अनकही वंदना by Hridyansh Maharishi at Inkitt
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अनकही वंदना

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जो कभी शब्दों में नहीं कहा गया, मौन में समाहित, हृदय की परछाइयों में दबा

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13+

📖 अध्याय १- वह जब पहली बार आयी थी ✍🏻

📖 उपन्यास: "अनकही वंदना"

✍🏻 हृदयांश महर्षि

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🕯 अध्याय 1

"वह जब पहली बार आई थी"

> "कुछ प्रेम वह होते हैं जो कभी कहे नहीं जाते... बस ह्रदय के किसी कोने में दीप की तरह जलता रहता है — बिना बाती, बिना तेल... पर फिर भी जलता रहता है।"

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शहर की उस हवेली के पीछे एक नीम का पुराना पेड़ था, जिसकी छांव में बैठकर आरव अक्सर अपनी डायरी लिखा करता था। उसका जीवन एकाकी था — न तो उसमें उत्सव था, न कोलाहल। वह एक नीरव कविता के समान जीता था — जहाँ भावनाएँ बोलती थीं और शब्द मौन रहते थे।

उस दिन जब उसने वसुधा को पहली बार देखा — वह कोई दृश्य नहीं था, वह एक अनुभूति थी।

वसुधा, विश्वविद्यालय की प्रार्थना-सभा से निकल रही थी। उसके गहनों से कोई ध्वनि नहीं होती थी, उसकी चूड़ियों में भी एक तरह की थकान थी, और उसके चेहरे पर एक ऐसी मासूमियत — जो स्वयं को कभी अपराधी मान बैठती थी।

उसका चेहरा वैसा ही था जैसा शरद ऋतु की पहली भोर — एकदम स्वच्छ, परन्तु कहीं भीतर से उदास।

वह आयी नहीं थी, वह प्रकट हुई थी।

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☁️ मौन की पहली वर्षा

आरव ने न जाने कितनी बार प्रेम के पात्र बनाए थे, पर वसुधा से मिलने के बाद उसे समझ आया — स्त्री कोई पात्र नहीं होती, वह पूर्ण ग्रंथ होती है।

वसुधा के चेहरे में वे सभी कविताएँ थीं, जो कभी लिखी नहीं गईं।

उसने कुछ नहीं कहा, बस एक नज़र उठाई थी। वह एक नज़र जैसे पाँच जन्मों का मौन प्रश्न थी।

आरव ने उत्तर नहीं दिया — क्योंकि प्रेम कभी उत्तर नहीं होता, वह केवल प्रतीक्षा होती है।

उसके बाद आरव हर रोज़ उसी समय, उसी स्थान पर जाने लगा — न मिलने के लिए, बस उस एक क्षण के लिए — जब वसुधा आती थी, उसकी साँसें फूलों से भी धीमी चलती थीं, और उसकी आँखें चुप रहकर भी शोर करती थीं।

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🎐 पहली बात — पहली बार

किसी दिन, जब बादल बरसने से थक चुके थे, और मिट्टी में नम सी गंध थी, वसुधा विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में अकेली बैठी थी। उसके सामने खुली थी — विभिन्न काव्यात्मक किताबे।

आरव ने साहस करके पूछा —

“आपको काव्य लेखक पसन्द हैं?”

वसुधा ने कोई चौंक कर उत्तर नहीं दिया, बस धीमे से बोली —

“वो मुझे भीतर से डराते हैं... क्योंकि वो वही लिखते हैं, जो हम कहना नहीं चाहते।”

यह वाक्य, आरव के जीवन की पहली कविता बन गया।

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🍃 प्रेम की वह सीढ़ी — जो कभी चढ़ी नहीं गई

वसुधा और आरव के बीच कोई प्रस्ताव, कोई संदेश, कोई उपहार नहीं था। उनका प्रेम वह पवित्र गुप्त मंत्र था, जो बस ह्रदयों के भीतर जपा जाता था।

कभी-कभी, आरव उसका स्केच बनाता था — पर वह अधूरा ही रह जाता।

कभी-कभी, वसुधा उसके हाथ से किताब ले लेती थी — और आरव को लगता था जैसे वह उसका दुःख पढ़ रही हो।

एक बार वसुधा ने कहा —

“आरव, यदि हम मिले ही न होते, तो क्या आसान न होता?”

आरव ने कहा —

“नहीं, तुमसे मिलकर अब असमर्थ होना ही मेरा धर्म है।”

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🧱 विवाह — वो शिलाखंड, जिससे आरव टकरा गया

वसुधा का विवाह तय हो गया था — विभव सिंह से। ICS अधिकारी, प्रतिष्ठित, कुलीन कुल का सुपुत्र। और आरव?

वह अब भी नीम की छांव में बैठकर कविता लिखा करता था।

वसुधा ने उससे कुछ नहीं पूछा, न ही कुछ कहा — जैसे कोई बच्चा अपने खिलौने को चुपचाप वहीं छोड़ आता है, जहाँ वह टूट गया हो।

विवाह की तिथि पास आ गई। आरव के लिए समय अब एक ठहरी हुई नदी थी।

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📜 अंतिम भेंट — अंतिम मौन

विवाह के एक दिन पहले, वसुधा अकेली मंदिर में बैठी थी। आरव वही आ पहुँचा — न आमंत्रित, न अपेक्षित।

दोनों के बीच मौन था, पर उसकी तीव्रता इतनी थी कि आरव को लगा — शब्द यदि बोले गए तो टूट जाएंगे।

वसुधा ने सिर्फ इतना कहा —

“तुमने मुझे कभी रोका क्यों नहीं?”

आरव ने सिर झुकाकर कहा —

“क्योंकि तुम्हारी खुशी में मेरी पूजा थी, और मेरी पूजा तुम्हें दुःख नहीं दे सकती।”

उस दिन आरव ने एक छोटी सी मूर्ति खरीदी — एक पत्थर की गौरी की — और उसके चरणों में अपनी कविता रख दी।

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🔚 एक आखिरी वाक्य

उस रात, आरव गंगा के घाट पर बैठा था। हवा में ठंडक थी, और ह्रदय में वसुधा की आवाज़।

वह बोला —

> “वह आई थी, मौन में।

वह चली गई, मौन में।

और अब मैं —

मौन ही रहूँगा,

जब तक अग्नि मुझे भी शब्दहीन न कर दे।”

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> "कुछ प्रेम, शांति नहीं देते,

वे केवल ह्रदय को चीरते हैं —

और उस चीर में एक वंदना जन्म लेती है।"

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