छोटा बचपन

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Summary

Story of a childhood

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1
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n/a
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13+

छोटा बचपन


यह एक सुंदर और सजीव बचपन की कहानी का आरंभ है। आइए, इसे एक भावनात्मक, शांति से भरा उपन्यास का रूप दें। नीचे इसकी शुरुआत प्रस्तुत है—पहला अध्याय:

उपन्यास का नाम: छोटा बचपन

लेखक: हृदयांश महर्षि

अध्याय 1: मोहल्ले की मिट्टी और मेरी दुनिया

मेरा नाम हृदयांश है। उम्र कोई सात-आठ साल की रही होगी, लेकिन दिल में एक पूरी दुनिया बसाए घूमता हूँ। मेरा घर सादुलपुर कस्बे के एक छोटे से मोहल्ले में है—वहीं, जहाँ हर गली एक किस्सा सुनाती है, हर कोना कोई बचपन की हँसी समेटे बैठा है। हमारा घर छोटा है, लेकिन उसमें प्यार की कोई कमी नहीं।

मुझे घरवाले 'छोटू' कहकर बुलाते हैं। मुझे सिर्फ खेलना ही पसन्द हैं, मोहल्ले में अलग-अलग दोस्त हैं और सबका मेरे लिए अपना एक नाम है। सब कुछ इतना सहज, इतना अपना लगता है कि जैसे ज़िंदगी ने मुस्कुराकर कहा हो—"चलो, खेलते हैं!"

अध्याय 2: मेरी दुनिया के लोग

मेरी सबसे अच्छी दोस्त का नाम अनुष्का है। वो मेरे घर से बाईं तरफ़, बस दो मिनट की दूरी पर रहती है। उसके साथ मेरी दोस्ती इतनी पुरानी है कि मुझे याद भी नहीं कि हम कब दोस्त बने। शायद तब, जब हमने बोलना भी ठीक से शुरू नहीं किया था।

अनुष्का हमारे खेलों की लीडर है। कौन सा खेल खेलना है, कौन पहले भागेगा, कौन "डेन" होगा—इन सबका फ़ैसला वो ही करती है। और हम सब उसकी बात मानते भी हैं, क्योंकि वो हर बात को बड़ी सच्चाई और उत्साह से कहती है।

हाँ, कई बार वो मुझसे नाराज़ भी हो जाती है—कभी किसी बात पर चिढ़ जाती है, तो कभी गुस्से में मुँह फेर लेती है। लेकिन जितनी जल्दी गुस्सा करती है, उतनी ही जल्दी पिघल भी जाती है। छोटी-छोटी बातों पर परेशान हो जाना उसकी आदत है, और हम सबकी उस पर फ़िक्र भी। वो भावुक है... सच्ची और प्यारी।

मेरी दूसरी दोस्त हैं साक्षी दीदी,उनका घर मेरे घर से बिल्कुल चिपका हुआ एक छोटी सी दीवार के साथ,मेरे घर और उनके घर का दरवाजा एक ही दिशा की ओर खुलता था, दरअसल साक्षी हम लोगो से एक साल बड़ी थी इसलिए हम उन्हें दीदी कहते थे,और वो हमें कुछ भी कह सकती थी, मेरा समूह वैसे तो काफी छोटा है, लेकिन पर्याप्त हैं, मुझे एक समय तक तो लगता था कि सब के दोस्त अनुष्का साक्षी काजू ही हैं,मुझे याद हैं एक बाद नानी के घर गया था तो मासी के बच्चों से मैने पूछा कि तुम्हारे साक्षी अनु और काजू कौन हैं,सब हँसने लगे,उस दिन पता चला कि दोस्त नाम के लोग भी होते हैं सब दोस्तो के नाम मेरे दोस्तो जैसे नही होते है, उस दिन मैं अपनी मूर्खता पर खूब हँसा, और मैने कुछ नया सीखा इस बात का काफी घमण्ड भी था हाहाहाहा.

