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रात, स्टेशन और मोहब्बत ❤️🚉

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Summary

“उस रात स्टेशन पर सिर्फ एक ट्रेन नहीं छूटी थी… किसी का दिल भी पीछे छूट गया था।” “और जब सालों बाद वही दो लोग फिर उसी प्लेटफॉर्म पर मिले, तो किस्मत ने ऐसा खेल खेला जिसे कोई नहीं समझ पाया…”

Status
Complete
Chapters
1
Rating
n/a
Age Rating
16+

Chapter 1

“उस रात स्टेशन पर सिर्फ एक ट्रेन नहीं छूटी थी… किसी का दिल भी पीछे छूट गया था।”

“और जब सालों बाद वही दो लोग फिर उसी प्लेटफॉर्म पर मिले, तो किस्मत ने ऐसा खेल खेला जिसे कोई नहीं समझ पाया…”

अध्याय 1: वो बारिश वाली रात

दिल्ली जंक्शन रेलवे स्टेशन।

रात के करीब 11 बजे थे।

आसमान में काले बादल छाए हुए थे और हल्की-हल्की बारिश हो रही थी।

स्टेशन पर हमेशा की तरह भीड़ थी।

कहीं चाय वालों की आवाजें गूंज रही थीं, तो कहीं यात्री अपने सामान के साथ भाग रहे थे।

उसी भीड़ में एक लड़का प्लेटफॉर्म नंबर 7 पर बैठा था।

उसका नाम था आरव।

हाथ में टिकट था और आंखों में ढेर सारे सपने।

उसे मुंबई जाना था।

नई नौकरी, नई जिंदगी और नए अवसर उसका इंतजार कर रहे थे।

लेकिन उसे नहीं पता था कि उस रात उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा सफर ट्रेन में नहीं...

बल्कि प्लेटफॉर्म पर शुरू होने वाला था।


अध्याय 2: पहली मुलाकात

अचानक तेज हवा चली।

एक लड़की भागते हुए प्लेटफॉर्म पर आई।

उसके हाथ में बैग था और चेहरे पर घबराहट।

भागते-भागते उसके हाथ से कुछ कागज उड़ गए।

वो उन्हें पकड़ने की कोशिश कर रही थी।

आरव तुरंत उठा और कागज इकट्ठा करने लगा।

"ये लीजिए।"

लड़की ने राहत की सांस ली।

"थैंक यू। अगर ये खो जाते तो बहुत बड़ी परेशानी हो जाती।"

आरव मुस्कुराया।

"लगता है किसी जरूरी मिशन पर हैं।"

लड़की हंस पड़ी।

"कुछ ऐसा ही समझ लीजिए।"

उसका नाम था मीरा।

और शायद उसी पल दोनों की कहानी शुरू हो गई।


अध्याय 3: एक रात की दोस्ती

मीरा की ट्रेन चार घंटे लेट थी।

आरव की ट्रेन भी देर से आने वाली थी।

समय काटने के लिए दोनों स्टेशन की कैंटीन में चाय पीने चले गए।

चाय की भाप के साथ बातें शुरू हुईं।

फिर सपनों की बातें।

फिर बचपन की बातें।

फिर जिंदगी की बातें।

धीरे-धीरे दोनों भूल गए कि वे पहली बार मिले हैं।

ऐसा लग रहा था जैसे बरसों से एक-दूसरे को जानते हों।


अध्याय 4: वो अधूरी बात

रात के दो बज चुके थे।

स्टेशन लगभग खाली हो चुका था।

मीरा ने अचानक पूछा—

"तुम्हें कभी किसी से प्यार हुआ है?”

आरव कुछ पल चुप रहा।

फिर बोला—

"नहीं। शायद सही इंसान नहीं मिला।"

"और अगर मिल जाए?”

"तो कभी जाने नहीं दूंगा।"

मीरा मुस्कुरा दी।

लेकिन उसकी मुस्कान में कहीं हल्की उदासी छिपी थी।


अध्याय 5: ट्रेन का आना

सुबह होने लगी थी।

लाउडस्पीकर पर अनाउंसमेंट हुआ—

"मुंबई जाने वाली एक्सप्रेस प्लेटफॉर्म नंबर 7 पर आने वाली है।"

आरव का दिल अचानक भारी हो गया।

उसे पहली बार लगा कि वह किसी अपने को छोड़कर जा रहा है।

मीरा भी खामोश थी।

दोनों के बीच शब्द कम और एहसास ज्यादा थे।

ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आकर रुकी।

आरव ने अपना सामान उठाया।

"शायद फिर कभी मुलाकात हो जाए।"

मीरा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—

"अगर किस्मत ने चाहा तो जरूर।"


अध्याय 6: एक अधूरा नंबर

ट्रेन चलने लगी।

आरव ने जल्दी-जल्दी अपना नंबर एक कागज पर लिखा और मीरा को दिया।

लेकिन तभी हवा का तेज झोंका आया।

कागज उड़ गया।

दोनों उसे पकड़ नहीं पाए।

ट्रेन धीरे-धीरे आगे बढ़ गई।

और कुछ ही सेकंड में मीरा भीड़ में कहीं खो गई।


अध्याय 7: इंतजार

मुंबई पहुंचने के बाद भी आरव मीरा को नहीं भूल पाया।

उसकी मुस्कान...

