शीर्षक: एक अपूर्व अद्वैत

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शीर्षक: एक अपूर्व अद्वैत


शीर्षक: एक अपूर्व अद्वैत

लेखक: हृदयांश महर्षि "हृदय"


प्रस्तावना

प्रेम केवल सुख की अनुभूति नहीं, वह आत्मा की वह वेदना है जो मौन में भी बोलती है, और विरह में खिलती है। यह कहानी उस प्रेम की है, जो समाज की बेड़ियों में दम तोड़ता है,और उन हृदयों की है जो एक-दूसरे के बिना भी एक-दूसरे में ही जीते हैं। यह एक कवि की कहानी है, और उसकी प्रेयसी की, जिनका मिलन कभी संभव नहीं हो सका — पर उनका प्रेम, मृत्यु के पार भी अमर नही होने दिया गया,समाज के एक समझदार तबके की खोखली नियमावली ने....


अध्याय १: संयोग का प्रथम स्वर

काशी नगरी — गंगा के किनारे बसे उस शहर की हर गली में इतिहास की साँसें बसती थीं। उन्हीं गलियों में एक साधारण से दिखने वाला युवक प्रतिदिन मनोरम घाट की सीढ़ियों पर बैठकर कविता रचता था। उसका नाम था अद्वैत।

अद्वैत की आँखें गूढ़ थीं — मानो उनमें एक अनकही पीड़ा की नदी बह रही हो। वह अक्सर कहा करता:

“जब हृदय रोता है, तब कविता जन्म लेती है।”

उसी घाट पर एक दिन अपूर्वा आई — एक कुलीन ब्राह्मण परिवार की कन्या, जिसकी आँखों में विद्रोह था और मन में एक अनजानी बेचैनी। उसके आने से घाट की नीरवता में मधुर चिरपरिचित स्पर्श आ गया।

उनकी पहली मुलाकात मौन में हुई, पर उस मौन में एक संवाद था — आत्माओं का,अनुभूति थी एक शांत सरोवर और बहते हुए विचारो की



अध्याय २: धीरे-धीरे बुनता प्रेम

अद्वैत और अपूर्वा प्रतिदिन मिलते। नदी के किनारे बैठकर जीवन, साहित्य और आत्मा के संबंधों पर चर्चा करते। अद्वैत उसे अपनी कविताएँ सुनाता। एक दिन अपूर्वा ने पूछा:

“क्या तुम किसी के लिए यह सब लिखते हो?”

अद्वैत ने उत्तर नहीं दिया। वह बस मुस्कराया, और उसकी आँखों में वह उत्तर स्पष्ट था — “हाँ, तुम्हारे लिए।”

धीरे-धीरे, बिना एक भी प्रेम-स्वीकारोक्ति के, वे एक-दूसरे के लिए जीवन का पर्याय बन गए। लेकिन यह प्रेम कोई सामान्य प्रेम नहीं था — यह प्रेम आत्मिक था,शब्दों से परे था,शांत किन्तु अस्पष्ट मौसम की प्रतिकृति के समान था जिसे समझना और समझाना उतना ही मुश्किल था जितना मुश्किल वायु के वेग शून्य कर देना...


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अध्याय ३: समाज की दीवारें

काशी जैसे नगर में, एक ब्राह्मण कन्या का एक सामान्य कवि से मिलना – वह भी निरंतर – समाज के लिए असहनीय काशदायी और शर्म का प्रमुख कारण बन चुका था।

अपूर्वा के पिता, श्री वागीश जी मिश्रा, नगर के प्रतिष्ठित विद्वान थे। एक दिन उन्हें यह सूचना मिली कि उनकी पुत्री घाट पर किसी युवक के साथ बैठती है। क्रोध और लज्जा से वह काँप उठे,अपनी वर्षो से निर्मित विद्वता को जैसे उन्होंने समाज की भट्टी में झोंक दिया ,ऐसी भट्टी उन्हें जलाने के लिए ही सदैव लालायित रही थी ।