अध्याय 3: गली के सूरमा

हमारे खेलों की टोली बड़ी है। उनमें से एक है गोपाल—अनुष्का का छोटा भाई। वो इतना बदमाश है कि सबका ध्यान उसी पर रहता है, लेकिन दिल से बहुत अच्छा है। फिर है काजू—मेरा "जामून दोस्त"। वो नाम क्यों पड़ा, ये एक दिन की मज़ेदार कहानी है जो मैं आगे ज़रूर बताऊँगा।

फिर आती हैं ‘साक्षी दीदी’—वैसे उनका असली नाम सिद्धि है, लेकिन सब उन्हें साक्षी दीदी कहते हैं। वो उम्र में हम सबसे बड़ी हैं, मगर अनु की चलती उनसे भी ज़्यादा है—ये बात गली में मशहूर है।

दरअसल हम सब हमउम्र ही थे इसलिए हमारी सबकी काफी बनती भी थी।

अध्याय 4: खेलों की दुनिया

हमारे खेलों की कोई सीमा नहीं। पकड़म पकड़ाई, खो-खो, च्वेंगम ,लो-लकड़,बर्फ पानी ,पेग दुक और भी काफी सारे—क्या नहीं खेलते हम! हर शाम हमारे मोहल्ले की गलियाँ हमारे कदमों की थाप से गूंजती हैं, और हमारा शोर मोहल्ले में जान भर देता है।

रोज़ शाम स्कूल से लौटकर खाना खाते ही हम निकल पड़ते हैं खेलने। दिनभर की थकान जैसे खेल के दौरान मिट जाती है। हम कभी नही थकते थे,जितना खेलते उतना ही और खेलने का मन करता और थक जाने में हम एक डेढ़ लीटर पानी तो ऐसे ही पी जाते थे, और एक बात हैं, थकने के बाद पीने वाले पानी का स्वाद पता नही क्यू अमृत जैसा लगता था अलग ही स्वाद था,हम जब भी मेरे या किसी और के घर पानी पीने जाते थे, तो सबकी मम्मियां बोलती थी कि बाहर से आते ही पानी नही पीते लेकिन हमें ये बात हमेशा अगले दिन गाला खराब होने के बाद समझ आती थी, जब हम छोटे थे उसी दौरान हमारे घर के सामने नई सड़क बनी थी बहुत सुंदर सी सड़क हमनें उस सड़क पर कई दिनों तक खेले लेकिन वो डामर की थी तो रोज किसी न किसी के घुटने छिल जाते थे.

साक्षी दीदी को रोज घर से उठा के लाना पड़ता था क्योंकि वो स्कूल से आते ही सो जाते थे रोज, लेकिन उनके बिना शाम भी पूरी कहा थी डॉन थी वो भी काफी मानते थे हम लोग उनको ऐसे ही थोड़ी.....

अध्याय 5: टीवी शो और हमारी महफ़िल

हाल ही में टीवी पर एक नया शो आया है—"जहाँ मैं घर-घर खेली"। ज़ी टीवी पर आने वाला ये शो अनुष्का को इतना पसंद आया है कि अब वो हर बात में उसका ज़िक्र करती है। "देखो, उस शो में ऐसा हुआ था…"—ये उसकी नई आदत बन गई है, और हम सब उसे चिढ़ाते भी हैं।

रविवार का दिन हमारा 'होमवर्क डे' होता है। सुबह सब एक जगह इकट्ठे होते हैं, मगर मैं हमेशा देर से आता हूँ—नींद का मारा जो हूँ। तब तक धूप फैल चुकी होती है, और हम सब धूप में बैठकर कॉपियाँ फैलाकर पढ़ते हैं... या यूँ कहो, पढ़ाई की आड़ में गप्पें मारते हैं।

अध्याय 6: रविवार की धूप और होमवर्क का जुगाड़

रविवार की सुबह का एक अलग ही स्वाद होता था हमारे मोहल्ले में। न स्कूल की चिंता, न यूनिफॉर्म की सलीके से प्रेस की झंझट, और न ही सुबह-सुबह बस पकड़ने की भागदौड़। लेकिन फिर भी, हमारे लिए रविवार पूरी तरह खेलने का दिन नहीं होता था।

क्योंकि… रविवार का मतलब होता था – होमवर्क का दिन!

