कैनवास

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Summary

यह कहानी हैं 2 लोगो की जो कॉलेज में मिले थे और अपने जीवन को एक कैनवास पर उतारने लगे और कैनवास पर ही समाप्त कर बैठे.... लेखक-हृदयांश महर्षि "हृदय"

Status
Complete
Chapters
12
Rating
n/a
Age Rating
13+

अध्याय 1- पहली किरण


उपन्यास शीर्षक: कैनवास

लेखक-हृदयांश महर्षि "हृदय"

अध्याय 1: पहली किरण


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"हर तस्वीर एक कहानी कहती है, और कभी-कभी, वो कहानी किसी के दिल से जुड़ जाती है।"

सर्दी की हल्की धूप सुबह के कोहरे को चीरती हुई शहर के आर्ट कॉलेज की इमारत पर पड़ रही थी। नववर्ष का पहला दिन और साथ ही नया सत्र—जिसमें नए छात्र अपनी आँखों में अनगिनत सपने लिए कॉलेज की चौखट पर कदम रख रहे थे। उन्हीं में से एक था राकेश, एक शांत, गहरे विचारों में डूबा रहने वाला लड़का, जिसके हाथ में एक पुराना DSLR कैमरा था और आँखों में उस कैमरे से भी गहरी दृष्टि।

राकेश का व्यक्तित्व किसी रहस्य की तरह था—वह कम बोलता था, पर उसकी आँखें सबकुछ कहती थीं। उसे प्राकृतिक रोशनी से खेलना आता था, लोगों के चेहरे में छिपे भावों को कैद करना आता था। वह भीड़ से अलग चलता था, और उसे इसी अलगपन में अपनी दुनिया मिलती थी।

कॉलेज का माहौल रचनात्मक ऊर्जा से भरा था—कहीं कोई कैनवास पर रंग बिखेर रहा था, तो कोई मूर्तियाँ बना रहा था। राकेश एक कोने में बैठा कुछ फोटो खींच रहा था जब उसकी नज़र पहली बार रमिका पर पड़ी।

रमिका... जैसे कोई कविता चित्र बन गई हो।

वह अपने चारों ओर रंगों से खेल रही थी, पेंट ब्रश उसकी उंगलियों में ऐसे नाच रहा था मानो वर्षों से उसके साथी हो। उसके बालों में बंधा नीला रिबन, उसके चेहरे पर फैली चमक, और उसकी आँखों में जो चमक थी—वो सामान्य नहीं थी। वह जीवन को किसी अदृश्य ऊर्जा से भर देती थी।

राकेश की उंगलियाँ अनायास ही कैमरे के शटर पर चली गईं। एक क्लिक... और वह क्षण कैद हो गया।

"तुमने मेरी तस्वीर ली?"

राकेश चौंक गया। सामने रमिका खड़ी थी, हाथों में ब्रश, आँखों में सवाल लिए

"हाँ... वो पल अच्छा था।"

"तो अगली बार पूछ कर लेना," उसने मुस्कराते हुए कहा।

राकेश के लिए यह पहली मुस्कान किसी सूरज की पहली किरण जैसी थी।


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कॉलेज के पहले महीने में, राकेश और रमिका की राहें बार-बार टकराने लगीं। वह फोटोग्राफी में गहराई तलाशता था, और वह पेंटिंग में भावनाएँ। उनकी कला में संवाद होने लगा—राकेश तस्वीरें खींचता, और रमिका उन्हें देखकर चित्र बनाती।

एक दिन रमिका ने एक चित्र बनाया, जिसमें एक लड़का था, जो अंधेरे कमरे में बैठा था लेकिन उसकी आँखें रोशनी खोज रही थीं। राकेश ने उसे देखकर कहा:

"ये मेरी तस्वीर है ना?"

"शायद... या शायद तुम्हारे जैसे किसी की," रमिका बोली।

इस तरह दोनों का रिश्ता सिर्फ दोस्ती तक सीमित नहीं रहा। वो एक-दूसरे की प्रेरणा बनते जा रहे थे, बिना कहे, बिना मांगे।

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