तो मुझे सब कुछ याद रहने लगा है, अंकल जॉन!”

और फिर धीरे-धीरे सर्कस का शो शुरू होने वाला था…

‌उसके लिए जीवन के सभी अनुभव रोमांच से भरे हुए थे। उसे ऐसा लग रहा था जैसे मानो उसने पूरी दुनिया जीत ली हो। उसके सपने जैसे सच हो रहे थे।

वह कार में बैठा खिड़की के बाहर शहर को बड़े ध्यान से देख रहा था। उसकी आँखों में आश्चर्य और उत्सुकता की चमक थी।

जॉन ने फिलिप से पूछा, “तुम गाँव में खेती क्यों करते हो? तुम शहर आकर काम करो। तुम अच्छे पैसे कमा सकते हो।”

फिलिप ने शांत स्वर में कहा, “नहीं, गाँव में मेरा खेत है, मेरा घर है। गाँव में ही मुश्किल से खर्च चला पाता हूँ, शहर में तो और भी मुश्किल हो जाएगा।”

जॉन ने आग्रह किया, “नहीं, ऐसा नहीं है। मैं तुम्हें काम दिलवा सकता हूँ।”

फिलिप ने विनम्रता से मुस्कराते हुए कहा, “नहीं जॉन, धन्यवाद। मुझे अब गाँव में ही रहना पसंद है।”

जॉन की पत्नी बहुत ही अच्छी और दयालु महिला थीं। उनका कोई संतान नहीं था। जॉन, हेनरी को देखकर बहुत खुश होता था। हेनरी की मासूमियत, उसकी आँखों की चमक और सच्चे सपनों को देखकर उसके मन में एक अजीब-सी आत्मीयता जाग जाती थी।

जॉन फिलिप से कहता है, “ये मेरा कार्ड रख लो। जब तुम्हें लगे कि तुम्हें शहर आकर काम करना है, तो तुम मुझसे मिलना।”

“ठीक है, जॉन,” फिलिप ने विनम्रता से उत्तर दिया।

जॉन का सर्कस अब बस आने ही वाला था। शहर के मैदान में बड़े-बड़े लाल और पीले रंग के तंबू तने हुए थे। वो दूर से ही अपनी रंग-बिरंगी चमक बिखेर रहे थे।

यह देख हेनरी बेहद उत्सुकता से फिलिप से पूछता है, “देखो पिताजी! वो सब क्या है?”

फिलिप मुस्कराकर कहता है, “यही तो सर्कस है, बेटा।”

“हेनरी, क्या हम पहुँच गए?” हेनरी ने उत्सुकता से पूछा।

“हाँ-हाँ बेटा, हम पहुँच गए,” फिलिप ने मुस्कुराकर कहा।

“हुर्रे! मैं सर्कस देखूंगा!” हेनरी खुशी से चिल्लाया।

“चुप रहो हेनरी, शांत रहो,” फिलिप ने उसे थोड़ा डांटते हुए कहा।

जॉन पास खड़े होकर फिलिप से बोला, “अरे जाने भी दो, बच्चा है। बहुत उत्साहित है। उस उम्र में बच्चे ऐसे ही तो करते हैं।”

उसी पल गाड़ी सर्कस के पास आकर रुकती है। हेनरी फौरन कार से उतरकर सर्कस के भव्य गेट की ओर देखता है और विस्मय से कहता है, “वाह पिताजी! यह तो बहुत ही सुंदर है!”

वह गेट के सामने खड़ा रह जाता है, जैसे कोई सपना साकार होते देख रहा हो।

फिलिप और जॉन मुस्कराते हुए पीछे से पूछते हैं, “अब क्या अंदर नहीं आओगे?”

हँसते हुए दोनों फिर कहते हैं, “आओ, आ जाओ।”

हेनरी उनके साथ चलने लगता है। सर्कस की तैयारियाँ पूरे जोरों पर थीं। कहीं जोकर रंग-बिरंगे कपड़ों में इधर-उधर भाग रहे थे, कहीं रिंग मास्टर अपनी लाठी घुमा रहा था, तो कहीं बड़े-बड़े पिंजरों में बाघ, शेर, बंदर और चिंपांज़ी गुर्राहट कर रहे थे।

हेनरी की आँखों में चमक थी। उसके लिए ये सब किसी खूबसूरत सपने जैसा था—एक ऐसा सपना, जिसे उसने पहली बार अपनी खुली आँखों से देखा।

वो कुछ भी नहीं बोल रहा था। बस हर चीज़ को बेहद ध्यान से देख रहा था, जैसे हर दृश्य को अपने दिल में उतार लेना चाहता हो।

जॉन ने उसे देखकर हल्के से मुस्कराया और उसके पास आकर कहा, “चलो अंदर, तुम्हें और भी बहुत सारे लोग देखने को मिलेंगे।”

हेनरी बिना कुछ बोले मुस्कराया और बस सिर हिलाकर जॉन के साथ चल दिया।

हेनरी अंदर जाकर जब सर्कस के टेंट में पहुँचता है, तो देखता है कि वहाँ लोग शो की तैयारियों में जुटे हुए हैं। कोई मंच की सजावट कर रहा है, कोई जानवरों की देखभाल में लगा है, तो कोई अपने अभिनय की रिहर्सल कर रहा है।

सब कुछ कितना अद्भुत था! हेनरी शांति से बस सबको देख रहा था—उसकी आँखों में उत्सुकता थी, चेहरे पर हैरानी, और मन में रोमांच।

जॉन ने मुस्कराते हुए कहा, “तुम दोनों मेरे साथ आओ, मैं तुम्हें पूरा सर्कस दिखाता हूँ।”

यह सुनकर फिलिप और हेनरी उसके साथ चल पड़ते हैं।

जॉन उन्हें पूरे सर्कस का कोना-कोना दिखाता है—जानवरों के पिंजरे, कलाकारों के रहने की जगह, स्टेज के पीछे की दुनिया और वह रंगीन मंच जहाँ रात को तमाशा होगा।

फिर जॉन हेनरी से पूछता है, “कैसा लगा तुम्हें मेरा सर्कस?”

हेनरी की आँखों में चमक थी। उसने मुस्कराकर जवाब दिया, “बहुत ही सुंदर। मुझे बहुत अच्छा लगा। थैंक यू।”

जॉन हेनरी के बालों में स्नेह से हाथ फेरते हुए मुस्कराता है और फिर दोनों को बैठने के लिए कहता है। वह फ़िलिप के लिए कॉफ़ी और हेनरी के लिए चॉकलेट मिल्क मंगवाता है, साथ ही कुछ खाने के लिए भी आदेश देता है।

उसी समय, जब शो शुरू होने में अभी कुछ देर होती है, जॉन की पत्नी जूलिया भी वहाँ आ जाती है।