माँ हर शनिवार रात को ही चेता देती थीं, “कल सुबह उठते ही होमवर्क कर लेना छोटू! बाद में मत बोलना कि खेलने नहीं दिया।”

मैं हर बार "हाँ माँ" कहकर सो जाता, लेकिन अलार्म की घंटी के बजाय बाहर से आती चिड़ियों की आवाज़ और चाय की महक ही मेरी नींद तोड़ती। उठने का मन तो बिल्कुल नहीं करता था, लेकिन अनु की धमकी याद आते ही उठना पड़ता था।

हाँ, धमकी— “जो टाइम पे नहीं आया, उसका होमवर्क हम नहीं बताएँगे।”

अब ये बात अलग है कि हम सबका होमवर्क एक-दूसरे से देखकर ही पूरा होता था।

उस दिन भी, सूरज अभी आसमान में पूरी तरह चढ़ा भी नहीं था, कि अनु का पैगाम आ गया – “जल्दी आओ, सब लोग जमा हो रहे हैं!”

मैं मुँह धोकर, बाल बेतरतीब और कंघी का नामोनिशान नहीं, कॉपी और पेंसिल लेकर घर की सबसे पहली सीढ़ी वाले चबूतरे की ओर भागा।

वहाँ पहुँचते ही देखा – अनु,साक्षी दीदी काजू पहले से बैठे थे। अनु की गोद में एक बड़ी सी कॉपी थी, जिस पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था – इंग्लिश grammer

अध्याय 7: छोटी ओवी और बड़ी ज़िम्मेदारी

अनुष्का की एक छोटी सी बहन है—ओवी। वो अभी बहुत नन्हीं है, लेकिन हर शाम उसे भी हमारे साथ भेजा जाता है। अनुष्का, खेलों में इतनी मग्न होती है कि ओवी को साइड में बैठा देती है। तब हमें, बड़े बनकर, ओवी का ध्यान रखना पड़ता है। अब तो उसकी आदत सी हो गई है हम सबको। ओवी भी अब हमारी छोटी टोली की सबसे खास सदस्य है।




अध्याय 8-अनु का आदेश – “आज खो-खो खेलेंगे”

सर्दियों की शामें मोहल्ले में कुछ खास होती थीं। सूरज थोड़ी जल्दी लौट जाता, लेकिन हम बच्चे तब भी उतनी ही देर तक खेलते। उस दिन भी वैसा ही एक शाम था—थोड़ी सी ठंड, धूप की बची-खुची नरम गरमाहट, और माँ की आवाज़ जो पीछे से पुकारती थी – “जल्दी आ जाना छोटू, ठंड लग जाएगी!”

लेकिन मेरे पैर तो मोहल्ले की ओर खिंच गए थे।

मैं जैसे ही गली में पहुँचा, देखा हमारी टीम के सारे सदस्य इकट्ठा हो चुके थे। अनुष्का पहले से खड़ी थी, कमर पर हाथ रखे, गंभीर मुद्रा में, जैसे कोई कप्तान हो जो अभी मैच की घोषणा करने वाला हो।

“आज खो-खो खेलेंगे!” अनु ने घोषणा की।

मैंने थोड़ा सा मुँह बनाया, “पर कल भी तो खो-खो ही खेला था...”

वो आँखें तरेरकर बोली, “आज भी वही खेलेंगे। मेरा मन है!”

बस फिर क्या था, बहस की कोई जगह नहीं। जब अनु कुछ कह देती, तो वो पत्थर की लकीर होती थी।

गोपाल उछलते हुए बोला, “मैं तो टीम अनु में ही रहूँगा! उनकी टीम हर बार जीतती है।”

काजू ने फौरन टोका, “हर बार नहीं, पिछली बार हम जीते थे।”

मैं हँस दिया। ये रोज़ की बात थी। हर खेल में कुछ न कुछ बहाना, कुछ न कुछ मज़ा,कुछ न कुछ लफड़ा

टीमें बननी शुरू हुईं। अनु हमेशा खुद को पहले चुनती थी। फिर गोपाल, फिर मैं, फिर काजू, और आख़िर में...ओवी- वो तो हर बार जबरदस्ती ही बीच आ जाती थी अनु के साथ,उसके गुस्से का कारण बन ने के लिए..