अपूर्वा को घर में बंद कर दिया गया। अद्वैत को कुछ असामाजिक तत्वों किन्तु समाज के रखवालो द्वारा प्रेमपूर्वक धमकाया गया प्रेम ना करने के लिए — “काशी छोड़ दो, नहीं तो तुम गंगा में बहा दिए जाओगे।”

इस मामूली सामाजिक प्रहार से अद्वैत टूटा नहीं, पर अपूर्वा की चुप्पी ने उसे तोड़ दिया।

कुछ समय के अनेक घटनाक्रमों के पश्चात

एक पत्र मिला अद्वैत को:

> “प्रिय अद्वैत,

इस समाज में जन्म लेकर मैंने वह अपराध किया है, जिसके लिए प्रेम को ही दंडित किया जाता है।

मैं जा रही हूँ — पर नहीं, तुम्हारे अहसास के एक बाये कोने में रह जाऊँगी....तुम रखोगे ना मुझे उस कोने में हमेशा अकेले...

अपूर्वा”





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अध्याय ४: तिरस्कृत कवि और विवाहिता स्त्री

अद्वैत ने काशी छोड़ दी। वह दिल्ली गया और वहाँ की साहित्यिक दुनिया में एक कवि के रूप में प्रसिद्ध होने लगा। उसका कवि-नाम था —अपूर्विक।

उसकी कविताओं में जो पीड़ा थी, वह पाठकों को रुला देती थी। एक अंश:

“उसका नाम अब नहीं लेता,

पर हर कविता उसी के आँसू से लिखी जाती है।”



उधर अपूर्वा का विवाह एक समृद्ध, कठोर विधिवेत्ता से कर दिया गया। वह विवाहिता होकर भी कभी पत्नी न बन सकी।

वह प्रतिदिन सुबह गंगा किनारे खड़ी होकर सोचती — “क्या मेरा प्रेम पाप था?”


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अध्याय ५: बारह वर्ष बाद — पुनः आमना-सामना

दिल्ली में एक कवि-सम्मेलन हुआ, जहाँ "अपूर्विक" का कविता-संग्रह "विरह-विलाप" विमोचित होने वाला था।

जब अद्वैत मंच पर पहुँचा, दर्शकों में एक चेहरा उसे घूर रहा था — अपूर्वा।

वह अब शांत दिखती थी, पर उसकी आँखें अब भी वही थीं एक चंचल अपूर्वा — प्रेम से भरी हुई, पर थकी हुई।

कार्यक्रम के बाद, एक पत्र मिला अद्वैत को:

“तुम्हारी कविताएँ मेरी आत्मा को जला गईं। अब और नहीं सहा जाता।

मिल नहीं सके तो क्या?

मैं अब तुम्हारी कविता में हमेशा के लिए समा जाना चाहती हूँ।

— अपूर्वा”


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अंतिम अध्याय: प्रेम की चिर शांति

अगले दिन समाचार पत्र में सामाजिक जातीय विवाह विज्ञापनो के अंतिम पृष्ठ के अगले पृष्ठ पर खबरों के विशिष्ट में एक पंक्ति छपी:

“एक प्रसिद्ध न्यायविद की पत्नी ने आत्महत्या कर ली। पास में एक कविता संग्रह पाया गया — ‘विरह-विलाप’। हाथ में एक कागज पर लिखा था: ‘शायद मैं अब उसकी हो जाऊं शायद'

इस खबर के बाद अद्वैत ने स्वयं को सबसे काट लिया। उसने किसी से बात नहीं की। कुछ ही सप्ताह बाद, गंगा के घाट पर एक शव मिला — कहते हैं कोई पागल कवि था,नाम बताता था अद्वैत।

उसकी जेब में एक अंतिम कविता थी:

“अब जहाँ तुम हो,

मैं भी वहीं आ रहा हूँ।

इस बार शब्दों में नहीं,

आत्मा बनकर,शीघ्र अतिशीघ्र मिलन”....


किन्तु समाज ने दोनों को स्वर्ग भी ना जाने दिया,पण्डित जी ने मन्त्रो से दोनों के मिलन से पूर्व ही.....अद्वैत और अपूर्वा को नर्क के तेल में तलवा दिया था फिर से एक बार....


समाप्त

~ हृदय (हृदयांश महर्षि)

















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