उसकी बातें...

उसकी आंखें...

सब कुछ उसके दिल में बस चुका था।

हर रात वह सोचता—

काश उस दिन नंबर मिल गया होता।

काश उसने उसका पूरा नाम पूछ लिया होता।

काश...

लेकिन जिंदगी ”काश" से नहीं चलती।

समय गुजरता गया।


अध्याय 8: पांच साल बाद

पांच साल बाद...

आरव अब एक सफल फोटोग्राफर बन चुका था।

देशभर में उसकी तस्वीरों की प्रदर्शनी लगती थी।

लेकिन उसकी सबसे पसंदीदा तस्वीर आज भी एक रेलवे स्टेशन की थी।

एक धुंधली तस्वीर...

जिसमें दूर खड़ी एक लड़की दिखाई देती थी।

वो तस्वीर मीरा की थी।


अध्याय 9: Suspense Begins...

एक दिन आरव को लखनऊ में आयोजित एक फोटोग्राफी इवेंट में बुलाया गया।

कार्यक्रम खत्म होने के बाद वह ट्रेन से वापस लौट रहा था।

संयोग देखिए...

ट्रेन उसी दिल्ली जंक्शन पर रुकी।

उसी प्लेटफॉर्म नंबर 7 पर।

उसी समय।

उसी मौसम में।

बारिश फिर हो रही थी।


अध्याय 10: वो फिर सामने थी

आरव प्लेटफॉर्म पर उतरा।

और तभी उसकी नजर दूर खड़ी एक लड़की पर पड़ी।

दिल की धड़कन अचानक रुक गई।

वो मीरा थी।

पांच साल बाद भी।

वही आंखें।

वही मुस्कान।

वही चेहरा।


अध्याय 11: सबसे बड़ा झटका

आरव उसके पास दौड़ा।

"मीरा!”

लड़की पलटी।

वो सचमुच मीरा थी।

दोनों कुछ पल तक एक-दूसरे को देखते रहे।

लेकिन तभी एक छोटा बच्चा दौड़कर मीरा के पास आया।

"मम्मा!”

आरव का दिल टूट गया।

जैसे किसी ने उसकी सारी उम्मीदें छीन ली हों।


अध्याय 12: सच्चाई

मीरा ने उसकी आंखों में दर्द देख लिया।

वो उसे स्टेशन के एक शांत कोने में ले गई।

फिर धीरे से बोली—

"ये मेरा बेटा नहीं है।"

आरव चौंक गया।

"क्या?”

मीरा मुस्कुराई।

"ये मेरी बहन का बेटा है।"

आरव ने राहत की सांस ली।

लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी।


अध्याय 13: वो राज़

मीरा ने बताया कि उस रात स्टेशन से जाने के बाद उसकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई थी।

उसके पिता गंभीर रूप से बीमार हो गए थे।

उसे नौकरी छोड़कर परिवार संभालना पड़ा।

फिर कई साल जिम्मेदारियों में गुजर गए।

लेकिन उसने कभी उस लड़के को नहीं भुलाया जिससे उसकी मुलाकात सिर्फ एक रात के लिए हुई थी।


अध्याय 14: यादों का डिब्बा

मीरा ने अपने बैग से एक छोटी डायरी निकाली।

उसमें एक पन्ना था।

उस पर लिखा था—

"आरव – प्लेटफॉर्म नंबर 7"

बस इतना ही।

आरव की आंखें भर आईं।

"तुमने मुझे याद रखा?”

मीरा हंस पड़ी।

"कुछ लोग सिर्फ एक रात में याद नहीं बनते... आदत बन जाते हैं।"


अध्याय 15: मोहब्बत की मंजिल

उस रात दोनों स्टेशन पर घंटों बैठे रहे।

जैसे पांच साल की सारी अधूरी बातें पूरी कर रहे हों।

सुबह होने लगी।

सूरज की पहली किरण प्लेटफॉर्म पर पड़ी।

आरव ने धीरे से कहा—

"इस बार मैं तुम्हें जाने नहीं दूंगा।"

मीरा मुस्कुराई।

"और इस बार मैं जाना भी नहीं चाहती।"


Epilogue ❤️

एक साल बाद...

उसी स्टेशन पर रोशनी सजी हुई थी।

लेकिन इस बार कोई विदाई नहीं थी।

प्लेटफॉर्म नंबर 7 पर एक छोटी सी सगाई हो रही थी।

दोनों परिवार मौजूद थे।

चाय वाले भी मुस्कुरा रहे थे।

और वही स्टेशन...

जो कभी दो अजनबियों की मुलाकात का गवाह बना था...

अब दो दिलों के मिलन का गवाह था।

मीरा ने आरव का हाथ थामा और धीरे से कहा—

"किस्मत ने हमें एक रात के लिए मिलाया था... लेकिन हमेशा के लिए साथ रखने के लिए।"

दूर कहीं ट्रेन की सीटी गूंजी।

लोग आते-जाते रहे।

लेकिन उन दोनों के लिए वक्त ठहर चुका था।

क्योंकि कुछ मोहब्बतें किताबों में नहीं मिलतीं...

वो किसी बारिश भरी रात, किसी रेलवे स्टेशन और किसी अधूरी मुलाकात में जन्म लेती हैं।

और फिर...

कभी खत्म नहीं होतीं। ❤️🚉✨

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