“ओवी इधर बैठो, देखो गिर मत जाना,” अनु ने उसे एक किनारे बिठा दिया।

खेल शुरू हुआ। खो-खो की दौड़, भाग, टच करना, चीखना—सारी गली में जैसे बच्चों की खुशियाँ बिखर गई थीं।

मैं भागते-भागते एक बार फिसल गया। गोपाल हँसने लगा।

“अरे हॄदय गिरा!”(मेरा वास्तविक नाम हृदयांश था वैसे किसी भी नाम से बुला लो मुझे बुरा नही लगता...

“चुप कर गोपाल! चोट लग जाती तो?” अनु ने डाँट दिया।

गोपाल चुप हो गया, लेकिन उसके चेहरे पर हँसी थी।

खेल खत्म हुआ, और अनु की टीम जीत गई—जैसे हमेशा होता था।

सब थक चुके थे, लेकिन मन अब भी नहीं भरा था।

मैं दीवार से टेक लगाकर बैठा ही था कि अनु पास आई।

“थक गए?” उसने पूछा।

मैंने मुस्कुराकर कहा, “तू जीत गई, मैं कैसे नहीं थकूँगा!”

वो भी मुस्कुरा दी। शाम ढल रही थी, गली की रोशनी धीमी हो रही थी, और माँ की आवाज़ फिर से कानों में गूँजी—“छोटू, अब बहुत हो गया, आ भी जा!”

मैंने अनु को देखा, गोपाल ओवी के साथ खेल रहा था, काजू दीवार पर बैठा कुछ गुनगुना रहा था। आप लोग सोच रहे होंगे कि इस प्रसंग में साक्षी दीदी कहा गयी,हाहा वो तो आज अंपायर बनी थी हमारे फैसलो की....

वो शाम... बस एक और खेल की कहानी थी, लेकिन मेरे लिए—एक याद बन गई।


अंतिम पंक्तियाँ (अभी के लिए)

हमारे मोहल्ले की ये शामें, ये हँसी, ये लड़ाइयाँ और मेल-मिलाप... सब मिलकर मेरी दुनिया बनाते हैं। हम सबके बीच जो निश्छलता है, वो शायद बड़े होकर फिर कभी महसूस न हो। इसलिए मैं इन लम्हों को सहेज रहा हूँ—इस उपन्यास के रूप में, ताकि जब कभी ज़िंदगी थकाए, मैं इन गलियों की ओर लौट सकूँ... अपनी मुस्कुराहट लेने।

आज के लिये मैं इस कहानी को खत्म करना चाहूंगा,वैसे बचपन की कहानियां खत्म होगी तो नहीं कभी भी लेकिन मैं काफी समय से सोच रहा था एक बचपन की अपनी अधूरी कहानी को पूरा लिखने के लिए, मैं हमेशा से ही अंतर्मुखी रहा हूं अभी भी...लेकिन कुछ दोस्तों के साथ चपड़ चपड़ करना मुझे हमेशा से पसन्द हैं, अब समय के नियमो के अनुसार कभी इतना मिलना तो नही होता लेकिन सुकून हैं कि जो मेरे सबसे प्रथम मित्रगण थे, वो आज भी साथ हैं, अलग नहीं हुए....होंगे भी नही कभी।

इसी के साथ मैं हृदयांश महर्षि आज के लिए तो अपने कीबोर्ड रूपी कलम को अपने बाल्यवस्था के रास्ते मे भागने से विराम देता हूँ, और शुक्रिया कहता हूँ कि ये कहानी या उपन्यास लिखने में तुमने मेरी मदद की.... और मेरे बचपन के दोस्तो का भी शुक्रिया की तुमने मुझे इतने साल झेला,आशा करता हूं कि पाठको को भी अच्छा लगेगा,वो भी कुछ पलों के लिए मुस्कुराएंगें❤️।

आपका प्रिय लेखक

-हृदयांश महर्षि "हृदय"

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